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Tuesday, October 13, 2020

हिंदी भाषा भाग:- 2

 


●अपभ्रंश और हिंदी का सम्बंध:-


1 संस्कृत में शब्द के 24 रूप होते हैं पर अपभ्रंश में शब्द के 2 ही रूप होते थे मूल और विकारी। उसी प्रकार से हिंदी में भी यही दो रूप लिए गए। "मूल रूप" साहित्यिक होता है और "विकारी रूप" देशभाषा का या बोलचाल का।

2 अपभ्रंश की तरह हिंदी में भी नपुंसक लिंग नहीं होता।

3 संस्कृत, पालि, प्राकृत भाषा संयोगात्मक भाषा है परन्तु अपभ्रंश वियोगात्मक भाषा है जो हिंदी के वियोगात्मक रूप से मेल खाती है।

4 अपभ्रंश में प्रयोग "तद्भव शब्दों" को हिंदी में स्वीकारा गया।


●अपभ्रंश के भेद:- 


(1) वैसे मोटे तौर पर यही वर्गीकरण माना जाता है।

अपभ्रंश                   आर्यभाषा

शोरसेनी  -         पश्चिम हिंदी, राजस्थानी, गुजराती

पैशाची  -             पंजाबी, लहन्दा

ब्राचड़  -              सिंधी

खस  -                पहाड़ी

अर्धमागधी  -       पूर्वी हिंदी

मागधी  -            बिहारी , बंगला, असमिया, उड़िया

महाराष्ट्र -            मराठी


● पहाड़ी और पंजाबी पर शौरसेनी अपभ्रंश का प्रभाव देखा जाता है। इस तथ्य को आप जरूर याद रखे क्योंकि कई जगह ये तथ्य दिए नहीं गए हैं और आने वाली परीक्षाओं में यह पूछा भी जा सकता है।


●अपभ्रंश का विस्तार:-


अपभ्रंश का विस्तार बहुत अधिक था। यह भाषा के रूप में उत्तरभारत से बंगाल, बंगाल से लेकर महाराष्ट्र तक स्वीकृत थी। महापंडित राहुल अपनी पुस्तक "हिंदी काव्यधारा" में कहते हैं - " जहाँ सरहपा और शबरपा बिहार-बंगाल के निवासी थे वहाँ अब्दुर्रहमान का जन्म मुल्तान में हुआ था। स्वयम्भू और कनकामर शायद अवधी और बुंदेली क्षेत्र युक्त प्रांत के थे तो हेमचन्द्र और सोमप्रभ सूरी गुजरात के। x x x इस प्रकार हिमालय से लेकर गोदावरी और सिंध से ब्रह्मपुत्र तक इस साहित्य के निर्माण में अपभ्रंश ने हाथ बटाया"..।

इससे सिद्ध होता है कि 11वी शती तक अपभ्रंश का प्रसार समस्त उत्तर भारत और दक्षिण में हो गया था। अपभ्रंश इस विस्तृत देश की जनभाषा थी।

●अपभ्रंश मुख्यतः प्राकृत शब्दकोश और देशी भाषाओं के व्याकरणिक ढाँचे को लेकर खड़ा हुआ। इसको "ग्रामभाषा" भी कहा गया।

●"अवहट्ट"- यह अपभ्रंश का परवर्ती रूप है जिसे "सुनीतिकुमार चटर्जी" ने अपभ्रंश और आधुनिक भारतीय भाषाओं के बीच की कड़ी कहा है। 

"अवहट्ट" अपभ्रंश और आधुनिक आर्यभाषाओं के बीच की कडी है जिसका समय 900ई. 1100ई. तक माना गया है परन्तु विद्यापति ने इस भाषा का प्रयोग14वी शती में भी किया है। विद्यापति ने इसे देसीभाषा का नाम देकर प्रयोग किया है क्योंकि उनके अनुसार यह मीठी और जनता की भाषा है।

 "देसिल बअना सब जन मिट्ठा

 तँ तैसन जम्पओ अवहट्ठा"

