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Saturday, December 12, 2020

हिंदी भाषा : भाग - 4

हिंदी भाषा का विकास :


● हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार हेतु अन्य धार्मिक- समाजिक संस्थाओं व समाज सुधारकों का योगदान:-

1. ब्रह्म समाज की स्थापना 1828 में हुई। जिसके संस्थापक कलकत्ता में "राजाराम मोहनराय" ने कहा था कि " इस समग्र देश की एकता के लिए हिंदी अनिवार्य है'..।

2. बंगाल के जस्टिस ब्रह्मसमाजी "केशवचंद्र सेन" ने 1857 ई.में  कहा था कि "भारतीय  एकता के उपाय के लिए भारत में एक ही भाषा का व्यवहार हो। यह हिंदी ही एकमात्र भाषा है जिससे सारे काम सम्पन्न और शीघ्र किये जा सकते हैं"..।

3. "नवीनचन्द्र राय" ने पंजाब में हिंदी का प्रचार प्रसार किया।

4. आर्य समाज जिसकी स्थापना 1875 बम्बई में हुई थी। इसके संस्थापक "दयानंद सरस्वती" थे जोकि मूल रूप से गुजराती थे।  उन्होंने हिंदी का कामचलाऊ ज्ञान होने के बाद भी अपना सारा धार्मिक साहित्य जोकि  "सत्यार्थ प्रकाश" नामक पुस्तक के रूप में है, उसे हिंदी में लिखा। उनका मत था कि "हिंदी के द्वारा सारे भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है"..। इसके अलावा वह कहते थे कि " मेरी आँखें उस दिन को देखना चाहती है जब कश्मीर से कन्याकुमारी तक सब भारतीय एक भाषा समझने और बोलने लगे"...।

5.  अरविंद दर्शन के प्रवर्तक "अरविंद घोष" का मत था कि "सभी लोग अपनी मातृभाषा की रक्षा करके सामान्य तौर पर हिंदी को ग्रहण करें"।

6. थियोसोफिकल सोसाइटी (मद्रास) जिसकी स्थापना 1875 में हुई थी उसकी संचालिका "ऐनी बेसेंट" ने कहा था कि  "भारतवर्ष की भिन्न-भिन्न भागों में जो अनेक देशी भाषाएँ बोली जाती हैं, उनमें एक भाषा ऐसी है जिसमें शेष सब भाषाओं की अपेक्षा एक भारी विशेषता है, वह हिंदी भाषा है'...।

इसी के अतिरिक्त ऐनी बेसेंट का मत "भारत के सभी स्कूलों में हिंदी की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए" को लेकर भी था।

17 जून 1878 में होमरूल कार्यालय सी.पी. रामस्वामी अय्यर की अध्यक्षता में एनी बेसेंट ने प्रथम हिंदी वर्ष का उदघाटन किया।

7. रामकृष्ण मिशन की स्थापना 1897 में दक्षिण भारत के एक क्षेत्र बेलूर में "स्वामी विवेकानंद" जी ने हिंदी के प्रचार के लिए की थी।

8. राजा शिवप्रसाद "सितारे हिन्द" ने ही हिंदी को सबसे पहले स्कूल में प्रवेश करवाया जिसके लिए उन्हें अंग्रेज़ो के कृपापात्र उर्दू के कट्टर समर्थक सर सैयद अहमद खान से टकराना पड़ा।

9. हिंदी के प्रसार के लिए नागरी प्रचारिणी सभा का योगदान :-

  1893 में कुछ उत्साही छात्रों श्यामसुंदर दास, प.रामनारायण मिश्र, ठाकुर शिवकुमार सिंह के उद्योग से इस संस्था की स्थापना की गई। इसके सभापति भारतेंदु के फुफेरे भाई "राधाकृष्ण दास" थे। इस सभा का कार्य हिंदी साहित्य को समृद्ध करना और नागरी अक्षरों का प्रचार करना उद्देश्य था।

इस सभा ने पुस्तकों की खोज का कार्य अपने हाथों में लिया। सरकार द्वारा आर्थिक सहायता भी समय समय पर मिली जिससे हिंदी साहित्य लिखने के लिए प्रमाणिक सामग्री सामने आ गयी थी। इस सभा के विशिष्ट योगदान में कुछ रचनाएँ प्रसिद्ध हैं जैसे हिंदी शब्द सागर की भूमिका, वैज्ञानिक कोष, नागरी प्रचारिणी पत्रिका आदि ।

