● अपभ्रंश से हिंदी का विकास
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वैसे तो किसी भी भाषा का विकास तब ही सम्भव माना जाता है जब वह अपने पूर्व के दुर्गुणों, कुसंस्कारों आदि को छोड़ती हुई समय के साथ विकास के पथ पर चलती जाती है और धीरे-धीरे अपना सामाजिक- साहित्यिक विकास करती है। परंतु कुछ भाषाओं के साथ ये प्रक्रिया होना इतना आसान नही होता और उसके विकासक्रम को समझना और समझाना भी इतना सरल कार्य नही दिखाई पड़ता। ठीक इसी तरह के एक भाषाई-विकासक्रम का नाम अपभ्रंश का हिंदी में परिवर्तित होेना है। सामान्य तौर पर हिंदी साहित्य के अंतर्गत अपभ्रंश को हिंदी का पूर्ववर्ती रूप माना जाता है परंतु कुछ विद्वान इस बात से सहमत नहीं है। वह हिंदी और अपभ्रंश को दो भिन्न भिन्न भाषा कहते हैं। इसी विवाद में कुछ विद्वानों के मत द्रष्टव्य हैं:-
1. रामस्वरूप चतुर्वेदी मानते हैं कि अपभ्रंश से हिंदी ठीक वहीं से अलग मानी जाती है जहाँ से प्रत्यक्ष रूप से परसर्गो का प्रयोग होना शुरू हो जाता है। इसकी पुष्टि के लिए वह रासो साहित्य का हवाला देते हैं। जिसमें व्याकरणिक दृष्टि से आधे वर्णों जैसे दुग्ध ,हत्थ आदि के ग और त को हटा कर पूरे वर्णों का इस्तेमाल होना शुरू हो जाता है।
2. बच्चन सिंह के अनुसार विद्वानों के मत:-
"हजारीप्रसाद " जी मानते हैं कि अपभ्रंश हिंदी नहीं है परंतु परवर्ती अपभ्रंश (पुरानी हिंदी) पूर्ववर्ती अपभ्रंश के निकट है तो इसे साहित्य में ले लेना चाहिए।
"रामविलास शर्मा" के अनुसार व्याकरणिक दृष्टि से अपभ्रंश और हिंदी बिल्कुल भिन्न हैं।
पं.गुलेरी जी, राहुल सांकृत्यायन व शुक्लजी परवर्ती अपभ्रंश को पुरानी हिंदी कहते हैं।
● "गुलेरी जी" ने 1921 में ना.प्रा.पत्री. से "पुरानी हिंदी" नामक एक लेखमाला निकाली थी जिसमें वह कहते हैं " विक्रम की 7वी से 11वी तक भले ही अपभ्रंश की प्रधानता रही हो फिर भी वह हिंदी में परिणत हो गयी"...। आगे वह कहते हैं कि "पुरानी अपभ्रंश संस्कृत-प्राकृत से मिलती है तो परवर्ती अपभ्रंश हिंदी से "...। अर्थात गुलेरी जी ने अपभ्रंश को पुरानी और परवर्ती कहा है।
● "बच्चन सिंह" शुक्ल जी को हिंदी-अपभ्रंश के मसले पर अंतर्विरोध में जकड़े हुए पाते हैं और कहते हैं कि एक तरफ तो उन्होंने राजा मुंज से अपभ्रंश का पूर्ण-प्रचार माना वहीं वह सिद्ध-नाथों के साहित्य को अपभ्रंश या प्राकृताभास हिंदी की रचना मानते हैं।
परन्तु ये अंतर्विरोध न होकर बल्कि भाषा की विकासयात्रा है।जहाँ भाषा अपने शुद्ध रूप में आने में समय लेती है परंतु आचार्य शुक्ल के साथ एक अंतर्विरोध यह पाया जाता है कि वह सिद्ध-नाथो की रचनाओं को अगर धर्म-साधना-योग आदि की रचना कह कर साहित्य से बाहर कर देते हैं तो उनकी रचनाओं की भाषा हिंदी कैसे हो सकती है? जिसे उन्होंने प्राकृताभास हिंदी या अपभ्रंश कहा है पृ 15 पर...।
एक अन्य अंतर्विरोध यह भी पाया जाता है कि "शुक्लानुसार सिद्ध-नाथों की रचनाओं को उस समय की प्रयुक्त भाषा से परिचित कराने के लिए हिंदी साहित्य में दिखाया गया है। इसका अर्थ ये निकलता है कि शुक्ल जी या तो पूर्णरूप से अपभ्रंश और हिंदी के मसले को समझ नहीं पाए थे या तो वह केवल हल्के तर्क देकर सिद्ध-नाथों के साथ नाइंसाफी कर रहे थे। ख़ैर ये भी एक विवाद का मसला बन सकता है जिसकी चर्चा निरन्तर शोधार्थी और साहित्यकार दोनों मिलकर करते रहेंगे।
3. बच्चन सिंह, अपभ्रंश का हिंदी में विकासक्रम, इस तर्क पर मानते हैं कि "जिस समय अपभ्रंश भाषा का इस्तेमाल हो रहा था उस समय कुछ-कुछ लोकभाषा के शब्दों का भी प्रयोग हो रहा था जिसे परसर्ग कहा जाता था। जोकि ब्रज-खड़ीबोली-अवधि-भोजपुरी आदि के हो सकते थे। यही परसर्ग आगे चलकर हिंदी या परवर्ती अपभ्रंश का रूप लेने लगे। इसलिए हिंदी साहित्य के अंर्तगत हमें अपभ्रंश का अध्धयन भी करना आवश्यक है। इस तर्क से वह कहते हैं कि "अपभ्रंश साहित्य हिंदी साहित्य का समृद्ध रिक्थ है"....।
● अपभ्रंश साहित्य को बच्चन सिंह 3 वर्गों में बांटते हैं:-
1.सिद्ध साहित्य
2. जैन साहित्य
3. बौद्ध साहित्य
4. शुक्ल जी का मत अपभ्रंश के लिए:-