काफी समय तक इस भाषा को अपभ्रंश के अंतर्गत ही उसकी उपरूप की भाँति देखा जाता रहा और इस बात में कोई 2 राय नहीं है कि शुरुआत में इस भाषा में अपभ्रंश के ज्यादात्तर लक्षण दिखते थे परन्तु धीरे-धीरे यह कम होते गए और वह आधुनिक आर्य भाषाओं की तरफ बढ़ती गयी।

●सर्वप्रथम "बाबू सक्सेना राम" ने इस भाषारूप पर अपने ग्रन्थ "कीर्तिलता" में इसकी चर्चा की। उनके अनुसार कीर्तिलता की भाषा (अवहट्ठ) आधुनिक मैथिली और मध्यकालीन प्राकृत के बीच है। उसी ग्रन्थ में मैथिली अपभ्रंश की संज्ञा भी दी गयी है।

● "डॉ शिवप्रसाद सिंह" ने अपने ग्रँथ "कीर्तिलता और अवहट्ट" (1955) में बड़े विस्तार के साथ स्पष्ट किया है। उनके अनुसार शौरसेनी अपभ्रंश राजनीतिक और भाषा वैज्ञानिक कारणों से राष्टभाषा का रूप ले रहा था। उसी का परवर्ती रूप ईसा की 11वी शती से 14वी शती तक उत्तर भारत की साहित्यिक भाषा बना। यह अवहट्ट थोड़े प्रांतभेदों के अलावा सर्वत्र एक सा ही है। x x x "ईसा की 11वी शती से ईसा की 14वी शती तक के काल को हम अवहट्ट का काल मानते हैं" (पृ 24 व 31)

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि "कीर्तिलता की भाषा पर मैथिली का रंग अवश्य है परन्तु उसके मूल में शौरसेनी अपभ्रंश की प्रवृतियाँ है इसे कौन अस्वीकार कर सकता था"..।


(6) ● प्रारम्भिक हिंदी (पुरानी हिंदी)

मूलतः अपभ्रंश के परवर्ती रूप को ही पुरानी हिंदी माना गया है परन्तु इस पर भी कुछ विद्वानों के थोड़े भिन्न मत हैं। 

जहाँ एक ओर गुलेर जी अपभ्रंश के परवर्ती रूप को पुरानी हिंदी कहते हैं और जिनका मत सबसे ज्यादा प्रभावी और स्वीकार्य भी है। इसी मत की पुष्टि डॉ हरदेव बाहरी भी करते हैं कि "11वी शती की परवर्ती अपभ्रंश से पुरानी हिंदी का उदय माना जाता है"..। परन्तु आचार्य शुक्ल , राहुल जी और रामकुमार वर्मा इसे थोड़ा और पीछे ले जाकर अपभ्रंश से जोड़ देते हैं। 

आचार्य शुक्ल अपने इतिहास में कहते हैं :-"हिंदी काव्य भाषा के पुराने रूप का पता हमें विक्रम की 7वी शती के अंतिम चरण में लगता है"..। x x x देश भाषा मिश्रित अपभ्रंश अर्थात पुरानी हिंदी की कावयभाषा है'..(पृ 10, 12)

●सर्वप्रथम "पुरानी हिंदी" नामक विषय पर चर्चा गुलेरी जी ने अपने शोध आलेख 1921 में "पुरानी हिंदी" नामक से की थी। यह उनका आलेख शायद सरस्वती में छपा था और बाद में 1948 के समय "नागरी प्रचारिणी सभा" ने पुस्तकाकार कराके प्रकाशित कराया और तत्कालीन साहित्य मंत्री "आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र" ने अपने वक्तव्य में लिखा था कि - "विचार था कि इसमें उदधृत अपभ्रंश या अवहट्ट के अवतरणों की वैज्ञानिक टीका-टिप्पणी कराकर जोड़ दी जाए".।

●गुलेरी जी ने अपनी पुस्तक के वक्तव्य में कहा था " प्रायः यह समझा जाता रहा है कि उन्होंने "अपभ्रंश" को ही पुरानी हिंदी की संज्ञा दी। ऐसा नहीं है, उन्होंने अपभ्रंश के 2 रूप बताए हैं:-

