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Saturday, January 23, 2021

भक्तिकाल - भाग 1

 

●भक्तिआन्दोलन की पृष्ठभूमि:-

 भक्तिकालीन साहित्य जैसी अवधारणा का सामान्य अर्थ देखने पर यह पता चलता है कि, कोई ऐसा विशेष समय या इस समय जब विशेषकर भक्ति-साधना समाज का अंग रही हो। या किसी ईश्वर, व्यक्ति- गुरु आदि की आराधना की जाती हो और उनके मतों को लोककल्याण के लिए में फैलाया जाता हो। ठीक इसी तरह से कुछ महान व्यक्तित्व, सम्प्रदाय, दर्शन, मत आदि का प्रसार लगभग 8वी शती के आसपास से दक्षिण में होने लगा था जहाँ मुख्यतः शैव-वैष्णव भक्तो ने अपने-अपने आराध्य-ईश्वर का महिमाण्डन करना शुरू किया था। परन्तु इसके पीछे की विकास यात्रा को समझना हमारे लिए बेहद जरूरी है।


●भक्ति का अर्थ और उसकी विकासयात्रा:-

हिंदी साहित्य के महान आलोचक "शुक्लानुसार" श्रद्धा और प्रेम के योग का नाम भक्ति है। जहाँ श्रद्धा या पूज्यवृद्धि का अवयव-जिसका लगाव धर्म से होता है, उसे छोड़कर केवल प्रेम लक्षणा की ओर जाएगी वहाँ वह अवश्य विलासिता से ग्रस्त हो जाएगी".।

भक्ति शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख उपनिषद में मिलता है।

भारतीय धर्म-साधना में भक्ति की एक सुस्पष्ट एवं सुदीर्घ परम्परा रही है। महाभारत के भीष्म पर्व में, शांडिल्य भक्ति सूत्र में , नारद मुनि सूत्र में भक्ति का सैद्धान्तिक विवेचन हुआ है। सर्वप्रथम दक्षिण के आलवार भक्तों ने भक्ति-भावना की उच्चतम स्थिति को प्राप्त किया।

"आलवार भक्त" तमिल भाषा में वैष्णव भक्तों को कहा जाता था और "नायनार भक्त" शिव भक्तों को। जो बौद्ध धर्म के विरुद्घ एक धार्मिक क्रांति लेकर खड़े हुए थे। इस क्रांति का आधार इन सिद्ध योगियों  द्वारा समाज में फैलाई गयी वीभत्स वृतियां, कुसंस्कार आदि को खत्म करके अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा करना था। इन शैव- वैष्णव भक्तो का उद्देश्य गीता, उपनिषद और अपने धार्मिक गर्न्थो का गीतों के माध्यम से प्रचार करना था।

 

● आलवार का अर्थ:-  विजेंदर स्नातक के अनुसार "ईश्वरीय ज्ञान के मूल तत्व तक पहुँचा हुआ ज्ञानी आदमी" ही आलवार है। आलवारों में सभी वर्णो के लोग रहते थे और इनमें प्रसिद्ध अंतिम भक्त "तिरूपाणी" है। आलवारों में पेरियार की दत्तक पुत्री "आंडाल"है।

● बच्चन सिंह के अनुसार प्राकृत-अपभ्रंश भाषा को छोड़ते हुए देशभाषा "तमिल-कन्नड़" में आलवारों ने भक्ति भावना को फैलाना शुरू किया। इस तरह के भक्तिआन्दोलन की प्रथम शुरुआत 12-13 वी शती में तमिल और कन्नड़ जातियों में हुई थी। उसके बाद 15 वी शती तक उत्तर भारत तक भी फैल गयी थी"...। 

