हिंदी साहित्य में भाषा का विकास :-
(1) ●विश्व की लगभग 3000 भाषाओं में से "हिंदी" भी एक है जो अपनी वियोगात्मक या विश्लिष्ट रूप में विशेषपन रखने वाली भाषा है।
● ऐसा माना जाता है कि भारत की सभी भाषाओं का उद्गम स्थल "संस्कृत" भाषा ही है, जिसमें से एक "हिंदी" भाषा भी निःसृत हुई है। हिंदी भाषा संस्कृत से होती हुई पाली, प्राकृत, अपभ्रंश और अपभ्रंश में भी उसके क्षेत्रीय आधार पर बंटे भेदों से निकलकर आधुनिक हिंदी के रूप में विकसित व स्थापित हुई है और उसी में से हिंदी की उपभाषाओं व उपबोलियों आदि का जन्म हुआ है।
परन्तु समकालीन विद्वानों ने "हिंदी" की उतपत्ति "अपभ्रंश" से मानी है क्योंकि अपभ्रंश वियोगात्मक भाषा थी और हिंदी को भी वियोगात्मक भाषा माना जाने से वह अपभ्रंश के सबसे निकट बैठती है। लिपि और व्याकरण के आधार पर भी अपभ्रंश ही एक ऐसी भाषा है जो वर्तमान हिंदी के सबसे नजदीक देखी जाती है। क्योंकि संस्कृत से यदि हिंदी की तुलना की जाती तो संस्कृत में शब्द ह 24 रूप और लिंग के आधार पर भी उसके 3 रूप दिखे जाते हैं परन्तु अपभ्रंश और हिंदी के साथ ऐसा नहीं है। यहाँ पर मूल व विकारी रूप के साथ स्त्रीलिंग व पुल्लिंग रूप ही प्रचलित हैं अतः "हिंदी" की जननी "अपभ्रंश" है।
(2) भाषा :- भाषा "संस्कृत" के शब्द "भाष" धातु से निष्पन्न हुआ है जिसका अर्थ है "व्यक्त वाणी"। भाषा उसे कहते हैं जो वाणी के रूप में अभिव्यक्त की जाती है। अर्थात जिसके माध्यम से हम अपने विचारों को आदान प्रदान करते हैं। यह और बात है कि समय के साथ भाषा का रंग-रूप भी बदला है और समाज में सामान्य तौर पर केवल मौखिक व लिखित भाषा को ही सबसे ज्यादा तरज़ीह दी जाती है परन्तु कुछ विशेष रूप में सांकेतिक भाषा का भी अपना दृढ़ अस्तिव है जिसके ऊपर कई लोग आश्रित हैं।
(3) भाषा की परिभाषा:- (भारतीय विद्वान)
1 "भाषा वह साधन है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचारों को दूसरों पर भली भाँति प्रकट करता है और दूसरों के विचार आप स्पष्टता समझ सकता है"...। (कामताप्रसाद गुरु)
2 "भाषा निश्चित प्रयत्न के फलस्वरूप मनुष्य के मुख से निःसृत वह सार्थक ध्वनि-समष्टि है, जिसका विश्लेषण और अध्ययन हो सकें"..। (भोलानाथ तिवारी)
●(पश्चिमी विद्वान)
1 "भाषा उस स्पष्ट, सीमित तथा सुसंगठित ध्वनि को कहते हैं जो अभिव्यंजना के लिए नियुक्त की जाती है"...।
(क्रोचे)
2 "ध्वन्यात्मक शब्दों द्वारा विचारों का प्रकटीकरण ही भाषा है"..।
(हेनरी स्वीट)
(4) ●भारत के प्रमुख रूप से 2 भाषा परिवार हैं:-
1 आर्यभाषा परिवार - समस्त उत्तर भारत की भाषाएँ ।
2 द्रविड़ भाषा परिवार- समस्त दक्षिण भारत की भाषाएँ।