पुरानी अपभ्रंश (प्रारंभिक अपभ्रंश)

पिछली अपभ्रंश (उत्तरकालीन अपभ्रंश)

"पुरानी अपभ्रंश संस्कृत और प्राकृत से मिलती है और पिछली पुरानी हिंदी से"...।

उनका तात्पर्य था कि आगे और व्यापक खोज होनी चाहिए जिससे निश्चित रूप से यह पता लगाया जा सके कि कहाँ तक के साहित्य को अपभ्रंश माना जाए और कहाँ से प्राप्त साहित्य को अपभ्रंश न कहकर "पुरानी हिंदी" कहा जाए। जहाँ से हिंदी आरंभ होती है, इसका निर्णय करना कठिन किंतु रोचक और बड़े महत्व का है। इन दो भाषाओं के समय और देश के विषय में कोई स्पष्ट रेखा खींची जा सकती "..।

●चन्द्रधर शर्मा गुलेरी जी ने पुरानी हिंदी और अस्तित्व में आती हुई आधुनिक आर्यभाषाओं के साथ देसीभाषाओं के आगमन पर नदी के रूपक को बाँधकर स्पष्ट करते हुए कहा है कि :- " बाँध से बचे हुए पानी की धाराएँ मिलकर नदी का रूप धारण कर रही थी।उनमें देशी की धाराएँ भी आकर मिलती गई। देशी और कुछ नहीं, बाँध से बचा हुआ पानी था जो नदी मार्ग पर चला आया। उसे भी कभी- कभी छानकर नहर में ले लिया जाता था। बाँध का जल भी रिसता-रिसता इधर मिलता आ रहा था। पानी बढ़ने से नदी की गति वेग से निम्नाभिमुखी हुई, उसका अपभ्रंश नीचे को बिखरना। अब सूत के नये किनारे और नियत गहराई नहीं रही"..(पुरानी हिंदी)..।


(7) ●हिंदी और हिन्दीतर बोलियों का परिचय:-


हिंदी शब्द की उतपत्ति:- हिंदी (नष्ट करना) +टू (दुष्ट) अर्थात हिन्दू का अर्थ "जो दुष्टों का विनाश करने वाला हो", "हीनो को दूषित करने वाला"। परन्तु ये मत कल्पना पर आधारित है।

भोलानाथ तिवारी के अनुसार "हिन्दू" शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 7वी शती के अंतिम चरण के ग्रन्थ "निशीथचूर्णी" में मिलता है।

●"हिन्दू शब्द" फारसी है जो संस्कृत के सिंधु का फारसी रूपांतरण है। सिंधु शब्द का सर्वप्रथम ऋग्वेद में मिलता है। जहाँ उसका प्रयोग नदी के रूप में हुआ था। 

●500 ई.पू में ईरानियों का कब्जा सिंधु के आसपास के क्षेत्र पर था और सिंधु शब्द ईरानी में हिन्दू हो गया। क्योंकि उनकी भाषा व्याकरण में शायद "स" को "ह" पढा जाता था। यही हिन्दू शब्द आगे चलकर हिंदुस्थान, हिंदुस्तान आदि बना।

●हिन्द शब्द में "इक" प्रत्यय जुड़ने से हिन्दीक बना जिसका अर्थ था "हिन्द का"। कल्पांतर में "क" हटने और "ई" जुड़ने से हिंदी बना अर्थात हिन्द का वासी।

आगे चलकर यह भाषा "हिन्द की भाषा" के रूप में हुआ।

●ग्रीक के लोग सिंधु को "इंदोस" कहते थे उसी से वहाँ के निवासियों को "इन्दोई"तथा प्रदेश को "इंदिके" या "इंदिका" कहा। "इंदिका" शब्द जो अंग्रेज़ो के आने से "इंडिया" हो गया।

