हिंदी भाषा का विकास
(राजभाषा)
● राजभाषा:- इसका शाब्दिक अर्थ है- "राज काज की भाषा"..। जो भाषा देश के राजकीय कार्यों के लिए प्रयुक्त होती है, वह "राजभाषा" कहलाती है। राजाओं, नवाबों के समय में इसे दरबारी भाषा कहा जाता था। इसका क्षेत्र सीमित होता है, यह केवल सरकारी दफ्तरों, प्रशासनिक स्तर पर ही कार्य करती है। इसे औपचारिक भाषा का दर्जा मिला हुआ है।
14 सितंबर 1949 को संविधान के भाग 17 के अध्याय 1 में धारा 343 (1) के अनुसार हिंदी देश की राजभाषा बनायी गयी थी किंतु 1950 से लेकर आने वाले 15 वर्षों तक के लिए अंग्रेजी को भी सहायक भाषा के रूप में इस्तेमाल किया गया। तदुपरांत 1965 से आजतक अंग्रेजी भाषा एक सहकारी भाषा के रूप में राजभाषा के कार्यों में इस्तेमाल की जा रही है।
●हिंदी को देश की राजभाषा बनाये जाने के उपलक्ष में पूरे भारत में 14 सितंबर को "हिंदी दिवस" मनाया जाता है।
● राजभाषा के अध्याय :-
अध्याय 1 : संघ की भाषा - अनुच्छेद 343 और 344 आते हैं।
अध्याय 2 : प्रादेशिक भाषाएँ - अनुच्छेद 345, 346 और 347 आते हैं।
अध्याय 3 : सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालय की भाषा - अनुच्छेद 348, 349 आते हैं।
अध्याय 4 : जनता की शिकायत सम्बन्धी अनुच्छेद 350 और हिंदी के प्रचार हेतु भारत की संस्कृति से जोड़ने हेतु 351 अनुच्छेद है।
●संविधान में हिंदी भाषा सम्बन्धी उपबन्ध:-
संविधान के भाग 17 के अनुच्छेद 343 से 351 तक 4 अध्यायों में राजभाषा सम्बन्धी नियमावली दी है।
1. अनुच्छेद 343 में संघ की राजभाषा हिंदी और उसकी लिपि देवनागरी होगी।
2. अनुच्छेद 344 में राष्ट्रपति 5 वर्ष के बाद और संसद उसके 10 वर्ष बाद राजभाषा आयोग का गठन करेगा और वह गठन हिंदी भाषा के लिए राष्ट्रपति को सिफारिश करेगा।
3. अनुच्छेद 345 में किसी भी राज्य का विधानसभा उस राज्य की किसी एक भाषा, जो हिंदी या हिन्दीतर भी हो सकती है उसका चयन कर पूरे राज्य के व्यक्तियों के लिए संचार-सम्प्रेषण की कमी को पूरा करेगा।
4. अनुच्छेद 346 में किसी भी 2 राज्यों के बीच शासकीय कार्यो को पूर्ण करने के लिए अंग्रेजी को पत्रादि की भाषा बनाना होगा। अगर दोनों राज्य चाहे तो आपस में सलाह करके हिंदी को भी पत्रादि की भाषा बना सकते हैं।
5. अनुच्छेद 347 राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि किसी राज्य की ज्यादात्तर जनसंख्या के आधार पर वहाँ की किसी भाषा को शासकीय प्रयोजनों की भाषा बना दिया जाए।
6. अनुच्छेद 348 में, जबतक संसद उपबन्ध न करे तबतक उच्च न्यायालय की भाषा अंग्रेजी रहेगी। इसके अलावा सभी सरकारी काम भी अंग्रेजी में होंगे। परन्तु किसी राज्य का राज्यपाल राष्ट्रपति की अनुमति से सरकारी कार्यों को हिंदी में करवा सकता है। परन्तु सभी आदेश अंग्रेजी में होंगें।
7. अनुच्छेद 349 में प्रशासनिक कार्यो के लिए इस्तेमाल की जाने वाली किसी अन्य भाषा या संपर्क भाषा के लिए राष्ट्रपति की अनुमति के बिना संसद में प्रस्तुत नहीं कर सकता।