जिस बौद्ध-जैन धर्म के विरुद्ध और उसके पतन के पश्चात यह धार्मिक क्रांति खड़ी हुई थी उसी धार्मिक क्रांति में कुछ ब्राह्मण भी थे जिन्होंने समय का फायदा उठाते हुए समाज में अपने वर्चस्व को बढाने और वर्णाश्रम की रक्षा करने के लिए शूद्रों के साथ कठोर व्यवहार अपनाना शुरू कर दिया था। इनकी दशा सोचनीय हो गयी थी। ब्राह्मणों की चालाकी इस हद तक थी कि ये कभी-कभी किसी शुद्र को ही क्षत्रिय बनाकर अपना शासन चलवाते थे जिससे वर्णाश्रम धर्म की रक्षा हो सके। इन ब्राह्मणों ने निम्न वर्णो की हालत पस्त कर रखी थी। थक हारकर जब निम्नवर्ण ने ईश्वर की शरण ली तो उससे जाति प्रथा और वर्णाश्रम व्यवस्था को गहरा धक्का पहुँचा। क्योंकि निम्नवर्ण के लोगों को व्यापक तौर पर पूजापाठ, तीर्थ आदि करने का अधिकार नहीं था और इनके देवी-देवता, और उन देवी-देवताओं की सवारियां भी हिन्दू धर्म के अनुसार अलग होती थी। इन सब प्रतिबंधो के बावजूद अगर इस वर्ण के लोग धार्मिक आंदोलन चलाते थे तो यह बड़े ही साहस की बात थी। इसने पूरे ब्राह्मणवाद की कमर तोड़ दी थी। इस आंदोलन से उन्हें अपनी जातिगत और सामाजिक मर्यादा को सुधारने का अवसर मिला। ऐसा ही कुछ रुख़ निर्गुणमत को मानने वाले संत कवियो ने अपनाया था जिसमें कई निम्न जाति के लोग थे जैसे कबीर, रैदास आदि।

बच्चन सिंह के अनुसार "तमिलों का भक्तिआन्दोलन ब्राह्मण धर्म की प्रभुसत्ता और वर्णाश्रम व्यवस्था के विरुद्ध खड़ा हुआ था साथ ही वीरशैव या लिंगायत भक्त भी उस जाति-पाँति के विरुद्ध भक्तिआन्दोलन चलाया था"...।

● भक्तिआन्दोलन के प्रचार प्रसार में इन निम्नवर्ण के लोगों को इतना आत्मविश्वास कैसे मिला इस बात की पुख़्ता जानकारी हमारे लिए महत्वपूर्ण है। इस चमत्कारी घटना को समझना जरूरी है। जैसाकि ऐतिहासिक तथ्यों द्वारा माना जाता है कि निम्नवर्ण के लोगों को इस तरह का आत्मविश्वास उनकी आर्थिक स्थिति के मजबूत होने से मिला था। जब चोलवंश की कई शताब्दियों बाद  दक्षिण में इन शिल्पकारों, बुनकरों, मल्लाहों, किसानों आदि को अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारने के अवसर मिले। जहाँ उन्हें तत्कालीन शासको द्वारा भवन निर्माण, सिंचाई के लिए, मछली व्यापार आदि के लिए कई मजदूरों कामगरों की ज़रूरत पड़ी और इसी आर्थिक वृद्धि से इस वर्ण की समाजिक मर्यादा भी सुदृढ़ हुई।

"विश्वनाथ त्रिपाठी" के अनुसार मध्यकाल के विशेषज्ञ इतिहासकारों का मानना है जिसमें "इरफ़ान हबीब" और "रामशरण वर्मा" का नाम उल्लेखनीय है। जो मानते हैं कि "दक्षिण के व्यापारियों, किसानों आदि की तरह उत्तरभारत के जाट-किसानों, व्यापारियों, शिल्पियों की निर्गुणमत को तैयार करने में मुख्य भूमिका रही । उस समय के शासक (खिलजी, तुगलक- सूरी) आदि सड़क -भवनों का निर्माण करवा रहे थे जिससे इन शिल्पकारों, मजदूरों, बुनकरों आदि को आर्थिक मदद पहुँची और इनकी सामाजिक स्थिति बेहतर हुई। निर्गुणमत के सन्तो का सामाजिक आधार यही था".।