भारत के भाषापरिवार में 4 भाषा परिवार हैं जैसे भारोपीय 73% , द्राविड़ 25%, ऑस्ट्रिक 1.3%, चीनी तिब्बती 0.7% बोलने वालों की सँख्या है।
(5) ●भारतीय आर्यभाषाएँ:-
1 प्राचीन भारतीय आर्यभाषा:- 1500 ई.पू. से 500 ई.पू तक है जिसके दो भेद हैं:-
A- वैदिक संस्कृत- 1500ई.पू. से 1000ई.पू.तक।
B- लौकिक संस्कृत- 1000ई.पू.से 500ई.पू. तक।
●"वैदिक संस्कृत" में ही सभी प्राचीन भारतीय धार्मिक-पौराणिक-वेद-ब्राह्मण- उपनिषद-महाकाव्य आदि लिखे गए हैं। इसी को "वैदिक साहित्य" कहा गया।
●"लौकिक संस्कृत" में संस्कृत साहित्य के नाटक, काव्य ,शास्त्र , कालिदास के महाकाव्य व नाटक ,भरतमुनि का नाट्यशास्त्र, मुद्राराक्षस के महाकाव्य, काव्य, नाटक, पाणिनि का अष्टाध्यायी,आदि ग्रन्थ है।
2 मध्यकालीन आर्यभाषा :- इन सभी भाषाओं का प्रथम प्रमाणिक रूप अशोक के अभिलेखों से प्राप्त होता है। इसमें मुख्यतः निम्न भाषाओं को संकलित किया गया है:-
A- पालि- प्रथम प्राकृत 500ई.पू. से लेकर 1 ई. तक।
B- प्राकृत- द्वितीय प्राकृत 1ई.से 500ई. तक।
C- अपभ्रंश -तृतीय प्राकृत 500 ई.से 1000ई. तक।
D- अवहट्ट - चतुर्थ प्राकृत 1100 से 1400ई.तक।
यहाँ पर प्रथम , द्वितीय "प्राकृत" इसलिए नाम दिया जा रहा है क्योंकि विद्वानों के अनुसार प्राकृत ही प्रथम "देसीभाषा" कहलाई जो संस्कृत से निकलकर लोक तक पहुँची थी। उसके बाद पालि, प्राकृत अपभ्रंश जोकि साहित्यिक नजरिये से इसी क्रमानुसार अस्तित्व में मानी गई हैं । फिर वह चाहे लोक की भाषा रही हो या साहित्य की, उसे प्रथम, दिव्तीय, तृतीय प्राकृत का नाम देकर उल्लेखित किया गया।
●"पालि"- प्रथम प्राकृत - पालि का अर्थ है"बुध वचन"। यह भारत की "प्रथम देशभाषा" है। सम्पूर्ण बौद्ध धर्म का साहित्य पालि भाषा में ही लिखा गया था। बौद्ध धर्म के "त्रिपिटक" पालि भाषा में ही लिखे गए हैं जिसमें जीवन और धर्म-कर्म आदि सम्बन्धी उपदेश दिए गए हैं।
"सूतपिटक"- बौद्ध भिक्षुओं के आचरण सम्बन्धी उपदेश।
"विनयपिटक"- जीवन यापन के उपदेश।
"अभिधम्मपिटक"- धर्म सम्बन्धी उपदेश।
●"प्राकृत" - दिव्तीय प्राकृत - (प्राक+ कृत= पहली सहज भाषा)..।
प्राकृत का सामान्य अर्थ :- सहज या स्वाभाविक होता है। जैन साहित्य का बहुत कुछ भाग प्राकृत में भी लिखा गया है।
प्राकृत के उत्तपत्ति के सम्बंध में 2 मत है:-
1 प्राकृत प्राचीन जनभाषा है:- "नामिसाधु" ने कहा है कि प्राक + कृत से बना है जिसका अर्थ है "पहले की बनी हुई भाषा"। जो मूल से चली आ रही है उसको प्राकृत कहते हैं। नामिसाधु में अपने "काव्यालंकार" में कहा है कि " सकल जगत के प्राणियों के व्याकरण आदि संस्कारों से रहित (इतर, हटके) सहजवचन व्यापार को प्रकृति कहते हैं। उससे उत्पन्न वही प्राकृत है।