10.  हिंदी साहित्य सम्मेलन -प्रयाग -1910 में  "पुरुषोत्तम दास टण्डन" ने इसकी स्थापना की थी। जिसका कार्य अहिन्दी भाषी लोगों को हिन्दी सिखाना था। इसमें 3 स्तर की परीक्षाएँ होती थी जिसे पास करके ही कोई हिंदी सीखने योग्य हो पाता था।

11. दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा- मद्रास -1918 में गांधी इसके अध्यक्ष व संस्थापक थे। यह सभा अंग्रेजी भाषा के विरोध में खड़ी हुई थी क्योंकि भारत में अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव को अहिंदी भाषियों पर से कम करके भारत को एकता के सूत्र में बाँधना व भाषाई स्तर पर भी भारत एकरूपता देना या सभा का उद्देश्य था।

12. हिंदी प्रचार सभा, वर्धा -1936 में इस सभा की स्थापना भी गाँधी ने ही कि थी। इस संस्था का मुख्य लक्ष्य हिंदी के माध्यम से राष्ट्रीय भावना जगाना था।  

इसके संदर्भ में गांधी कहते हैं :- "एक हृदय भारत जननी"...। यह इस सभा में गाँधी द्वारा कही गई मुख्य पँक्ति थी।

13. फैजपुर अधिवेशन 1936 और हरिपुरा अधिवेशन 1938 में कांग्रेस ने राष्ट्रभाषा सम्मेलन आयोजित किया जिसकी अध्यक्षता राजेन्द्र प्रसाद एवं जमना लाल बजाज ने की थी।

इसके अलावा बम्बई, विद्याधर, बिहार, असम आदि में भी इसी तरह के हिंदी प्रचार-प्रसार के लिए सम्मेलन हुए। और केवल सभाएँ ही नहीं ,पत्रिकाओं , अन्य विद्वानों , सामाजिक सभाओ व साहित्यकारों आदि ने भी हिंदी के विकास के लिए योगदान दिया।


●हिंदी प्रचार प्रसार हेतू कॉंग्रेस के नेताओं का योगदान:-

1. "लोकमान्य तिलक" ने 1917 में कहा था " यद्दपि मैं उन लोगों में से हूँ जो यह चाहते हैं कि हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है"...।

2  "महात्मा गाँधी" का मत था कि "राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है और हिंदी का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है"..। यह बात उन्होंने 1917 के "भड़ौच गुजरात शिक्षा परिषद" से सभापति पद से कही थी। उन्होंने एक राष्ट्रभाषा के लिए जो लक्षण बताये थे उस आधार पर हिंदी ही केवल उससे मिलती थी। वह लक्षण थे:-


1 अमलदारों के लिए वह भाषा सरल हो।

2 भारतवर्ष के आपसी आर्थिक, धार्मिक, राजनैतिक व्यवहार हो सके।

3 भारतवर्ष के बहुत से लोग उसे बोलते हो।

4 राष्ट्र के लिए आसान हो।


 3. हिंदी साहित्य सम्मेलन इंदौर अधिवेशन 1918 के मंच से "गाँधी" कहते हैं " हिंदी ही हिंदुस्तान की राष्ट्रभाषा हो सकती है"..। इसी अधिवेशन में यह प्रस्ताव रखा कि प्रतिवर्ष 6 युवक उत्तर भारत के दक्षिण जाकर वहाँ की भाषा सीखें और हिंदी का प्रचार करें और इसी तरह से दक्षिण के 6 युवक उत्तर में आकर हिंदी सीखें। हिंदी पढ़ने की बात इसी अधिवेशन में कही गयी थी और वह ऐसी हो जो फ़ारसी शब्दों से लदी न हो और न ही संस्कृतमयी हो।

दक्षिण में सर्वप्रथम गाँधी जी ने अपने सबसे छोटे पुत्र देवदास को 1918 में हिंदी प्रचारक के रूप में दक्षिण भेजा। उसी समय सत्यदेव उनकी सहायता के लिए आ गए। "हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रचार कार्यालय" 1918 के रूप में हिंदी का प्रचार किया गया।