●किसी भी भारतीय प्राचीन ग्रन्थ में हिंदी शब्द का प्रयोग नहीं है। केवल कालकाचार्य के जैन महाराष्ट्री में हिंदुग शब्द का प्रयोग है।


(8) ●भाषा के रूप में हिंदी का प्रयोग:-


1 भाषा के सम्बंध में हिंदी का प्रयोग अरब और फारस से होता है।

2 ईरान के बादशाह "नौशेरवाँ" ने 6ठी शती में अपने दरबारी हकीम को "पंचतंत्र का अनुवाद" लिखने को कहा तब उन्होंने "जबान-ए-हिंदी" में उसे किया। उस हिंदी का अर्थ संस्कृत-पालि-प्राकृत भाषाओं के सम्बंध में था।

3 भारत के फ़ारसी कवि "ओफी" ने 1228 ई. में "हिंदवी" शब्द का प्रयोग भारत की मध्यदेश की देसीभाषाओ के लिए किया था।

4 तैमूरलंग के पोते "शरफुद्दीन यजदी" ने अपने ग्रँथ "जफरनामा" 1424 ई. में "हिंदी भाषा" का अर्थ "हिंदी" के लिए किया था।

5 धीरेंद्र वर्मा के "हिंदी साहित्य कोष" के अनुसार 13वी 14वी शती में देसीभाषाओ को हिन्दीक, हिन्दुई, हिंदी आदि नाम "अबुलहसन" ने दिया जो सबसे महत्वपूर्ण है।

6 भोलानाथ तिवारी और उदयनारायण तिवारी ने अबुलहसन के द्वारा प्रयुक्त "हिंदी" को सन्दिग्ध मानते हुए उसे भारतीय मुसलमानों और मध्यदेशीय भाषा के लिए इस्तेमाल माना है।

7 हिंदुवी या हिंदुई शब्द वस्तुतः हिंदवी का ही है जिसका अर्थ था हिंदुओ की भाषा जो आगे चलकर 18 शती तक हिंदुओ के लिए रूढ़ हो गई ।

8 "उर्दू" शब्द मूलतः तुर्की के है जिसका अर्थ है "शाही शिविर या खेमा" (दल)..।

9 प्रो. ताराचंद का कहना है कि उर्दु का शुरूआती रूप "मुसहफ़ी" में मिलता है।

10 हिंदी का नवीन लिखित अर्थ में प्रयोग सर्वप्रथम 1815 ई.फोर्ट विलियम कॉलेज में कैप्टन टेलर ने किया।


(9) ●हिंदी उपभाषाएँ और बोलियों का परिचय:- 

हिंदी भाषा भाषी क्षेत्र अम्बाला (हरियाणा) से लेकर पूर्णिया(पूर्णिया) और बद्रीनाथ(उत्तराखंड) से लेकर खण्डवा (मध्यप्रदेश) तक फैला है। इसके अंतर्गत9 राज्य - उत्तरप्रदेश, हरियाणा, बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश,उत्तराखंड तथा 1 केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली भी आता है। इन राज्यों में देश की 43% जनसंख्या रहती है।

●सर्वप्रथम एक अंग्रेज प्रशासनिक अधिकारी जॉर्ज ग्रियर्सन ने 1889ई. में "मॉर्डन वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान" अपने साहित्य इतिहास में हिंदी की उपभाषाओं और बोलियों का परिचय दिया था। बाद में ग्रियर्सन ने 1894 से 1927 तक के 33 वर्षों के अपने अध्धयन में "ए लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया" नाम की भाषा आधारित पुस्तक निकाली। इसमें हिंदी की उपभाषाओं, बोलियों को उसके व्याकरणिक तथा शाब्दिक आधार पर उसका क्षेत्र को निर्धारित किया गया। 

इसके बाद "सुनीतिकुमार चटर्जी" ने बंगला भाषा का उद्भव और विकास "origin and development og Bengali language" 1926 में लिखा। चटर्जी पहाड़ी भाषाओं को इसमें नहीं गिनते।