●"वाक्पतिराज" ने भी अपने ग्रँथ "गउड़बहो" में कहा है कि "जिस प्रकार जल सागर में ही मिलता है और वहीं से उत्पन्न होता है इसी प्रकार सभी भाषाएँ प्राकृत में मिलती है और यहीं से ही निकलर आगे बढ़ी हैं जिसमें से सभी आर्यभाषाएँ निकली हैं"।
2 प्राकृत की उत्पत्ति संस्कृत से:- जो मूल संस्कृत से आगत अर्थात निकली है वह प्राकृत है"..। (हेमचंद्र)
●संस्कृत की विकृति प्राकृत है"...। (लक्ष्मीधर के "भाषाचंद्रिका" से)
अर्थात सभी मतों को देखने के बाद यह निश्चित हो जाता है कि वैदिक संस्कृत के अतिरिक्त उस समय जो भी संस्कृत बोली जाती थी ,जो जनभाषा के तौर पर प्रयोग की जाती थी वह प्राकृत थी। जो परिष्कृत-परिनिष्ठित संस्कृत नहीं थी, वेदों के अनुकूल नहीं थी उसे पंडितों ने, विद्वानों ने हीन भाषा माना और उसी मूल भाषा से निकली प्राकृतिक रूपी (सहजरूप में ) भाषा "प्राकृत" कहलाने का गौरव हासिल कर पाई।
एक अर्थ यह भी हो सकता है कि जब किसी भाषा को समाज अपने कार्य व्यवहार के आधार पर प्रयोग करता है तब उसकी व्यापकता व प्रचार को देखते हुए उसे साहित्य की भाषा बनाने की कोशिश करता है। धीरे-धीरे उसे व्याकरणिक दृष्टि से परिमार्जित करना और मानक रूप देना शुरू किया जाता है और एक समय ऐसा भी आता है जब वह भाषा अपना पुराना अस्तित्व छोड़कर आगे बढ़ जाती है व साहित्यिक रूप अपना लेती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उसका अस्तित्व ही मिट जाता है। लोक में उसका प्रयोग पहले की तरह कायम रहता है। ऐसा ही कुछ प्राकृत के साथ भी हुआ और बाकी अन्य आर्य भाषाओं के साथ भी।
यही प्राकृत भाषा आने वाले समय में अपने पूर्ण विकसित रूप में अभिव्यक्त हुई। और जब इस भाषा में साहित्य लिखा जाने लगा तो इसका साहित्यिक समय मूलतः 1ई.से 500ई. तक माना गया ।
अब सभी विद्वानों ने प्राकृत को संस्कृत से उत्पन्न भाषा मान लिया है। और "दिव्तीय प्राकृत" अर्थात प्राकृत को "साहित्यिक प्राकृत" भी मान लिया है।
●भरतमुनि ने अपने "नाट्यशास्त्र" में सर्वप्रथम प्राकृत भाषाओं के बारे में चर्चा की थी और उसके भेदों का वर्णन किया है:-
मुख्य प्राकृत गौण प्राकृत
मागधी शाबरी
अवन्तिज़ा आभीरी
प्राच्या चाण्डाली
सुरसेनी(शौरसेनी) सचरी
अर्धमागधी द्राविड़ी
बाह्लीक उदरजा
दाक्षिणात्य(महाराष्ट्री) वनचेरी
ये जो प्राकृत के भेद दिए गए हैं वह स्थान विशेष व वहाँ की संस्कृति के आधार पर वर्गीकृत है क्योंकि यह सभी स्थान भारत के राज्य-प्रांत-जनपद आदि के आधार पर बाँटे गए हैं । जैसे-जैसे भाषा का विकास होता गया वैसे -वैसे उस भाषा का भी नाम इन स्थान विशेष के आधार पर बदलता गया। उदहारणस्वरूप:- पहले मागधी प्राकृत तो बाद में मागधी अपभ्रंश हुआ और इसी तरह ये क्रम आगे देखा जा सकता है :- शौरसेनी प्राकृत, शौरसेनी अपभ्रंश आदि।