1918 में ही हरिहर शर्मा, शिवराम शर्मा को प्रयाग भेजा गया जिन्होंने लौटकर दक्षिण में प्रचार कार्य सम्भाला। स्वामी सत्यदेव ने हिंदी सीखने के लिए "हिंदी की पहली पुस्तक" लिखी। 1922 तक इतना प्रसार हो गया था कि वहाँ प्रेस भी खोलना पड़ा। 

4. "मोटूरि सत्यनारायण" की सहायता से ही नेल्लूर आंध्रा शाखा खुली। उत्तर और दक्षिण के बीच सांस्कृतिक समन्वय का प्रारम्भ मोटूरि सत्यनारायण के माध्यम से हुआ।

5. कानपुर अधिवेशन 1925 में गाँधी जी ने कहा कि " कांग्रेस का कार्यकारिणी समिति का कामकाज हिंदी में होगा"..।

6. गाँधी जी के प्रयास से ही 1927 में दक्षिणी भारत हिंदी प्रचार समिति (मद्रास) और वर्धा 1936 में राष्ट्रभाषा प्रचार सभाएँ स्थापित हुई।

7. 1927 में दक्षिण भारत के लोगों के लिए गाँधी लिखते हैं कि "ये अंग्रेजी बोलने वाले लोग हैं जो आमजनता में हमारा काम आसान नहीं होने देते। इसी से प्रभावित होकर "सी.राज गोपालाचारी" कहते हैं " हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा तो है ही, यही जनतन्त्रात्मक भारत में राजभाषा भी होगी"...।

8. नेहरू रिपोर्ट 1928 में कहा कि " देवनागरी या फारसी में लिखी जाने वाली हिंदुस्तानी भारत की राजभाषा होगी"...। परन्तु कुछ समय के लिए अंग्रेजी भी सहायक राजभाषा होगी जिसे आगे चलकर भारत के संविधान में अपना लिया।

9. 1929 में सुभाषचंद्र बोस ने कहा था " प्रांतीय ईर्ष्या को दूर करने में जितनी सहायता हिंदी से मिलेगी उतनी और किसी से नहीं"..।

10.  1931 में गाँधी कहते हैं " यदि स्वराज अंग्रेजी पढेलिखों के लिए है तो संपर्क भाषा अंग्रेजी होगी। यदि वह दलितों, निरक्षरों, स्त्रियों-बच्चों-करोड़ो लोगों के लिए है तो उसकी भाषा केवल हिंदी होगी"।

11.  वर्ष 1936 में गाँधी जी ने कहा था " अगर हिंदुस्तान को सचमुच आगे बढ़ना है तो चाहे कोई माने या न माने राष्ट्रभाषा तो हिंदी ही बन सकती है क्योंकि जो स्थान हिंदी को प्राप्त है वह किसी और भाषा को नहीं मिल सकता"...।

और यह भाषाई आंदोलन स्वाधीनता के अंतिम समय तक चलता रहा जिसमें हिंदी के समर्थन में सभी ने सहयोग किया।


●बंगाल के अन्य जन नेताओं का योगदान:-

 1. सबसे पहले  1805 में "चरिणी दास" ने बेताल पचीसी का सम्पादन कराया और विभिन्न विषयों पर हिंदी में लेखन कार्य किया। 1826 में "राजाराम मोहनराय" ने वेदांत सारनात्मक ग्रन्थ का हिंदी अनुवाद किया। "ईश्वरचंद्र विद्यासागर" के लिखे अनेक सहित्यपरक लेख कविवचन सुधा में प्रकाशित हुए।

2.  सुभाषचंद्र बोस:- 1936 महाराष्ट्र प्रांत के एक क्षेत्र (वर्धा) में वह कहते हैं कि "हिंदी का प्रचार इसलिए किया जा रहा है क्योंकि वह बहुत ही व्यापक रूप में बोली जाती और सरल भी है। हमें मिश्रित भाषा का निर्माण नहीं करना बल्कि उत्तर भारत की सामान्य भाषा का प्रचार करना चाहिए"..।

