(संस्मरण)
● संस्मरण शब्द "स्मृ" धातु में "सम" उपसर्ग एवं "ल्युट" प्रत्यय लगाने से बना है। इसका सामान्य अर्थ होता है :- "स्मरण करना, याद करना"..।अर्थात ऐसी पुस्तक या ऐसी कृति, जहाँ लेखक द्वारा अपने जीवन के उन महत्वपूर्ण लम्हों को पुनः जीने की इच्छा से उसे एक लिखित दस्तावेज का रुप दे दिया जाता है जिसका प्रयोग वह कभी-भी करके उन्हें दोबारा साकार कर सकता है। अंग्रेजी में इसे "मेमोरिस" कहते हैं।
संस्मरण लेखक, बीते समय को वर्तमान में स्मृति के सहारे प्रस्तुत करता है। यह साहित्य की नई विधा है जिसकी शुरुआत पत्रिकाओं के माध्यम से हुई थी और उसका विकास भी वहीं हुआ था। शुरुआत में लेखकों, पत्रकारों आदि की स्मृति से जुड़े प्रसंगों को पत्रों में प्रकाशित किया जाता था जिसे आने वाले समय में एक स्वतंत्र विधा का नाम दे दिया गया और इससे एक नई विधा " संस्मरण" का उदय हुआ।
●संस्मरण की परिभाषा :-
"हिंदी साहित्य कोष" के अनुसार :- " संस्मरण लेखक जो स्वयं देखता और अनुभव करता है उसी का वर्णन करता है। उसमें उसकी सम्वेदना, निजी अनुभव होते हैं और स्मृति ही संस्मरण का रूप है"..।
"रामस्वरूप चतुर्वेदी" के अनुसार :- "अकाल्पनिक गद्य-वृत की धारणा सबसे पहले संस्मरण में ही देखी जा सकती है"..।
● हिंदी साहित्य में संस्मरण की शुरुआत व विकास क्रम :-
हिंदी साहित्य में संस्मरण की शुरुआत "महावीर प्रसाद द्विवेदी" और "बालमुकुंद गुप्त" से मानी जाती है जब उनके संस्मरण "सरस्वती" में प्रकाशित होते थे। इसी प्रकार से, धीरे-धीरे यह विधा अपना विकास करती गयी और हिंदी साहित्य को इस विधा ने ढेरों संस्मरणकार और उनके संस्मरण दिए।
हिंदी के आरम्भिक संस्मरण लेखकों में "पदम् सिंह" शर्मा का नाम प्रमुख है। हिंदी में संस्मरण को कला-रूप की प्रतिष्ठा उन्हीं के माध्यम से मिलती है।
●हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण संस्मरणों का संक्षिप्त परिचय :-
(1)●"ठकुरी बाबा" नामक संस्मरण "महादेवी वर्मा" के "स्मृति के रेखाएं" 1943 में संकलित है। यह संस्मरण एक साहित्यकार की साहित्य सेवा के बदले उसे मिले परिणाम पर आधारित है। लेखिका का मत है कि साहित्यकार हमेशा लोक कल्याण के लिए तत्पर रहता है परंतु उसे लोगों से धोखा ही मिलता है। साहित्यकार की क्या स्थिति होनी चाहिए , उसे किस तरह का सम्मान मिलना चाहिए इत्यादि सवालों को लेखिका ने पाठक वर्ग पर ही छोड़ दिया है।
(2) ●"माटी की मूरतें" नामक संस्मरण "रामवृक्ष बेनीपुरी" का 1946 में प्रकाशित हुआ था जिसमें लेखक ने "रजिया, सरजू भैया, मंगर, बालगोबिन भगत" आदि का वर्णन करके अपने जीवन के कुछ अनछुए पहलुओं को पाठक वर्ग के समक्ष रखा है।
(3) ● "अंतिम अध्याय" नामक संस्मरण "पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी" का 1972 में आया था जिसमें लेखक के नौ संस्मरण संकलित हैं। लेखक की आत्मा ठेठ ग्रामीण होने के साथ साथ "महादेवी" की भाँति अत्यंत सामान्य नारी पात्रों का स्मृयांकन से भी जुड़ी है। इसी संग्रह में संकलित " छतीसगढ़ की आत्मा" उनका प्रमुख संस्मरण है।
(4) ● "चंद सतरे और" नामक संस्मरण "अनिता राकेश" जी का 1975 में आया था। इसमें "मोहन राकेश" से पहले, उनके साथ और उनके बाद के 3 साल की जीवन-यात्रा को संस्मरणात्मक शैली में लिखा गया है। यह पुस्तक मोहन राकेश के व्यक्तित्व और साहित्य को भी समझने के लिहाज़ से अच्छी है।