धीरेंद्र वर्मा "हिंदी भाषा का इतिहास" 1933 ई. का वर्गीकरण सुनीतिकुमार चटर्जी के आधार पर ही किया। केवल उसमें संशोधन के आधार पर पहाड़ी को जोड़ दिया गया।

इसके अलावा कई विद्वानों के अपने अलग अलग मत है हिंदी की उपभाषाओं और बोलियों के बारे में जिस पर विस्तार से चर्चा की जा सकती है। 

मुख्य तौर पर हिंदी की 5 उपभाषाएँ हैं और17 बोलियाँ ।


●पश्चिमी हिंदी उपभाषा की 5 बोलियाँ जोकि शौरसेनी अपभ्रंश से निकली हैं:

1 खड़ीबोली- इसका मूल नाम "कौरवी" है और साहित्यिक नाम खड़ीबोली। इसके मानक रूप को हिंदुस्तान की राष्ट्रभाषा और राजभाषा होने का गौरव प्राप्त है। इसे दिल्ली मेरठ के अतिरिक्त रामपुर,

सहारनपुर, मुरादाबाद,देहरादून,अम्बाला में भी बोला जाता है।

2 ब्रज- इस भाषा का सम्बंध मध्यकाल से ही रहा है जिसमें "कृष्णकाव्य" बहुत बड़ी मात्रा में लिखा गया है और "रीतिकालीन साहित्य" भी इसी भाषा में ज्यादातर लिखा गया है।  बंगाल में इसका नाम ब्रजबुलि पड़ा। 

मथुरा इसका केंद्र है।उसके अतिरिक्त मथुरा,वृंदावन, एटा,बदायूँ, बरेली, अलीगढ़, मैनपुरी में बोली जाती है।

3 हरियाणवी - इसे "देसवाली" ," जाटू" और ग्रियर्सन इसे "बाँगरू" कहते हैं। बाँगर का अर्थ उच्च भूमि होता है। यमुना के उच्च भूमि में कहे जाने के कारण नाम पड़ा। इसे जींद , हिसार , रोहतक , कुरुक्षेत्र, नरवाना, कैथल, करनाल आदि में बोला जाता है।

4 कन्नौजी- इसका नाम "कन्नौज नगर" के नाम पर पड़ा। इसके अन्य नाम "कन्नौजिया, कनउजी"भी हैं। इसके मुख्य क्षेत्र पीलीभीत, इटावा , कानपुर, फरुखाबाद, शाहजहाँपुर, हरदोई है। पीलीभीत और इटावा की बोली पर "ब्रज" का प्रभाव है। डॉ धीरेंद्र वर्मा इसे ब्रज की "पूर्वी उपबोली" भी कहते हैं।

5 बुंदेली- "बुंदेलखंड" की बोली होने के कारण नाम पड़ा है। बुंदेलखंड मुख्यतः बुंदेली राजपूतों का एरिया है। इसका मुख्य क्षेत्र चंबल,जबलपुर, रीवाँ, जालौन, झाँसी, हमीरपुर, ग्वालियर, होशंगाबाद, नरसिंहपुर, सिवनी आदि में बोली जाती है।


●पूर्वी हिंदी उपभाषा की 3 बोलियाँ जोकि अर्धमागधी अपभ्रंश से निकली हैं:-

1 अवधी- इसका केंद्र "अयोध्या" है। इस भाषा के सबसे बड़े कवि "तुलसी" है और इसी की एक अन्य रूप "बैसवाड़ी" के कवि जायसी माने जाते हैं। इसको "कोशली" भी कहते हैं। इसके स्थान हैं- गोंडा, लखीमपुर, बहराइच, फैजाबाद, मिर्जापुर, फतेहपुर, इलाहाबाद, लखनऊ, सीतापुर, जौनपुर आदि।

2 बघेली- "बघेल राजपूतों का क्षेत्र" और रीवाँ के आसपास का क्षेत्र बघेलखण्ड कहलाता है। यह बालाघाट, मांडला, फतेहपुर, जबलपुर, रीवाँ,बाँदा आदि में बोलते हैं।