8. 350 में जनता और अधिकारियों की भाषाई शिकायत को दूर करना और भाषाई रक्षा करने का नियम बनाया गया।
किसी राज्य के अल्पसंख्यक वर्गों के बच्चों को उनकी मातृभाषा में पढ़ाया जाना भी है।
9. 351 में हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए विधान बनाया गया। जिससे कि वह भारत की संस्कृति का भाग बन सके। इसी में हिंदी एवं हिंदुस्तानी के भेद को भी खत्म किया गया। पर जहाँ आवश्यक हो अन्य भाषाओं बोलियों को भी आत्मसात किया जाए यह प्रावधान किया गया।
●विधान मंडलो की भाषा:-
1. संसद की भाषा का उपबन्ध संविधान के भाग 5 के अनुच्छेद 120 में किया है । इसके तहत हिंदी के अतिरिक्त अंग्रेजी या मातृभाषा का इस्तेमाल करने की मंजूरी सदन का पीठासीन दे सकता है।
2. विधानसभा की भाषा का उपबन्ध संविधान के भाग 6 के अनुच्छेद 210 में दिया गया है। उसके तहत हिंदी,अंग्रेजी में कार्य किया जाएगा। किसी सदस्य को अपने राज्य की मातृभाषा में बोलने का हक सदन का पीठासीन दे सकता है।
●1950 के बाद हिंदी की संवैधानिक प्रगति:-
1. राष्ट्रपति का संविधान आदेश 1952:- राज्यपालों व SC, HC के न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए हिंदी के अधिपत्रों का प्रयोग किया जाए।
2. राष्ट्रपति संविधान आदेश 1955:- जनता के साथ पत्राचार, प्रशासनिक कार्य, संसदीय रिपोर्ट, संकल्प व विधायी नियम आदि अंग्रेजी के साथ हिंदी में हो।
● राजभाषा आयोग -7 जून 1955 राजेन्द्र प्रसाद और बालगंगाधर खेर की अध्यक्षता में इसका गठन हुआ। इसमें 21सदस्य थे। इसने अपना प्रतिवेदन 1956 में दिया जो 1957 में संसद के समक्ष रखा गया।
◆ राजभाषा आयोग की सिफारिश :-
1. सारे देश में माध्यमिक स्तर तक हिंदी अनिवार्य हो।
2. न्यायालय की भाषा देश की भाषा हो।
3. सार्वजनिक स्तर पर, प्रशासन, पत्राचार की भाषा अंग्रेजी रखना अनुचित है।
राजभाषा आयोग की समीक्षा के लिए 1957 में जी.बी.पन्त की अध्यक्षता में "संयुक्त संसदीय राजभाषा समिति" का गठन हुआ। इसमें लोकसभा के 20 और राज्यसभा के 10 सदस्य थे। इसने अपना प्रतिवेदन 1959 में दिया।
◆ जी.बी. पन्त समिति की सिफारिश:-
1. हिंदी संघ की राजभाषा का स्थान जल्द से जल्द लें।
2.1965 तक अंग्रेजी को राजभाषा और हिंदी को सहायक भाषा बनाया जाए और 1965 के बाद हिंदी को राजभाषा और अंग्रेजी को सहायक भाषा बना दिया जाए।
वैसे तो हिंदी को संघ की राजभाषा 1949 में ही बना दिया था परन्तु सम्भव है कि लंबे समय तक हिंदी में राजकाज का कार्य सुलभता से न हो पा रहा हो तभी इस समिति ने शुरुआती सालों में अंग्रेजी को मुख्य भाषा के तौर पर इस्तेमाल करने की सलाह दी और आने वाले समय में हिंदी को मुख्य राजभाषा बनाने की माँग रखी होगी।
◆ 1976 में राजभाषा आयोग को ख़त्म कर दिया गया था।