विद्वान "सुनीतिकुमार चटर्जी" ने भी कुछ इस तरह से भाषाई तर्क रखे हैं । भाषा का विकास तो होता गया परन्तु स्थान विशेष में कोई खासा परिवर्तन न होने के कारण उनका भाषाई नाम ही बदला। वर्तमान में जो भी हिंदी की बोलियाँ निकली वह इन्हीं अपभ्रंशों में से उपभाषा और बोली के रूप में निकली। इसलिए कुछ समकालीन विद्वानों ने हिंदी की पूर्वज भाषा को अपभ्रंश माना है नाकि संस्कृत को जिसका सम्बन्ध हम ऊपर स्पष्ट कर चुके हैं।
●हेमचन्द्र ने अपने "प्राकृत व्याकरण" में प्राकृत के 3 भेद बताएँ हैं:-
1आर्षी(अर्धमागधी) 2 पैशाची-चूलिका 3 अपभ्रंश।
हेमचन्द्र की चूलिका-पैशाची को "दंडी" ने "भूतभाषा' कहा है और "महाराष्ट्री" को सबसे अच्छी प्राकृत भाषा कहा है।
●महाराष्ट्री को प्राकृत व्याकरणों में आदर्श , मानक प्राकृत माना गया है। इस प्राकृत का मूल स्थान महाराष्ट्र है।
●डॉ हार्नले के अनुसार महाराष्ट्री का अर्थ है "महान राष्ट्र की भाषा" अर्थात राजपुताना और मध्यदेश की भाषा।
●राजशेखर ने प्राकृत को "मीठी" और संस्कृत को "कठोर" भाषा कहा है।
●"अपभ्रंश" - तृतीय प्राकृत : - अपभ्रंश मध्यकालीन और आधुनिक आर्यभाषाओं के "बीच की कड़ी" है इसलिए विद्वानों ने इसे "सन्धिकालीनभाषा" भी कहा है। वैसे तो इसका मूलतः साहित्यिक समय 500ई. से 1000ई. तक ही माना है परन्तु व्यापक स्तर पर इसका साहित्यिक समय 8वी से लेकर 14वी शती तक माना गया है।
1000ई. के बाद आदिकालीन साहित्य में हिंदी के कुछ कुछ स्पष्ट रूप दिखने लगे गए थे परन्तु न उसे स्पष्ट हिंदी का काल कहा गया और न ही उसे पूर्णरूप से अपभ्रंश काल। वह दोनों की सन्धि था इसलिए इस भाषा को सन्धिकालीन भाषा भी कहा जाता है। उस समय के काव्यों में दोनों ही भाषाओं के रूप स्पष्ट थे।
मुख्य रूप से जब भी किसी काल विशेष में एक भाषा के अंर्तगत या उसके समक्ष किसी अन्य भाषा का आगमन शुरू हो जाता है या उसके लक्षण दिखने लगे जाते हैं और तत्कालीन साहित्य में उसे भी जगह मिलनी शुरू हो जाती है तो वह सन्धिकालीन भाषा का रूप धारण कर लेती है।
इसे आसान भाषा में ऐसे भी समझ सकते हैं कि जब रीतिकाल के अंतिम दिनों में ब्रज के साथ खड़ीबोली का भी आगमन शुरू हो चुका था तो तत्कालीन साहित्य में इस्तेमाल भाषा को भी सन्धिकालीन भाषा कहा जा सकता है जिसमें ब्रज के साथ खड़ीबोली के भी शब्द आ रहे थे और इसका प्रभाव द्विवेदी युग तक हमें दिखाई देता है।
● अपभ्रंश की अन्य परिभाषा:-
1 जब भाषा के सम्बंध में सुसंस्कृत रूप न रहकर पंडितों की नजरों में वह भाषा बिगड़ी हुई मानी जाती है तो उसे अपभ्रंश की संज्ञा दी जाती है। अर्थात अपभ्रंश वह भाषा होती है जो मूल रूप से बिगड़ी हुई हो और साहित्य के लिए स्वीकार्य न हो। परन्तु विद्यापति जैसे उत्कृष्ट कवि ने इस भाषा का भी प्रयोग किया व अन्य आदिकालीन कवियों ने भी।