(5) ●" हम-हशमत" नामक संस्मरण "कृष्णा सोबती" का 1977 में आया था जोकि एक लंबी जीवनचित्र कथा है। जिसमें स्थितियों और व्यक्तियों का जीवंत चित्रण किया गया है।
देखा जाए तो संस्मरण से जो अर्थ निकाला जाता है उस दृष्टि से यह कृति कुछ अलग अर्थ रखती है। लेखिका ने अपनी इस कृति में "नामवर सिंह" और "अशोक वाजपेयी" जी को बहुत सम्मान दिया है।
"नामवर" जी के बारे में लेखिका कहती हैं कि " नामवर के सुसंस्कृत साबुत व्यक्तिव में हिंदी साहित्य के नायक और प्रतिनायक की एक छवि एक साथ देखी जा सकती है"..।
"अशोक वाजपेयी" जी के बारे में लेखिका कहती हैं कि " अशोक के पास सबदे घना और गुणात्मक रूप है, सजग चेतना का स्नायुतन्त्र जो उसकी अंतः क्रियाओँ की नाक की सीध थामे है"..।
इस में हशमत स्वयं लेखिका ही है।
(6) ● " कुछ ख्यालों में कुछ ख्वाबों में" नामक संस्मरण "शंकरदयाल सिंह" का 1978 में आया था। यह एक विशिष्ट कृति है जिसमें संस्मरण, रेखाचित्र, यात्रावृत्त, शब्द-चित्र सभी कुछ समाहित है। इस कृति में प्रतुत व्यक्तियों के जीवन और उनके मानसिक द्वंद को भी दिखाया गया है।
(7) ●" पुनः" नामक संस्मरण "सुलोचना रांगेय राघव" जी का 1979 में आया था। इसमें लेखिका ने अपने पति "रांगेय राघव" के रचना संघर्ष और उनकी मृत्यु के बाद लेखिका को किस तरह की त्रासदियां झेलनी पड़ी उसका वर्णन किया है। यह दर्द सजीव के साथ अजीब भी है। यह प्रथम कृति है जिसमें रांगेय राघव का जीवन इतने प्रामाणिक ढंग से प्रस्तुत हुआ है।
(8) ●"सृजन का सुख-दुख" नामक संस्मरण "प्रतिभा अग्रवाल" का 1981 में आया था। इसमें लेखिका ने अपने रंगमंचीय अनुभवों को सजीव कर दिया है। लेखिका का सम्बंध भारतेंदु के परिवार से है।
(9) ●"स्मृतिलेखा" नामक संस्मरण "अज्ञेय" का 1982 में आया था । इसमें लेखक ने जिन रचनाकारों का चयन किया है, उनसे वह कहीं बहुत गहरे प्रभावित रहे हैं। विद्यानिवास मिश्र के शब्दों में " स्मृतिलेखा ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं है, पर स्मृति का विशिष्ट सर्जनात्मक उपयोग है। समकालीन साहित्य के इतिहास को एक नया चौखट इस लेख से मिलता है और इस दृष्टि से यह इतिहास-रचना को नया आयाम देता है। यह इसकी गौण उपलब्धि थी, इसकी विशिष्ट उपलब्धि इस बात में है कि "बस आप लेखक में ये देखिए कि, लेखक, लेखक को कैसे देखता है: देखने पे आपकी आँखे मन हो जाएंगी"...।
(10 ●" आदमी से आदमी तक" नामक संस्मरण "भीमसेन त्यागी" का 1982 में आया था ।इसमें दिल्ली के निकट खुली ज़िन्दगी व्यतीत करने वाले राजस्थानी गाड़िया लोहारों का रेखांकन किया गया है। लेखक ने इसे "शब्द चित्र" कहा है। संस्मनण के पात्र "हरिपाल" ने प्रत्येक शब्द चित्र को रेखा चित्र में प्रस्तुत करके लेखक के मन्तव्य को पूर्ण कर दिया है। लेखक ने गाड़िया लोहारों की जिस औघड़ जिंदगी का चित्रण किया है उसमें उसी के शब्दों में कहें तो- अटूट श्रम था, कठोर संघर्ष था, गजब का भोलापन था और जिंदगी को जीने की अदम्य लालसा भी"..। निःसन्देह लेखक के शब्द-चित्रों में यह जिंदगी अपने प्रामाणिक रूप में पहली बार साकार हुई है। इस दृष्टि से यह कृति हिंदी रेखा-चित्रों की परंपरा में एक सर्वथा नवीन प्रयोग है।