अपभ्रंश या प्राकृताभास हिंदी का सबसे पुराना पता तांत्रिक योगियों सिद्ध-नाथों से चलता है।
अपभ्रंश का सबसे पहला पता धारसेन के राजा वलभी से चलता है 593ई. में।
जब प्राकृत बोलचाल की भाषा न रह गयी तभी से अपभ्रंश का उदय हुआ। और जब शुद्ध रूप से अपभ्रंश लोक में फैल गई तो वहाँ से हिंदी साहित्य की शुरुआत हुई। उस समय पद्य में ही साहित्य लिखा जाता था।
शुक्ल जी ने साहितियक भाषा को अपभ्रंश और लोकभाषा को देसीभाषा कहा है।
●सिद्ध-नाथों की रचनाओं पर विद्वानों के मत:-
1. आचार्य शुक्ल और रामस्वरूप चतुर्वेदी जी का मानना है कि ,इन सिद्ध-नाथ योगियों की रचनाएं साहित्य कोटि के अंतर्गत नहीं आती। इनका इस्तेमाल केवल यह दिखाने के लिए किया गया था कि उस समय प्रचलित भाषा कौन-सी थी? और अपभ्रंश भाषा की शुरुआत कब से मानी जाती है,₹। और उनके द्वारा किस तरह का साहित्य रचा जा रहा था आदि बातें।जैसाकि शुक्ल जी कहते हैं कि" इन सिद्ध-नाथ योगियों के द्वारा संतमत के लिए पहले से ही मार्ग तैयार था...।
2. उनके अनुसार इनका साहित्य एहिकता और लोक से कहीं दूर नज़र आता है। वह धर्म-दर्शन-योग आदि का साहित्य ज़्यादा है और लोक से जुड़ा हुआ कम। बाद में ये प्रक्रिया कबीर तक जाती दिखती है।
3. यह सभी सिद्ध-नाथपंथी योगी अपनी प्रतीकात्मक संध्याभाषा अर्थात "योग से संपन्न भाषा" का इस्तेमाल करते थे और जनता को गुमराह कर अपनी शक्तियों का प्रभाव दिख कर समाज को कुमार्ग पर ला रहे थे, दुराचार फैला रहे थे। इसलिए शुक्ल जी ने हिंदी साहित्य के अंतर्गत इस साहित्य की गणना नहीं की है और हिंदी साहित्य के प्रथम काल की शुरुआत 1050ई. से मानी है । जिसे उन्होंने "वीरगाथा काल" का नाम दिया है।
परन्तु यहाँ एक बात यह खटकती है कि जब सिद्ध-नाथ और कबीर के सन्तमत के बारे में यह बात सर्वविदित है कि वह किसी भी तरह के बाह्याडंबर, जात-पात, ढकोसले आदि पर विश्वास नहीं करते थे, तब उनकी रचनाएं धर्म से कैसे जुड़ी हो सकती है? क्या शुक्लजी और रामस्वरूप चतुर्वेदी जी के कथन सही हैं? क्या उनका सिद्ध-नाथों पर किया गया शोध कार्य सही है? ये सभी बातें विचार-विमर्श के लिए रखी है जिस पर आने वाली पीढ़ियों को और हमें भी सोचना चाहिए।
परन्तु इन सब के विपरीत पं हजारीप्रसाद जी ने सिद्ध-नाथ-जैन-बोद्ध आदि को आदिकाल का नाम देकर एक ही पिटारे में नक्की कर दिया है जोकि हमारे भारतीय साहित्य का कहीँ-न-कहीं अंग है और हिंदी साहित्य की नींव खड़ी करने में इनका योगदान अवश्य माना जाना चाहिए। अपनी बात को सिद्ध करने के लिए यहाँ हजारीप्रसाद जी के कथन को रखना उचित व आवश्यक भी है...."भले ही अपभ्रंश हिंदी नही है परंतु हमे परवर्ती अपभ्रंश को पूर्ववर्ती अपभ्रंश के निकट ही मान लेना चाहिए और इसलिए इन्हें हमें हिंदी साहित्य में शामिल कर ले जाना चाहिए".....।
●अपभ्रंश के मुख्य छंद:-
1. दोहा - ये 2 पंक्तियो का छंद होता है जिसमें वीर, श्रृंगार, नीति धर्मपरक आदि के गीत व उपदेश लिखे हैं।
2. पध्दडिया- अहिलल्ल- कडवक - ये चौपाई की तरह होता है जिसका प्रयोग तुलसी, जायसी और सिद्ध के चर्यापद में भी मिलता है। इसमें 16 मात्राएं होती है जिसमें 8-8 पंक्तियो पर धत्ता दिया जाता है। हिंदी के दोहा-चौपाई वाले छंदों में दोहा द्वारा धत्ता दिया जाने लगा है।
मूलतः कडवक शैली वो है जिसमें चौपाई के बाद दोहा रखने की शैली होती है। अब यह कितनी चौपाई के बाद रखा जाएगा यह रचनाकार पर निर्भर रहता है। जैसे पद्मावत में 7 चौपाई पर 1 दोहा रखा गया है और "माधवानल कामकन्दला" आलम की रचना में 5 चौपाई पर 1 दोहा।
●अर्धलियाँ का अर्थ चौपाई होता है।
सहायक ग्रन्थ :-
1 हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।
2 हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण।
3 हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।
4 हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।
5 हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018
6 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018
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