3. वंदे मातरम के रचयिता "श्री बंकिमचंद्र" ने हिंदी भाषा पर बल दिया था। इस गीत का गायन राष्ट्रीय कॉंग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन के प्रारम्भ में रवींद्रनाथ ठाकुर ने ही किया था।

4. रवींद्रनाथ टैगोर:- हमें उस भाषा को राष्ट्रभाषा ग्रहण करना चाहिए जो देश के सबसे बड़े भूभाग में बोली जाती है और जिसे स्वीकार करने के लिए महात्मा जी ने हमसे आग्रह किया है अर्थात हिंदी"..।


● संविधान में राजभाषा:- (एक विकासयात्रा)

1. सन 1946 में संविधान सभा का गठन होता है जिसमें मुख्यतः कांग्रेस के नेता थे। उसके अतिरिक्त स्वतंत्र पार्टियों के नेता और मुस्लिम लीग के नेता भी शामिल थे। विभाजन के बाद लीग के नेता हट गए शेष रह गए थे।

2. 14 जुलाई 1947 को संविधान सभा के चौथे सत्र के दूसरे दिन ही यह संसोधन प्रस्तुत किया गया कि " हिंदुस्तानी" के स्थान और "हिंदी" शब्द रखा जाये। मतदान में 63 हिंदी भाषा के लिए, 32 हिंदुस्तानी भाषा के लिए व देवनागरी लिपि के लिए 63 पक्ष में और विपक्ष में 18 मतदान हुए थे।

3. फरवरी 1948 में संविधान का जो प्रारूप प्रस्तुत किया गया उसमें राजभाषा विधेयक कोई धारा नहीं थी। मात्र यह था कि संसद की भाषा हिंदी या अंग्रेजी होगी। उस पर खूब पक्ष-विपक्ष हुआ। नेहरू ने हिंदी पर बल दिया तो वहीं कुछ नेताओं ने संविधान की भाषा को हिंदी के लिए माना। 

4. अगस्त 1949 में कॉंग्रेस की वर्किंग कमेटी ने भाषा पर बहस करके द्विभाषिक स्थिति को प्रस्ताव किया और स्टेट लैंग्वेज की भी अवधारणा रखी।

5. अगस्त 6,  1949 को हिंदी साहित्य सम्मेलन के तत्वावधान में हिंदी को एकमत स्वीकारा गया और नागरी लिपि को भी स्वीकृति मिली। अंग्रेजी भाषा के राजभाषा सम्बन्धी प्रयोग को लेकर 10 और 15 वर्ष के लिये सदस्यों के अपने अपने मत बने रहे।

6. अगस्त 1949 को राजभाषा सम्बन्धी प्रारूप समिति तैयार की गई जिसके अध्यक्ष "पट्टाभि सीतारमैया" और "महामंत्री जुगलकिशोर" थे। जिसमें अय्यर, अम्बेडकर, सुभाष बाबू, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, मौलाना आजाद, पुरुषोत्तमदास टण्डन, आयंगर,अमृता कौर, मोटूरि सत्यनारायण, घनश्याम गुप्त आदि थे। इस समिति में कई लम्बी बहसें चली और अंग्रेजी के प्रयोग करने वाले वर्षों पर विवाद कायम था।

7. अगस्त 22, 1949 को अम्बेडकर जी ने नया फ़ॉर्मूला रखा जिसमें 15 वर्ष की अवधि का प्रस्ताव रखा गया, जिसे संसद आगे बढ़ा भी सकती है। अंतरराष्ट्रीय अंक, उच्च न्यायालय की भाषा अंग्रेजी, भाषा आयोग आदि सम्बन्धी भी प्रस्ताव थे।

8. राजभाषा सम्बन्धी मसौदा पेश करने में कई लोग बाधा डाल रहे थे और बेमतलब की बहस कर रहे थे जिसको ख़त्म करने के लिए मौलाना आजाद और श्यामाप्रसाद मुखर्जी काफी प्रयास कर रहे थे।

