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Sunday, August 30, 2020

आदिकालीन वीरगाथात्मक साहित्य व जन्मकाल

 


            (आदिकालीन वीरगाथात्मक साहित्य)


●रासो साहित्य:-

रासो साहित्य मूलतः वह साहित्य है,जिसमें अनेक राजाओ-महाराजाओ की पद-प्रतिष्ठा का,उनके शौर्य-वीरता का वर्णन उनके आश्रयदाताओं द्वारा किया गया है। जिसका मकसद उनके कीर्तिमानों को और अपनी चाटुकारिता के साथ कवियों द्वारा अपनी सेवाभाव व एकनिष्ठता का परिचय देना भी था। यह कार्य भाटो और चारण कवियों द्वारा किया जाता था साथ ही यह चारण-भाट कवि समय-समय पर अपने राजाओं के साथ युद्धस्थल पर भी जाया करते थे।

●रासो साहित्य मूलतः पश्चिमोत्तर भारत के वीरों और उनके जीवन घटनाओं पर आधारित है, जिसमें कुछ राजाओं का वर्णन साहित्य में उनके शौर्य और वीरता को प्रमाणिक रूप से दिखाने के लिए हुआ था। साथ ही साथ ऐतिहासिक तथ्यों व अतीत की स्मृतियों को जीवंत रखने के लिए भी। परंतु वर्तमान में इस तरह का साहित्य बहुत कम मात्रा में शेष रह गया है। जो भी रासो साहित्य आज हमारे सामने उपलब्ध है वह या तो अप्रामाणिक सिद्ध हुआ या तो अर्धप्रमाणिक या फिर कहीं लुप्त हो गया।

●आचार्य शुक्ल के अनुसार वीरगाथात्मक काव्य को ध्यान में रख़ते हुए ही उन्होंने आदिकालीन साहित्य को वीरगाथाकाल की संज्ञा दी है क्योंकि मुख्य-रूप तत्कालीन साहित्य वीररस से पूर्ण साहित्य के रूप में ही उपलब्ध हुआ है।


● वीरगाथा का अर्थ :- रामस्वरूप चतुर्वेदी का मत है कि वीर के साथ "गाथा" का विशिष्ट अर्थ है जिसके साथ "शौर्य-शिवैलरी" के तत्व जुड़ने से यह नाम उस समय के लिए अनुकूल बैठता है क्योंकि उस समय रासो साहित्य ही एकमात्र ऐसा साहित्य था जिसमें शुद्ध रूप से हिंदी के तत्व दिखते थे"....

सम्पूर्ण रासो साहित्य वीर और श्रृंगार के युग्म से बना है। चाहे वह पृथ्वीराज रासो हो या बीसलदेव। 


                                      

●रासो शब्द को लेकर विद्वानों में बहस है कि इसकी उतपत्ति कैसे हुई है, जोकि इस प्रकार है:-

शुक्ल                         रसायण से

गार्सा द तांसी              राजसूय से

नरोत्तम स्वामी             रासक से

चतुर्वेदी                       राउस से

हजारीप्रसाद                रासक (उपरूपक से)

गनपतिचन्द्र                 रासक-रास-रासा-रासु-रासो


परन्तु ज्यादात्तर मत "रासक" शब्द हजारीप्रसाद जी के साथ सहमत है।


●पृथ्वीराज रासो के सम्बंध में कहे गए कथन:-

1 बच्चन सिंह के अनुसार  "रासो काव्य की मूल प्रकृति में सामंतो और राजाओं के शौर्य और विकास का अतिरंजित चित्र दिखता है"...।

2 रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार "रासो साहित्य में शिष्ट के साथ लोक के तत्व भी जुड़े हुए हैं"...। 

3रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार :- "पृथ्वीराज रासो में पाठ और बीसलदेव रासो में गेय शैली का प्रयोग है"...।                                    

4 विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार हजारीप्रसाद ने पृथ्वीराज रासो के लिए कहा है :- " पृथ्वीराज रासो मुख्यतः शुक-शुकी संवाद में लिखा गया है"....।                       

5 बच्चन सिंह के अनुसार  "यह एक राजनीतिक महाकाव्य है, दूसरे शब्दों में राजनीतिक-माहकाव्यात्मक त्रासदी"...।

6 "पृथ्वीराज रासो हिंदी की अपनी महाकाव्य परम्परा की बड़ी उपयुक्त प्रस्तावना है"...।

7 इन सभी रासो में जो सबसे ज्यादा प्रसिद्ध रासो है वह "पृथ्वीराज रासो" है जिसे आचार्य शुक्ल हिंदी का "प्रथम महाकाव्य" कहते हैं और इसके रचनाकार (चंद) को "हिंदी का प्रथम कवि" मानते हैं।

                                                          

●पृथ्वीराज रासो की रचना पृथ्वीराज के मित्र चन्दबरदाई ने 1343ई.के आसपास की थी जिसमें 69 सर्ग और 2500 पृ हैं। इसमें बहुत से मुख्य प्रसंग हैं जैसे:-संयोगिता स्वयम्बर, कैमास वध, मुहम्मद गौरी युद्ध आदि।