अर्थात जब तक हमारी आर्थिक स्थिति सही न हो तबतक हम समाज में किसी भी तरह के आंदोलन, सेवाभाव, क्रांति आदि को अंजाम तक नही पहुँचा सकते क्योंकि किसी भी कार्य की पूर्णता के लिए उन सभी उपकरणों व माध्यमों की अति आवश्यकता होती है जिससे हम उस लक्ष्य तक पहुँचते हैं। इसे हम।और आसानी से ऐसे भी समझ सकते हैं कि जब भी समाज में लोक कल्याण के लिए कोई भी कृत्य किये जाते हैं तो उस कृत्य से होने वाली मदद भी आर्थिक आधार पर ही टिकी होती है कुछ ऐसा ही भक्तिकाल की पृष्ठभूमि तैयार होने में निम्नवर्ग के लोगों के साथ भी हुआ। जोकि आज भी प्रसांगिक है।


●भक्तिआन्दोलन के संदर्भ में विद्वानों के मत:-

1. "अरबो की देन " ताराचंद का मत। 

2. "ईसाइयत की देन"..। ग्रियर्सन का मत है कि भारत में ईसाईयों के बढ़ते प्रभाव से भारतीय लोगों को उनकी संस्कृति के कलुषित होने या लुप्त होने का डर था इस लिए उन्होंने अपने धार्मिक ग्रन्थों के उपदेश को गीतों के माध्यम से गाना शुरू कर दिया था...।   परंतु बच्चन सिंह ग्रियर्सन के मत को इस बात से ख़ारिज कर देते हैं कि वह झूठे है और अब इस पर कोई चर्चा भी नहीं होती है....। 

3. मुक्तिबोध का मत है कि "सामाजिक शक्तियों के रूप में जनता के दुःख व कष्टों से उत्पन्न आंदोलन था"...। 

4. रामविलास शर्मा का मत है कि "भक्तिआन्दोलन एक जातीय और जनवादी आंदोलन है"..।

5. बच्चन सिंह का मत है कि " यह पहला भारतीय जागरण था जो कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और गुजरात से लेकर असम तक फैला हुआ था। साथ ही यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि यह एक बार में सब जगह नही फैला था कहीं पहले तो कहीं बाद में"...।

6. जयशंकर प्रसाद का मत है कि " दुखवाद जिस मननशैली का फल था, वह बुद्धि विवेक के आधार पर तर्क का आश्रय लेकर आगे बढ़ता जा रहा था। अनात्मवाद की प्रतिक्रिया होनी चाहिए। फलतः भारत के पिछले काल के जो दार्शनिक अनात्मवादी थे वही भक्तिवादी बने और बुद्धिवाद का विकास भक्ति के रूप में हुआ"...। फिर कुछ व्यंग की मुद्रा में कहते हैं कि "जिन-जिन लोगों में अनात्मवाद की कमी रही उन्हें एक त्राणकारी की आवश्यकता थी"...(रहस्यवाद निबन्ध से)।

7. रामस्वरूप चतुर्वेदी मानते हैं कि प्रसाद और शुक्ल जी का मत इस्लामिक प्रभाव से मिलता-जुलता है और दोनों कहीं-न-कहीं एक दूसरे के पूरक हैं।

8. "उस समय स्वतंत्रता के साथ-साथ वीरगाथा काल भी अंधेरे में पड़ चुका था। इस हीन दशा में अपने पराक्रम के गीत किस मुँह से गाते और सुनते?..। जनता पर गहरी उदासी छाई थी, उसकी वृतियां (उत्साह) को पाने के लिए वह कृष्ण की ही उपासना कर सकते थे परंतु वह उस तरफ भी नही जा पा रहे थे। ऐसे में इन कृष्णभक्तों ने  गीत गाकर जीवन के प्रति अनुराग जगाया और जीने की चाह को कायम रखा"...।(महाकवि सूरदास- त्रिवेणी- शुक्ल)

 9. रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार वल्लभाचार्य का मत "मलेच्छाक्रांतेषु देशेषु" से है। यह देश मलेच्छाक्रान्त है और गंगादि तीर्थ आदि नष्ट हो रहे हैं। अशिक्षा और अज्ञान के कारण वैदिक धर्म  नष्ट हो रहा है'...ऐसी स्थिति में कृष्णाश्रय ही केवल एकमात्र ही सहारा रह गया था"...। 