3 छतीसगढ़ी- इसका मुख्य क्षेत्र "छत्तीसगढ़" है। बालाघाट के लोग इसे "खलोटी या खहलाटी" भी कहते हैं। यह रायपुर, बिलासपुर, खैरागढ़ आदि में बोली जाती है।


●बिहारी हिंदी उपभाषा की 3 बोलियों का परिचय जोकि मागधी अपभ्रंश से निकली हैं:-

1 भोजपुरी- कुछ लोग इसे "पुरबिया या भोजपुरिया" भी कहते हैं। यह सारन, चंपारन, मुज्जफरपुर, गाजीपुर, देवरिया,हरदी, गोरखपुर, आदि में बोली जाती है।

2 मगही- इस बोली को कुछ लोग "मागधी" भी कहते हैं। इसका क्षेत्र पटना, हजारीबाग, मुंगेर, भागलपुर, राँची है।

3 मैथिली-यह बिहारी हिंदी की सबसे "प्राचीन" भाषा है जिसका इस्तेमाल "विद्यापति" ने किया था। इसे "तिरहुतिया" भी कहा जाता है। इसका क्षेत्र दरभंगा, पूर्णिया, नेपाल का रौतहट, मोहतरी आदि में बोली जाती है।


●राजस्थानी उपभाषा की 4 बोलियाँ जो शौरसेनी अपभ्रंश से निकली हैं:-

1 मारवाड़ी- यह राजस्थानी की सर्वप्रमुख बोली है। "मारवाड़" की बोली होने के कारण यह मारवाड़ी कही जाती है। साहित्यिक मारवाड़ी को "डिंगल" भी कहा जाता है। यह पश्चिमी राजस्थानी है। इसका क्षेत्र मारवाड़, मेवाड़ ,बीकानेर, सिंध, जैसलमेर आदि है।

2 जयपुरी- ग्रियर्सन इसे मध्य पूर्वी राजस्थानी कहते हैं। इसे ढूंढाड़ी भाषा भी कहा जाता है। यह अलवर,किशनगढ़, अजमेर, आदि में बोली जाती है।

3 मेवाती- मेव लोगों के कारण इसे मेवाती कहा जाता है। मेवात इसका मुख्य क्षेत्र है। यह उत्तरी राजस्थानी है।यह वैसे पूरे अलवर की भाषा है और ब्रज क्षेत्र के जुड़ी भाषा है। भरतपुर और गुडग़ांव के पास भी बोली जाती है।

4 मालवी- मालव प्रदेश की मुख्य बोली है।मालवी को अवन्ति का विकसित रूप कहा जाता है क्योंकि पहले इस क्षेत्र की बोली को अवन्ति कहा जाता था।यह दक्षिणी राजस्थानी है। यह मध्यप्रदेश और राजस्थान दोनों जगह बोली जाती है जैसे इंदौर, उज्जैन, देवास,रतलाम,भोपाल, आदि।


●पहाड़ी हिंदी उपभाषा की 2 बोलियाँ जो "खस अपभ्रंश" से निकली हैं:-

1 कुमायूंनी - "कुमायूँ" इसका मुख्य क्षेत्र है। इसका संबन्ध कुर्मांचल से है। यह अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, चमोली,उत्तरकाशी के जिलों में बोली जाती है।

2 गढ़वाली- इसका मुख्य क्षेत्र "गढ़वाल" है। पहले का केदारखण्ड या उत्तराखंड बहुत से गढ़ो के कारण गढ़वाल कहा जाता था। इसके क्षेत्र हैं देहरादून, मुरादाबाद, टेहरी,बिजनौर, आदि।


●सिंधी- यह शब्द संस्कृत से निकला है जो सिंधु नदी से बना है। उसके आसपास के देश को सिंधु देश कहा गया और वहाँ की भाषा और उन्हें बोलने वालों को सिंधी कहा गया।

इसकी मुख्य 5 बोलियां हैं:- विचोली, थरेली, लासी, लाडी, सिराइकी। इसकी लिपि लंडा है।

