रामकाव्य के अन्य कवि
(रहीम)
हिंदी साहित्य में नीतिकाव्य की श्रेणी में गिने जाने वाले श्रेष्ठ कवियों में "अब्दुर्रहीम खानेखाना" का नाम बड़े आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है। ये दानी और परोकारी ऐसे थे कि अपने समय के कर्ण माने जाते थे।
आचार्य शुक्लानुसार "जिस मनुष्य में करोड़ो रूपये दान कर दिए और जिसके पास से कोई विमुख नही गया उसका पीछा याचको से कैसे छूट सकता था। इन्हें दुख तब होता था जब कोई मदद के लिए आता और यह कर न पाते थे। इस पर कवि दोहे से अपने अनुभव को साझा करते हैं :-
"तबही लों जीवो भला, देबो होय न धीम
जग में रहिबो कुचित गती, उचित न होय रहीम।
विपद पड़ने पर यदि कोई इनका साथ नही देता था और कोई याचक इनके द्वारे आ खड़ा होता था तब यह उन्हें ये दोहा लिख के रीवा नरेश के पास भेज देते थे:-
"चित्रकूट में रमे रहे, रहिमन अवध नरेस
जापर विपदा परती है, सो आवत यहि देस।
• "बच्चन सिंह" के अनुसार रहीम अपने अंतिम दिनों में दरिद्रता के शिकार हो गए थे और इनकी भी कथा निराला के समान "दुख ही जीवन की कथा रही" सी हो गयी थी।
• शुक्लानुसार "तुलसी के वचनो के समान रहीम के वचन भी हिंदी भाषी भूभाग में सर्वसाधारण के मुँह पर रहते हैं"..।
• शुक्लानुसार "रहीम का ह्रदय द्रवीभूत होने के लिए कल्पना की उड़ान की उपेक्षा नहीं रखता। वह संसार के सच्चे और प्रत्यक्ष व्यवहारों में ही द्रवीभूत होने के लिए पर्याप्त स्वरूप में है"..।
● उनके काव्य में 3 तरह की काव्यभाषा का प्रयोग मिलता है... (हिंदी, संस्कृत, फारसी)
रहीम के दोहे "सूक्तिशैली" में लिखे गए हैं। अर्थात सीधेपन में।
● उनके कृतित्व का प्रधान अंश -
दोहे (ब्रज में)
बरवै (अवधी में)
मदनाष्टक (खड़ीबोली में)
● रहीम पर कहे गए कथन:-
1. शुक्लानुसार "जीवन की परिस्थितियों के मार्मिक रूप को ग्रहण करने की जिसमें सच्ची परख होगी वही जनता का प्रतिनिधि कवि बनेगा...। आगे कहते हैं कि "उनमें भारतीय प्रेमजीवन की सच्ची झलक है"..।
2. शुक्लानुसार " रहीम के दोहे वृन्द और गिरधर के पद्यों के समान कोरे नहीं हैं"..।
3. शुक्लानुसार "रहीम काव्य हिंदी की खिचड़ी है और "खेट कौतुकम" फ़ारसी की खिचड़ी"....।
4. रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार " हिन्दू-मुस्लिम के समरस होने के जातीय कवि होने का गौरव प्राप्त है उन्हें......." ।
5. बच्चन सिंह के अनुसार "रहीम न तो जायसी की तरह सूफी, न रसखान की तरह वैष्णव सम्प्रदाय में दीक्षित हुए, बल्कि उन्हें भारतीय संस्कृति से गहरा अनुराग था"..।
● रामकाव्य के अन्य कवि:-
1. "कृष्णदास पयहारी" - रामानंद के शिष्यों में अनंतादास हुए जिनके शिष्य कृष्णदास पयहारी और उनके शिष्य अग्रदास थे। इनके शिष्य नाभादास हुए।
कृष्णदास पयहारी ने रामभक्ति शाखा में "तपसी शाखा" की स्थापना कर राजस्थान में नाथपंथियों को हटाकर वहाँ गद्दी स्थापित की जिसे "उत्तर तोताद्री" भी कहा जाता है।
2. " अग्रदास"- ये रामभक्ति शाखा में "रसिक सम्प्रदाय" के प्रवर्तक हैं। यह भी रामानंद की शिष्य परम्परा के कृष्णदास पयहारी के शिष्य थे।
इनकी गद्दी जयपुर के पास रैवात में है। इसका एक अन्य नाम "अग्रअली" सम्प्रदाय भी है।
शुक्लानुसार इनकी रामध्यानमंजरी ही ध्यानमंजरी है।
3." सेनापति भी केशव की ही भांति भक्तिकाल और रीतिकाल की संधि रेखा पर स्थित है। केशव की भांति सेनापति भी "रामभक्त कवि" है।
4. नाभादास :- इनका भक्तमाल 1585 में और उसकी टीका प्रियादास 1712 ने लिखी थी। इस ग्रन्थ में 200 भक्तो का वर्णन है 316 छपय्यो में वर्णित है। इस ग्रँथ का उद्देश्य भक्ति का प्रचार करना था परन्तु कालांतर में जाकर यह हिंदी साहित्य इतिहासकारो के लिए एक महत्वपूर्ण ग्रँथ बन गया।
ये अग्रदास के शिष्य थे। नाभादास को कुछ लोग डोम या क्षत्रिय भी कहते हैं।
(शिष्य परम्परा) रामानंद - अनंतादास- कृष्णदास- अग्रदास- नाभादास"
5. जीवाराम - यह रामभक्तिधारा की एक शाखा है। "त्तसुखी सम्प्रदाय" में ईश्वर और नायिका के बीच सखी भाव होता है। जिसकी स्थापना मानस के प्रसिद्ध टीकाकार जीवाराम ने की थी।
6. रामचरणदास - "स्वसुखी सम्प्रदाय" इसमें ईश्वर और नायिका के बीच पत्नी भाव होता है। जिसकी स्थापना रामचरणदास में की थी।
● सहायक ग्रन्थ :-
1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।
2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण।
3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।
4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।
5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018
6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018
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