2 अपभ्रंश का सर्वप्रथम प्रयोग पतंजलि के "महाभाष्य" में मिलता है जहाँ उसका इस्तेमाल "अपशब्द" के रूप में हुआ है।
3 अपभ्रंश के सबसे प्राचीन उदहारण भरतमुनि के "नाट्यशास्त्र" में मिलते हैं जहाँ "विभ्र्ष्ट" के रूप में इस भाषा का उपयोग हुआ है। साथ ही इन्होंने इसे "अभिरोक्ति" भी कहा है।
4 भर्तृहरि ने "संस्कारहीन शब्दों" को अपभ्रंश कहा है। इस प्रकार से असाधु शब्द ही अपभ्रंश कहलाये। अर्थात जब मूल शब्दों को तोड़-मरोडकर या उसे अपनी सुलभता के साथ, मुख-सुख के आधार पर शब्दों को देसीरूप में प्रयोग किया जाता है तब वह अपभ्रंश भाषा कहलाती है।
5 कालिदास के "विक्रमोवर्षी" नाटक में भी निम्न वर्ग द्वारा प्रयोग भाषा को "अपभ्रंश" माना है।
6 आचार्य दंडी में अपने ग्रन्थ "काव्यादर्श" में अपभ्रंश को "अभीर" कहा है, अर्थात अभीरों की भाषा। इससे यही अर्थ निकलता है कि अभीरों (अहीर जाती) की भाषा जो गोवी, गाँवी, गोणि, गोपोतिलिका,असाधु, नाम से प्रचलित थी बाद में प्रचलन के कारण यह साहित्यिक रूप में आ गई होगी।
7 शुक्ल के अनुसार अपभ्रंश नाम से पहले पहल वलभी के राजा "धारसेन द्वितीय" के शिलालेख में मिलता है जिसमें उन्होंने अपने पिता "गुहसेन" 593ई. को संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश का कवि माना है।
"जैन-सिद्ध योगियों की भाषा भी अपभ्रंश थी"।
"जब प्राकृत बोलचाल न रही तभी से अपभ्रंश साहित्य का विकास मानना चाहिए"।
"प्राकृत की अंतिम अवस्था प्राकृताभास या अपभ्रंश कहलाती थी"।
8 भोलानाथ तिवारी और उदयनारायण तिवारी के अनुसार भाषा के अर्थ में अपभ्रंश शब्द का प्रथम प्रयोग "चंड" ने अपने "प्राकृत लक्षण" में 6ठी शती में किया है।
9 इसके अतिरिक्त अपभ्रंश भाषा का प्रारंभ कब से हुआ उसके लिए 3 मत हैं।
1 डॉ उदयनारायण तिवारी की पुस्तक "हिंदी भाषा का उद्गम और विकास" में 700ई. माना है।
2 नामवर सिंह ने "हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योगदान" में भी 700ई. माना है।
3 भोलानाथ तिवारी 500ई.मानते हैं।
10 अपभ्रंश के साथ देसी शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। "स्वयंभू" ने "पउम चरिउ" की भाषा को "देसी भाषा" कहा है।
11 रुद्रट के "काव्यालंकार" में कहे एक सूत्र की नामिसाधु नामक विद्वान ने इस सूत्र के आधार पर प्राकृत के समानांतर ही अपभ्रंश की भी स्थापना मानी है।
प्राकृत के साथ ही अपभ्रंश की स्थापना यहाँ पर एक प्रश्न खड़ा कर देती है कि, यदि प्राकृत जोकि प्रथम सहजभाषा मानी गई है जिसका उद्गम संस्कृत से हुआ था और अपभ्रंश भी जनता की भाषा थी, जिसे (जनभाषा/लोकलभाषा/ बोलचाल की भाषा) प्रत्येक साहित्यिक भाषा के समानांतर देखा जा सकता है। इस आधार पर तो प्राकृत और अपभ्रंश में सम्बन्ध स्थापित हो जाता है क्योंकि दोनों ही लोक की भाषाएं थी जिसका प्रयोग निम्न वर्ग के लोग, सामान्य लोग आदि करते थे।