● राष्ट्रपति का आदेश 1960:- इसमे ग्रह मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय, विधि मंत्रालय, वैज्ञानिक अनुसंधान तथा सांस्कृतिक कार्य मंत्रालय को हिंदी को राजभाषा के रूप में विकसित करने के निर्देश हैं।
●"राजभाषा अधिनियम" :- यह अधिनियम 1963 में आया। इसमें 9 धाराएं है। यह अधिनियम भी राजभाषा के चयन के लिए लाया गया था क्योंकि हिंदी को राजभाषा का अधिकार मिलने के बाद भी उसका कई जगह विरोध हुआ जैसे दक्षिण (तमिलनाडु) और बंगाल में। हिंदी भाषा के कट्टर समर्थकों के कारण हिंदी को लाभ तो नहीं परन्तु नुकसान जरूर हुआ। इस पर नेहरू जी ने आश्वासन दिया कि हिंदी को एकमात्र राजभाषा का दर्जा देने से पहले अहिन्दी भाषी राज्यों से सम्मति प्राप्त की जाए और तबतक अंग्रेजी को नहीं हटाया जाए। इस पर तत्कालीन राजभाषा के विधेयक लाल बहादुर शास्त्री जी ने मोहर लगाई।
1965 के बाद हिंदी पूरी तरह से राजभाषा का अधिकार पा सकी परन्तु आजतक अंग्रेजी को सहायक भाषा के रूप में स्वीकार किया गया है।
"राजभाषा अधिनियम संसोधन" 1967 (इंदिरा गांधी) में हुआ। जिसमें यह प्रस्ताव रखा गया था कि जो भी राज्य अंग्रेजी भाषा की समाप्ति पर रुख़ अपनाते हैं उन्हें अपने विधानमंडल में हिंदी के लिए संकल्प लेना होगा और ऐसा न होने पर अंग्रेजी पूर्व की तरह रहेगी।
● संसद द्वारा पारित संकल्प :-
1 राजभाषा हिंदी और प्रादेशिक भाषाओं की प्रगति को सुनिश्चित करें।
2 त्रिभाषा सूत्र को लागू करना जिससे कि हिंदी व अंग्रेजी के साथ किसी अन्य हिन्दीतर भाषा को पढ़ाने की व्यवस्था की जाए। परन्तु यह पूरी तरह से सफल न हो सका।
● "राजभाषा नियम"1976 :- इस में 12 नियम हैं। जिनमें हिंदी के प्रयोग के संदर्भ में भारत के राज्यों का 3 वर्गीय विभाजन किया गया है। जैसे (क) राज्य- उत्तरप्रदेश, बिहार,राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, और संघ प्रदेश दिल्ली।
(ख) राज्य-पंजाब,गुजरात, चंडीगढ़ अंडमान निकोबार।
(ग) राज्य- शेष राज्य जैसे दक्षिण के व संघ प्रदेश।
1. क- वर्ग में सभी राज्यों को भेजे जाने वाले पत्र देवनागरी में भेजे जाएँगे। यदि कोई अंग्रेजी का पत्र भेजा भी जा रहा है तो उसका अनुवाद भी भेजना होगा।
2. ख वर्ग वाले राज्यों में पत्र-व्यवहार हिंदी और अंग्रेजी दोनों में कर सकते हैं।
3. ग वर्ग वाले राज्यों में पत्र-व्यहवार अंग्रेजी में होगा।
इसके अलावा इस अधिनियम में प्रधान राजभाषा, सहयोगी राजभाषा और प्रादेशिक भाषा हेतु नियम दिए गए । परन्तु आज भी द्विभाषिक नीति का अनुपालन हो रहा है।
1 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018।
2 हिंदी भाषा, कैलाशचन्द्र भाटिया, साहित्य भवन प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण 2010।
3 हिंदी भाषा, वीकिपीडिया।
4 सामान्य हिंदी, ल्युसेन्ट, जयहिंद प्रेस, पटना, 8वां संस्करण 2016।
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