(11) ●" युगपुरुष" नामक संस्मरण "रामेश्वर शुक्ल" "अंचल" का 1983 में आया था जिसमें दिखाए गए पुरूषों के जीवन के साथ उनके युग को भी एक नया आकार दिया गया है।
(12) ●" याद हो कि न याद हो" नामक संस्मरण "काशीनाथ सिंह" का 1992 में आया था जिसमें लेखक के घनिष्ठ मित्र, लेखक आदि तो हैं ही साथ में बनारस शहर के "अस्सी चौराहे" का भी वर्णन बखूबी किया है। यह शहर भी इन साहित्यकारों की तरह हँसता बोलता जीवित है। इसमें पिछले कुछ दशकों के साहित्य-सृजन का सांस्कृतिक परिवेश भी डाल दिया गया है। लेखक की व्यंग्य शैली भी इस कृति की शोभा बढ़ा रही है।
(13) ●" सप्तवर्णी" नामक संस्मरण "गिरिराज किशोर" का 1994 में आया था जिसमें IIT कानपुर कुलसचिव के पद से उन्हें 1979 में निलंबित कर दिया गया था जहाँ एक लंबे समय के बाद वह अपनी लड़ाई में जीतते हैं।
वह प्रोयोद्योकि के क्षेत्र में रचनात्मकता लाना चाहते थे परंतु जैसे सप्तवर्णी की शाखाओं को काट दिया जाता है ,उसी तरह से इन कार्य को भी रोक दिया गया। लेखक ने इसी को सप्तवर्णी संहार कहा है...।
इसी के अतिरिक्त इसमें "अज्ञेय" के जयजानकी जीवनयात्रा का वृत और अंत में 6 सितंबर 1965 से 1 अक्टूबर 1965 तक कि हिंदुस्तान-पाकिस्तान युद्ध के समय की कुछ डायरियाँ भी जोड़ दी हैं।
(14) ●" लौट आओ धार" नामक संस्मरण "दूधनाथ सिंह" का 1995 में आया था जहाँ दूधनाथ सिंह घर से चुपचाप निकल जाते हैं और इधर उधर भटक कर बीमार पड़ने से लेकर मृत्यु तक अपने प्रसंगों को दिखाते हैं। स्वयं लेखक कहते हैं " इसको कुछ भी कह सकते हैं। यह डायरी, संस्मरण, आत्मवाची गद्य, आलोचना, कथा-वृत सब कुछ है।
इसमें लेखक के शुरुआती वर्षों की धड़कन से छेड़छाड़ और अनेक लोगों की धुँधली और चमकती छवि है। यह एक रंगीन मौजेक है, गद्य का आंतरिक विकास है"...।
इसकी कथावस्तु को जानने के लिए "शमशेर" की पंक्तियों को ध्यान से पढ़ना होगा :-
"लौट आओ धार
टूट मत ओ साँझ के पत्थर,
हृदय पर मौन लम्बी आह"...।
(15) ●" स्मृतियों के छंद" नामक संस्मरण "रामदरश मिश्र" का 1995 में आया था जहाँ लेखक ने उन गुरुओं, मित्रों, साहित्यकारों आदि को याद किया है जिन्होंने उन पर अपने उजास की अमिट छाप छोड़ी है...।
(16) ●" चिड़िया रैन बसेरा" नामक संस्मरण "विद्यानिवास मिश्र" का 2002 में आया था जहाँ उन्होंने अपने उन्हीं बसेरो को याद किया है जहाँ जहाँ वह बसते गए। दिल्ली, लखनऊ, रीवाँ, आगरा, अमेरिका आदि। लेखक स्वयं कहते हैं " मैंने अपने जीवन के तिथि क्रम में से यह कड़ियाँ नहीं लिखी। जो भी स्थान मेरे सामने आते गए वह संस्मरण की रील पर आते गए। एक तरह से सोचने पर ये सभी कड़ियाँ फ्लैश बैक हैं"...।
(17) ●" लखनऊ मेरा लखनऊ" नामक संस्मरण "मनोहर श्याम जोशी" जी का 2002 में आया था। जहाँ लेखक अपने लखनऊ शहर को पुनः जीने की कोशिश करते हैं। लेखक लखनऊ विश्वविद्यालय में विज्ञान के विद्यार्थी थे और दिल्ली में अमृतलाल नागर के सम्पर्क में आने से वह हिंदी की तरफ बढ़ते हैं।
●" रघुवीर सहाय:रचनाओं के बहाने " नामक संस्मरण भी लेखक का दूसरा संस्मरण 2003 में आया था जहाँ लेखक ने "रघुवीर सहाय" के जीवन पर प्रकाश ही नहीं डाला बल्कि दिल्ली में होने वाली अपनी दोस्ती के किस्से भी शेयर किए हैं। यह कोई आलोचनात्मक पुस्तक न होकर केवल रघुवीर को पुनः याद करने का तरीका भर है"...।