रासो को पूरा चन्दबरदाई के पुत्र जल्हण ने किया था।

पृथ्वीराज चौहान दिल्ली के अंतिम हिंदू राजा थे। इस रासो में चौपाई, छप्पय, रोला, दोहा आदि छन्दों का प्रयोग हुआ है।


●रासो की प्रमाणिकता पर बहुत से सवाल विद्वानों ने इस तरह उठाये हैं:-

प्रमाणिक:-       मिश्रबन्धुओ, श्यामसुंदर दास

अप्रमाणिक:-    शुक्ल,डॉ वुलर,गौरीशंकर ओझा

अर्धप्रमाणिक:-  हजारी,मुनिजिन विजय


सुप्रसिद्ध विद्वत सभा royal Asiatic society of bangal ने पृथ्वीराज रासो का आरम्भ किया था। रासो के कुछ थोड़े ही अंश प्रकाशित हुए थे कि डॉ वूलर को "पृथ्वीराज विजय" नामक रचना खंडित अंशो में मिली गई। इस पुस्तक के अध्ध्यन के बाद डॉ वूलर "पृथ्वीराज विजय" को ज्यादा प्रमाणिक मानते हैं। उनका मानना है कि "पृथ्वीराजकालीन अभिलेखों से पृथ्वीराज विजय की घटनाएं तो मेल खा जाती हैं परंतु रासो की नही"..। 

डॉ वुलर का पत्र सभा द्वारा छापा गया और रासो का प्रकाशन बंद करना पड़ा। 

                                         


●"बीसलदेव रासो" को नरपति नाल्ह ने लिखा था जिसे हिंदी का प्रथम बारहमासा वर्णन का काव्य माना जाता है जोकि "गेय शैली" में लिखा एक विरह काव्य है। इसमें परमार के राजा "विग्रहराज चतुर्थ" का विवाह भोजराज की पुत्री "राजमती" से होता है ।

शुक्लानुसार यह काव्य 100 छंदों में बंटा है और बच्चन सिंह के अनुसार 125 छन्दों में। इसकी रचना 1212 वी. संवत तक मानी जाती है जिसके पक्ष में शुक्ल और हजारी दोनों सहमत हैं परंतु मोतीलाल मेनारिया का मत है कि यह 1546-60 तक का हो सकता है।


●यह 4 खण्डों में बंटा है:- 

1नायक-नायिका का विवाह।

2 नायिका का नायक पर व्यंग्य कसना जिससे नायक रूठकर नायिका को छोड़कर उड़ीसा चला जाता है और 12वर्ष तक वही रहता है।

3 नायिका का विरह वर्णन। (बारहमासा का वर्णन)

4 नायक-नायिका का पुनर्मिलन।

शुक्ल और बच्चन सिंह मानते हैं कि यह कोई वीरकाव्य न होकर एक लघुखंड है। इसमें श्रृंगार रस प्रधान है।



●"खुमाण रासो" के रचनाकार "दलपति विजय" माने जाते हैं । शुक्लानुसार, बच्चन सिंह व मोतीलाल मेनारिया इसकी रचना 17वी शती  मानी जाती है।

इसका नायक मेवाड़ का दिव्तीय खुमाण राजा था। ये वीर रस की रचना मानी जाती है जिसकी प्रमाणिकता का पर संदेह है। इसमें 5000 छंद है। 


●"हम्मीर रासो" के रचयिता "शार्गन्धर" माने जाते हैं जोकि हम्मीर देव के सभाकवि और हम्मीर देव के वंश में राघवदेव के पौत्र थे।

इसमें शार्गन्धर ने रणथंभौर के राजा हम्मीरदेव के युद्धों और उनकी वीरता का वर्णन किया है। इसकी रचना 1357ई. में हुई थी। ये वीर रस का बड़ा ही सुंदर रासो काव्य माना जाता है। इसकी एक प्रसिद्ध पंक्ति है जिसमें स्वाभिमान की झलक दिखती है और क्षत्रिय धर्म का पालन करना भी दिखता है:-

एक अन्य पंक्ति बहु प्रसिद्ध है:-

"ढोला मारिया ढिल्ली महं मुच्छिउ मैच्छ सरीर

पुर जजिल्ला मन्त्रिवर चलिअ वीर हम्मीर"...।

अर्थात दिल्ली में ढोल बजाया जिससे सभी म्लेच्छ मूर्छित हो गए और मन्त्रिवर जज्जल के पीछे वीर हम्मीर चले आ रहे हैं।

बच्चन सिंह के अनुसार "कुंडलिया छंद" का प्रथम प्रयोक्ता "शार्गन्धर" था।


●"परमाल रासो" के रचनाकार "जगनिक" द्वारा रचित यह ग्रँथ बड़ा ही मार्मिक-वीरगाथात्मक रासो काव्य है जिसमें राजा "परमाल" के शौर्य को बड़ी ही बखूबी दिखाया गया है। इसके अतिरिक्त इसमें आल्हा-ऊदल नामक दो वीरों की गाथा का व उनके शौर्य का बड़ा ही जीवंत वर्णन लोकभाषा में किया गया है। शुक्ल इसे 12वी शती का मानते हैं।