10. प्रो हैवेल का मत है कि " वह अपनी पुस्तक history of aaryan rules में लिखते हैं कि "मुसलमानी सत्ता के स्थापित होते ही हिंदुओ को राजकाज के कामों से निकाल दिया था इसलिए दुनिया की झंझटो से मुक्ति पाने के लिए उन्होंने ईश्वर की भक्ति शुरू कर दी"....।  इस मत का हजारीप्रसाद यह कह कर विरोध करते हैं कि " भारतीय पांडित्य ईसा की एक सहस्त्राब्दी बाद विचारों और भाषा का क्षेत्रों में स्वभावतः ही लोक की तरफ झुक गया था। xxxx इस्लामी प्रभाव नही आया होता तो भी इस साहित्य को इसी रास्ते आना था , उसके भीतर की शक्ति उसे स्वभाविक विकास की तरफ धकेले जा रही थी"....(हिंदी साहित्य की भूमिका पृ 24)

11.  हजारीप्रसाद जी के मत को उनके शिष्य "नामवर सिंह" भी गुरु परम्परा में विश्वास दिखाते हुए शुक्ल और वल्लभाचार्य के मत को एकसाथ नत्थी कर देते हैं।

एक तरफ "रामस्वरूप चतुर्वेदी" जी हैवेल के मत का खंडन करते हुए यह कहते हैं कि" यह गलत व्याख्या है क्योंकि इस्लाम केवल एक ऐतिहासिक घटना नही थी वह सम्पूर्ण हिन्दू धर्म की मर्यादा को कलुषित करने पर तुली थी जिसे बचाने के लिए इन भक्तकवियो ने आंदोलन खड़ा किया और अपनी मान्यता को शुक्ल जी से जोड़ देते हैं"....। वहीं आगे नामवर सिंह जी के मत का विरोध करते हुए कहते हैं कि " म्लेच्छ कहने से तत्कालीन मुसलमानों का ही पता चलता है क्योंकि उस समय कोई अन्य जाति जैसे शक-हूण आदि नही थी"....। 

चतुर्वेदी जी आगे आधुनिक काल के एक तेजस्वी कवि निराला के "तुलसीदास" नामक रचना का उद्धरण लेकर उसे भी भारतीय संस्कृति की चिंता के रूप में देखते हैं। जहाँ निराला लिखते हैं :-

"भारत के नभ का प्रभापुण्य

शीतलछाया सांस्कृतिक का सूर्य"...।

• यहाँ पर सूर्य और चंद्र इस्लाम और भारत का प्रतीक हैं।

● जहाँ एक तरफ "नामवर सिंह" भक्तिआन्दोलन को शास्त्र और लोक का संघर्ष मानते हैं वही दूसरी और "चतुर्वेदी" जी उसे इस्लाम और भारतीय संस्कृति का द्वंद मानते हैं। ख़ैर ये बातें विचार विमर्श के लिए रह जाती है जिस पर अभी और काम करने की ज़रूरत है।

12.  रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार "भक्तिकाव्य के पीछे यदि बौद्ध धर्म का लोकमूलक रूप और प्राकृतों के श्रृंगार काव्य की प्रतिक्रिया है तो इस्लाम के प्रभाव की चेष्टा भी"...।

चतुर्वेदी के अनुसार "ग्रियर्सन, शुक्ल और हजारीप्रसाद जी का मत 'विदेशी, देशी और लोक पक्ष की अलग-अलग परिणतियाँ हैं"..।

• अभी तक जितने भी विद्वानों के मत भक्तिआन्दोलन की पृष्ठभूमि के संदर्भ में देखें गए हैं, उनमें से सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण और विचार-विमर्श के नजरिये से आचार्य शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी जी के मतों को मान्यता मिली है जिनके बीच लम्बे समय से विवाद चला आ रहा है कि किसके मत को ज्यादा अहमियत दी जाए या किसका मत तत्कालीन परिस्थितियों के अनुकूल भक्तिआन्दोलन के लिये उचित ठहरता है। समय-समय पर गोष्ठियों, अन्य कार्यक्रमों में भी इनके मतों की पुष्टि के लिए तर्क-वितर्क और तथ्यों को प्रस्तुत किया जाता रहा है फिर भी आजतक कोई एक मत स्वीकार्य नहीं हुआ है और आज भी ये विवाद का मसला बना हुआ है। तो आइए एक बार इन दोनों आचार्यो के मत पर एक निष्पक्ष दृष्टि फेर लेते हैं:- 


सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018    

                  

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