यह संस्मरण रघुवीर सहाय के मानसिक यात्रा को अधिक महत्व देता है। जैसे कि " जीवन के लंबे दौर तक सहाय जी के बनते बिगड़ते चित्र, टाइम्स ऑफ इंडिया के मालिक द्वारा "दिनमान" का सम्पादक बनाकर बाद में उन्हें निकाल देना जिससे सहाय जी को अंदर तक चोट पहुँचती है। साहित्य अकादमी भी उन्हें तब दिया जाता है जब वह बेरोजगार होते हैं और अंततः 30 दिसम्बर 1990 को उन्हें दिल का दौरा पड़ता है और उनकी मृत्यु हो जाती है।
लेखक सहाय जी के बारे में कहता है " रघुवीर सहाय आखिरी दम तक रघुवीर ही था। ऐसा विचारक जो हर चीज की गहराईयों तक खो जाता था। जिसका स्वर मानवीय करुणा का था और संवादी स्वर साधारण व्यक्ति के रोज़मर्रापन पर टिका"..।
(18) ●" नगां तलाई का गाँव" नामक संस्मरण "विश्वनाथ त्रिपाठी" का 2004 में आया था जहाँ उन्होंने अपने गाँव "विस्कोहर" को याद किया है। अपनी कहानी "विस्कोहर की माटी" में भी अपने गाँव को याद किया है।
●" गुरुजी की खेती बाड़ी" "विश्वनाथ त्रिपाठी" का दूसरा संस्मरण 2015 में आया था जहाँ लेखक ने अपने शिष्यों के प्रति समर्पण भाव रखा है जिसमें उनकी स्मृतियों को उकेरा गया है। यह हिंदी की प्रथम और विरल कृति है जिसमें एक गुरुजी द्वारा अपने शिक्षक जीवन और शिक्षकों के प्रति ऐसा भाव रखा है... ।
(19) ●" अपने-अपने अज्ञेय" नामक संस्मरण "ओम थानवी " का 2012 में आया था जिसमें लेखक ने अज्ञेय की जन्म शताब्दी पर पुस्तक तैयार की है। इसमें अज्ञेय के निकट रहने वाले साहित्यकारों से भी संस्मरण लिखवाए गए हैं। इस कृति से अज्ञेय को अच्छे से समझा जा सकता है।
(20) ●" ज्ञानरंजन के बहाने" नामक संस्मरण "नीलाभ अश्क " का 2012 में आया था जहाँ लेखक ने एक ही पथ के 2 हरामियों की मित्रता के बारे में वर्णन किया है। उसके साथ ही उस समय की हलचल को बेबाकी से दिखाया है...।
इसके साथ ही "पहल" नामक चर्चित पत्रिका के सम्पादक "ज्ञानरंजन" के व्यक्तित्व पर भी प्रकाश गिराया है।
(21) ●" जहाँ से उजास" नामक संस्मरण "राजी सेठ" का 2013 में आया था जहाँ अपने गुरुओं ,दर्शन शास्त्र के अध्यापक नंदकिशोर आचार्य को, जैनेंद्र, अज्ञेय, निराला आदि को याद किया है।
(22) ●" कृति और कृतिकार" नामक संस्मरण "मृदुला गर्ग" का 2013 में आया था जहाँ अपनी यात्रा के सहयात्रियों के जीवन रंग को दिखाया है।
(23) ●" फिर मुझे रहगुज़र याद आया" नामक संस्मरण "शैलेंद्र सागर" का 2013 में आया था जहाँ लेखक ने न केवल अपनी बात लिखी है बल्कि इसका नायक "रामपुर" नाम का गाँव जहाँ लेखक का बचपन गुजरा है, को भी मुख्य रूप से वर्णित किया है।
(24) ●" पकी जेठ का गुलमोहर" नामक संस्मरण "भगवान दास मोरवाल" का 2016 में आया था जहाँ बदलते आधुनिक-ग्रामीण समाज के बहाने समाजशास्त्र और मानवशास्त्री आख्यान लिखा है।
(25) ● "विशाल भारत" पत्र द्वारा जोकि बनारसीदास चतुर्वेदी के सम्पादकत्व में निकलता था उन्होंने "शहीद अंक" निकालकर देश के शहीद जवानों के प्रति सम्मानीय भाव प्रकट किया है।
● सन्दर्भ सूची:-
1 हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास - रामस्वरूप चतुर्वेदी- लोकभारती प्रकाशन - 25वां संस्करण - 2018
2 हिंदी का गद्य साहित्य -रामचंद्र तिवारी- विश्विद्यालय प्रकाशन -वाराणसी- 12वाँ संस्करण - 2018
3 EPG पाठशाला वेबसाइट
4 संस्मरण विकिपीडिया
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