●लहन्दा:- इसका अर्थ होता है पश्चिमी। इसके अन्य नाम मुल्तानी, जाटकी, पश्चिमी पंजाबी, हिन्दकी। इसकी भी लिपि "लंडा" ही है जो कश्मीर की शारदा लिपि की एक शाखा है।

●पंजाबी:- इसका अर्थ है पाँच नदियों का देश। इसकी भी लिपि लंडा थी जिसे "गुरु अंगद" ने बदलकर गुरुमुखी कर दिया था।

पंजाबी की मुख्य बोलियां हैं- दोआबी, डोगरी, माझी, राठी।

●गुजराती:- ये गुजरात प्रदेश की भाषा है जो "गुर्जर" के विकसित रूप गुजरात से बनी है। इसकी लिपि भी गुजराती है जिसमें शिरोरेखा नहीं लगती है।

●मराठी:- महाराष्ट्र प्रदेश की भाषा है जिसकी मुख्य बोलियाँ हैं:- कोंकणी, नागपुरी, कोष्टी, महारी।

इसकी लिपि देवनागरी है पर कुछ लोग "मोड़ी लिपि" का भी प्रयोग करते हैं।

●बांग्ला:- बंग+आल से बना है। यह बंगाल प्रदेश की भाषा है। इसकी लिपि देवनागरी की प्राचीन लिपि से विकसित है इसलिए भी इसे हिंदी की बोलियों में गिन लिया जाता है।

●असमिया:- ये "असम प्रदेश" की भाषा है जिसकी लिपि बंगला है। इसकी मुख्य बोली "विशनुपुरिया" है।

●उड़िया:- यह "उड़ीसा" की भाषा है।इसकी मुख्य बोलियां भत्री, गंजामी, सम्भलपुरी।

उड़िया भाषा बंगला से मिलती जुलती है किंतु इसकी लिपि ब्राह्मी की उत्तरी शैली से विकसित है।


यहाँ पर जो भाषा और बोलियाँ है उनको हिंदी की भाषाओं और बोलियों के वर्गरूप में शामिल केवल इसलिए किया गया है क्योंकि यह भी हिंदी की ही परवर्ती अपभ्रंश से निकली है और लिपि-व्याकरण आदि के आधार पर इनमें समानता है।


(10)●हिंदी बोलियों के उपनाम:-

1 हरियाणवी :- बाँगरू, देसवाली,जाटभाषा, चमरवा।

2 अवधी:-       कौशली, बैसवाड़ी।

3 खड़ीबोली:-  कौरवी।

4 छतीसगढ़ी:-  खलटाही, लरिया।

5 बघेली:-        रीवाई।

6 डिंगल:-       भाटभाषा।

7 पिंगल:-        नागभाषा।

8 ब्रज -           बंगाल में इसे ब्रजबुलि कहा जाता है।

9 जयपुरी-       ढूंढाड़ी


(11)●बोलियों के नामकरण कर्ता :-

1 कौरवी-                   राहुल सांकृत्यायन

2 ब्रजबुलि-                ईश्वरचंद्र गुप्त

3 राजस्थानी,बिहारी-  ग्रियर्सन

4 डिंगल-                  बांकीदास

5 भोजपुरी-              रेमण्ड

6 मैथिली-                कोलब्रुक


12 ● बोली व उनकी विशेषता:-

A ओकरबहुला बोलियाँ - ब्रज, बुंदेली, कन्नौजी, मारवाड़ी, कुमाउनी, गढ़वाली, मालवी आदि।

B आकारबहुला बोलियाँ - कौरवी, दक्खिनी आदि

C इकारबहुला बोलियाँ - भोजपुरी

D उदासीन ओकारबहुला बोलियाँ - अवधी, बघेली ।


सहायक ग्रन्थ:-

1 हिंदी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2018।

2 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018।

3 हिंदी भाषा, कैलाशचन्द्र भाटिया, साहित्य भवन प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण 2010।

4 हिंदी भाषा, वीकिपीडिया।

5 सामान्य हिंदी, ल्युसेन्ट, जयहिंद प्रेस, पटना,  8वां संस्करण 2016।

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