परमाल रासो का "आल्हाखंड" 52 छोटी-छोटी लड़ाईयों का खंडकाव्य है जो गेय शैली में लिखा गया है। इसे आज भी लोकसमाज में बड़ी वीरता के साथ उन वीर-सपूतों को याद करते हुए गाया जाता है। 

बच्चन सिंह के अनुसार आल्हखंड में ऊदल द्वारा अपने बाप की मृत्यु का बदला मांडो से लिया था।

                                                

आल्हाखंड को 1865 में फरुखाबाद के तत्कालीन न्यायाधीश "चार्ल्स इलियट" ने अनेक भाटो और चारणों से संपादित करवाया था।

बच्चन सिंह के अनुसार परमाल रासो में "विलायत" शब्द के इस्तेमाल से यह काव्य अंग्रेजों के समय का पता चलता है

                                              

●हेमचंद्र का "कुमारपाल चरित" भी एक तरह का वीर रस का काव्य है जिसमें गुजरात के राजा सोलंकी सिद्धराज जयसिंह के भतीज़े कुमारपाल के शौर्य का वर्णन है।


●बच्चन सिंह के अनुसार मधुकर सिंह का "जयमयंक जसचन्द्रिक" और भट्ट केदार का "जयचंद प्रकाश "12वी शती के दो महत्वपूर्ण ग्रन्थ है जिस में जयचंद के शौर्य और वीरता का वर्णन है। 

                                                

●"कीर्तिलता व कीर्तिपताका" में  विद्यापति ने तिरहुत के राजा कीर्तिसिंह के शौर्य व उनके वीरता का नमूना दिया है जिसमें वह अपने राज्य व प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त करते हैं, जिसमें अपने पिता की मृत्यु का भी बदला लिया जाता है। इस लड़ाई में इब्राहिम शाह उनकी सहायता करते हैं और कीर्तिसिंह असलान को मौत के घाट उतार देते हैं।

कीर्तिलता व कीर्तिपताका में युद्ध, बाजार आदि का वर्णन है।

  


                   (जन्मकाल व रचना)


जोइन्दु -    6ठी शती - परमात्म प्रकाश और योगसार

स्वयम्भू-    8वी शती - पउमचरिउ और रिठनेमिचरिउ

सरहपा-     769ई.- दोहकोष

लुइपा-       773ई. 

शबरपा-     780ई.- चर्यापद

कण्हपा-     820ई. दोहकोष

डोमभीपा-  840ई.- डोम्भीपगीतिका

गोरखनाथ- 9वी शती

देवसेन-      933ई.- श्रावकाचार



पुष्पदन्त-          10वी शती - महापुराण(आदिपुराण)     

                       उत्तरपुराण और यसधर चरिउ


धनपाल-      10वी शती- भविषयतकहा

रोड़ा कवि-   10वी शती- राउरवेल


मुनिराम सिंह-  11वी शती- पाहुड दोहा,                

                 विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार 12वी शती


कुशलाभ-ढोला मारू रा दुहा- 11वी शती

अब्दुर्रहमान-सन्देशरासक-   12वी शती


जिनदत्त सूरी-  12वी शती-  उपदेशरसायन रास

शालीभद्र सूरी- 1184ई.- भारतेश्वर बाहुबली रास

जगनिक-       1173ई.- परमाल रासो

भट्ट केदार-     12वी शती- जयचंद प्रकाश

मधुकर कवि-  12वी शती-जयमयंक जसचन्द्रिका

दामोदर शर्मा- 12वी शती-उक्ति-व्यक्ति प्रकरण

नरपति नाल्ह- 1212ई.- बीसलदेव रासो

अमीर खुसरो- 1255ई.- दो सूखने, खालिकबारी

ज्योतिश्वर ठाकुर- 13-14वी शती- वर्णरत्नाकर

हेमचंद्र-             13-14वी शती- शब्दानुशासन

आसगु-             13वी शती- चनदनबाला रास

चन्दबरदाई-       1343ई.- पृथ्वीराज रासो

शार्गन्धर-          1357ई.- हम्मीर रासो

लक्ष्मीधर-         14वी शती - प्राकृत पैंगलम

नलसिंह-           16वी शती- विजयपाल रासो

दलपति विजय-  1729ई.- खुमाण रासो


अज्ञात -         मुंज रासो

सुमितिगुणी-  नेमिनाथ रास

शेख निसार-  यूसुफ जुलेखा



सहायक ग्रन्थ :- 

1 हिंदी साहित्य का इतिहास , रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2 हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, 2108 संस्करण।

3 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण , 2018।

4 हिंदी साहित्य सम्वेदना और विकास , रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 25वां संस्करण, 2018

5 हिंदी साहित्य का इतिहास, विजेन्द्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन, 1996 संस्करण।

6 हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।




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