लेकिन इस अनसुलझे प्रश्न का उत्तर हजारीप्रसाद जी अपनी पुस्तक "हिंदी साहित्य की भूमिका" 1953 में देते हैं कि " यह बात स्मरण योग्य है कि यद्यपि प्राकृत में लिखे गए काव्यों के बाद ही अपभ्रंश भाषा में काव्य लिखे गए परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि प्राकृत नाम की कोई भाषा पहले बोली जाती थी और अपभ्रंश नाम की भाषा बाद में बोली जाती थी। असल में अपभ्रंश लोक में प्रचलित भाषा का नाम है जो नाना काल में नाना स्थान में नाना रूप में बोली जाती है" (17)..।
अर्थात प्राकृत और अपभ्रंश को एक ही रूप में देखा जा सकता है। इस तरह की भाषा हमेशा थी, है और आगे भी रहेगी क्योंकि जब भी किसी काल विशेष में कोई साहित्यिक भाषा होती है तो उसके समानांतर सामान्य रूप से एक आम बोलचाल की भाषा भी प्रचलन में रहती है जिसे इस्तेमाल करने के लिए किसी विशेष नियमों की आवश्यकता नहीं होती। जिसे जनता अपनी समझ और विचारों के आदान प्रदान के लिए इस्तेमाल करते हैं, वह भाषा प्रत्येक काल की अपभ्रंश कहलाएगी। यह भाषा तबतक अस्तित्व में रहेगी जब तक इस धरती पर मनुष्य जाति है। क्योंकि प्रत्येक साहित्यिक भाषा के समानांतर एक लोकल भाषा भी चलती है। इसलिए साहित्यिक भाषा को मानक रूप दिया जाता है और अन्य को लोकल या जनभाषा।
12 जब अपभ्रंश काव्य में प्रयुक्त हुई तब वह अपभ्रंश कहलाई अन्यथा आम जनता में वह देशभाषा कहलाई क्योंकि साहित्यिक भाषा में शब्दों का चयन सीमित और व्याकरणिक आधार पर होता है, देशभाषा में किसी भी शब्द को इस्तेमाल कर सकने की छूट रहती है। किसी तरह के व्याकरणिक नियम की आवश्यकता नहीं होती।
● अपभ्रंश के अन्य नाम :- विभ्र्ष्ट, अभीर, अवहन्स, अवहट्ट, अवहत्थ, औहट, अवहत आदि हैं। परन्तु साहित्य के स्तर पर इसका अर्थ अलग महत्व रखता है।जैसे - प्राकृत से निकलने वाली भाषा का साहित्य।
सहायक ग्रन्थ :-
1 हिंदी साहित्य का इतिहास ,रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2018।
2 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018।
3 हिंदी साहित्य की भूमिका, हजारीप्रसाद द्विवेदी, राजकमल प्रकाशन, 10वां संस्करण ,2019।
4 हिंदी साहित्य और सम्वेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 25वां संस्करण, 2018।
5 हिंदी का गद्य साहित्य, रामचन्द्र तिवारी, विश्विद्यालय प्रकाशन, बनारस, 12वां संस्करण , 2018।
6 हिंदी भाषा ,कैलाशचन्द्र भाटिया, साहित्य भवन प्रकाशन , इलाहाबाद, संस्करण 2010।
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