9. मुख्य बहस 11 से 14 सितंबर तक चलती है जहाँ 45 पृ में 400 से अधिक संसोधन आ चुके थे। 14 सितंबर को ही दोनों पक्षों में राजीनामा हुआ और दोपहर 1 बजे बैठक स्थगित हुई। 3 बजे संविधान सभाई पार्टी में समझौते हुए। लगभग 5 बजे तक कुछ सहमति हुई अतएव उन्होंने (मुंशीजी) ने आकर 1 घण्टा अतिरिक्त माँगा। 6 बजे तक सभी पहलुओं पर विचार-विमर्श कर मुंशी आयंगर फ़ॉर्मूला को कुछ सुधारकर स्वीकार कर लिया गया और आशा की गई कि सभी 400 संसोधन वापस ले लिए जाएँगे। अंततः 5 संसोधन नहीं लिए गए जिसमें कॉंग्रेस के सक्सेना, टण्डन, ब्रजेश्वर प्रसाद थे। लीग के नेता अहमद तथा जेड.एच. लारी भी थे। पुरुषोत्तमदास टण्डन जी ने इस्तीफा देकर संसोधन पेश किया जिसे 16 सितंबर को पार्टी के अनुरोध से वापस ले लिया गया।

10. इस प्रकार भारी तालियों की गड़गड़ाहट में मुंशी आयंगर फ़ॉर्मूला स्वीकार कर हिंदी को राजभाषा बनाया गया। मुंशी आयंगर फ़ॉर्मूला के नाम से विख्यात भाषा सम्बन्धी अनुच्छेद संविधान के भाग 17 में अनुच्छेद 343 से 351 तक है और परिशिष्ट में अष्टम सूची है।


●हिंदी की संवैधानिक स्थिति व उसकी समीक्षा:- 

वैसे तो स्वाधीनता से पहले ही कुछ हिन्दीत्तर और हिंदी भाषी छोटे-बड़े नेताओं ने हिंदी को सभी तरह से समर्थन देना शुरू कर दिया था, परन्तु स्वाधीनता के बाद कुछ अहिंदी भाषी नेताओं का रुख़ बदलने लगा। इसी वजह से न केवल संविधान सभा में हिंदी का ही फैसला हुआ बल्कि राजभाषा जैसे मसले को भी सुलझाने की कोशिश की। राजभाषा के नाम पर जो बहस 11 से 14 सितंबर 1949 तक चली उसमें वैसे तो हिंदी के अलावा संस्कृत, हिंदुस्तानी, अंग्रेजी के दावे पर विचार किया गया लेकिन हिंदी और अंग्रेजी का विवाद बहुत दिनों तक चला। 

इसके लिए हिंदी में भी 2 गुट थे :- 

एक देवनागरी लिपि वाली हिंदी के समर्थन में था तो दूसरा हिंदुस्तानी जिसमें फारसी लिपि भी आ रही थी। इस समस्या को समझने के लिए तत्कालीन भाषाई जनता के आंकड़े को देखना जरूरी है जोकि उस समय 1-2% अंग्रेजी बोलने वाले या व्यवहार में लाने वाले थे , 46% हिंदी भाषी व शेष जनता अन्य भाषा व बोलियों को बोलने वाली थी जिसमें कई सारी भाषाएँ स्थानीय बोलियाँ थी। जिस आधार पर इन्हें राजभाषा का दर्जा दिया जाना चाहिए था वह आधार मुसीबत से खाली नहीं था इसलिए ही इन पर इतना ध्यान नहीं दिया गया। हिंदी को राजभाषा बनाने का दावा न्यायसंगत रहा पर राजकीय भाषाओं का भी सम्मान रखा गया।

इन सब बातों पर ध्यान देते हुए संविधान निर्माताओं ने राजभाषा की समस्या को हल करने के लिए संविधान सभा के भीतर और बाहर हिंदी के विपुल समर्थन को देखकर संविधान सभा ने हिंदी के पक्ष में अपना फैसला दिया। यह फैसला हिंदी विरोधी एवं हिंदी समर्थकों के बीच "मुंशी-आयंगार फार्मूले" के द्वारा समझौते के परिणामस्वरूप आया।


सहायक ग्रन्थ :-

1 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018।

2 हिंदी भाषा, कैलाशचन्द्र भाटिया, साहित्य भवन प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण 2010।

3 हिंदी भाषा, वीकिपीडिया।

4 सामान्य हिंदी, ल्युसेन्ट, जयहिंद प्रेस, पटना,  8वां संस्करण 2016।

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