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Tuesday, March 9, 2021

भक्तिकाल भाग :- 10


                     ( तुलसीदास )


● वैष्णव धर्म :-  रामभक्ति शाखा या कृष्ण भक्ति शाखा को समझने से पूर्व हमें वैष्णव धर्म को समझना होगा क्योंकि राम और कृष्ण विष्णु के ही 2 भिन्न भिन्न युग में पैदा होने वाले अवतार हैं। वैष्णव धर्म में ही विष्णु के इन दोनों रूपों का विशद वर्णन किया गया है।

भागवत धर्म का उदय ईसा से 4-5 शती पूर्व हो चुका था। वैदिक विष्णु "भागवत धर्म" में स्वीकृत विष्णु ईसा से 5 हजार वर्ष पूर्व के हैं। भागवत धर्म का पुनर्गठन ईसा की दूसरी शती में हुआ। विष्णु पूजा को अंग्रेज विद्वान "वार्थ" भी प्रचीन मानता है।

पुराणों में वैष्णव भक्ति के अवतारी रूप राम व कृष्ण के चरित्र व लीलाओं का विस्तृत उपलब्ध है जिसने परवर्ती काव्य के लिए आधारभूमि तैयार की ।


                         (रामभक्ति शाखा)


● आलवार भक्तों में "शठकोप" को रामभक्ति का प्रथम कवि माना है। इनकी पुस्तक "सहस्त्रगीति" में राम की उपासना है।

                        

                            (तुलसी)


● तुलसीदास जी के सम्पूर्ण चरित को समझने के लिए 3 पुस्तकों से मदद मिल सकती है जोकि तुलसीदास की रचनाओं के अतिरिक्त भी ऐसी पुस्तकें हैं जिसके माध्यम से हम तुलसीदास जी को उचित रूप से समझ सकते हैं :-

1. मूल गोंसाई चरित - बेनी माधवदास।

2. तुलसी चरित - रघुवरदास।

3. "मर्यादा" पत्रिका।


तुलसीदास जी रामानुजाचार्य के "श्रीसम्प्रदाय" और "विशिष्टताद्वैतवाद" से प्रभावित थे।

"शुक्लानुसार" तुलसी रामोपासक वैष्णव थे, पर स्मार्त वैष्णव। उनकी भक्ति "दास्य भाव" की थी।

"शुक्लानुसार" तुलसीदास जी में योगमार्ग और भक्तिमार्ग का पार्थक्य स्पष्ट शब्दों में है। वह ईश्वर को घट के भीतर नहीं बाहर (जगत) में देखते हैं।

तुलसीदास उपासना के दोनों रूपों सगुण और निर्गुण को मानते है, पर वह ईश्वर को किसी रहस्य- छिपाव के लिए अनिवार्य नही मानते।  तभी वह कहते हैं:-

"अन्तरजमहिहु तें बड़ बाहिरजामी है राम जो नाम लिखे"...।

● "शुक्लानुसार" जो भक्तिमार्ग श्रद्धा के अवयव को छोड़कर केवल प्रेम को ही लेकर चलेगा, उसका धर्म से लगाव न रह जाएगा"..।

●"बच्चन सिंह" का मत है कि तुलसीदास का वर्णाश्रम सम्बन्धी मत विडम्बना से घिरा हुआ है क्योंकि जहाँ वह एक ओर वर्णाश्रम की स्थापना करना चाहते हैं,  वहीं दूसरी ओर अपनी दुर्गति के कारण जांति पांति का विरोध करते हुए कहते हैं " धूत कहौ अवधूत कहौ", राजपूत कहौ जुलाहा कहौ..।

जिस वर्णाश्रम की वकालत तुलसी ने उम्र भर की उसी का वह खुद शिकार होने लगे थे।

●"बच्चन सिंह" के अनुसार "मानस का 7वां सोपान उत्तरकाण्ड है जहाँ पर तुलसी की मूल विचारधारा दिखाई पड़ती है"..। इस मानस के भी 2 पक्ष हैं। 

1. वैचारिक पक्ष - वर्णाश्रम का समर्थन

2. हृदयलोक - भक्तिमार्ग का समर्थन और वर्णाश्रम का विरोध 


● रामचरितमानस के बारे में तथ्य :- 

रामचरितमानस की रचना 1574 में हुई थी। मानस को तुलसी ने सबसे पहले "रसखान" को सुनाया था और इसकी प्रथम टीका "रामचरणदास" ने लिखी थी। मानस को रचने में 2 वर्ष और 7 महीने लगे जिसका किष्किंधाकांड काशी में रचा गया।

 अयोध्याकांड को मानस का हृदयस्थल कहा जाता है। इस पर शुक्लजी कहते हैं कि " चित्रकूट की सभा एक आध्यात्मिक घटना है"..।

मानस में रचनाकौशल, प्रबन्धपटुता, सहृदयता सब गुणों का समाहार है।

"बच्चन सिंह" के अनुसार तुलसी के मानस पर आध्यत्म रामायण (माधवदास) का प्रभाव है।

मानस की रचना स्वान्तः सुखाए, लोकमंगल के लिए की।

"बच्चन सिंह" के अनुसार "मानस की नींव ग्रास्थिक जीवन पर रखी गयी है"..। आगे कहते हैं कि " चित्रकूट सभा मानस का गंभीरतम प्रकरण है"..।

 "रामविलास शर्मा" के अनुसार रामचरितमानस में तुलसी की करुणा समाजोंमुख है, विनयपत्रिका में आत्मोन्मुख"..।

तुलसी ने मानस, विनयपत्रिका व कवितावाली में कलिकाल का वर्णन किया है। "कलिकाल का अर्थ"  16-17वी शती में फैली महामारी व अकाल से लिया है।

बच्चन सिंह के अनुसार मानस का कलिकाल सैद्धांतिक वर्णन है किंतु परवर्ती ग्रँथों में सारा देश ही कलिकाल के जबड़े में फँसा हुआ दिखाई देता है। इसका प्रतिनिधित्व काशी करता है"..।


● तुलसीदास की अन्य रचनाएँ :- 

तुलसी की प्रथम रचना "वैराग्य संदीपनी" है। कुछ लोगों ने रामलला नहछू को भी माना है। अंतिम रचना "कवितावाली" या उसका परिशिष्ट "हनुमानबहुक"।

बच्चन सिंघ के अनुसार "हनुमान बाहुक" में मृत्यु पीड़ा की चीख दिखती है।

"रामाज्ञा प्रश्न" एक ज्योतिष ग्रँथ है। अपने मित्र गंगाराम ज्योतिषी के कहने पर काशी गंगा घाट पर की थी।

"गीतावली" की रचना तुलसी ने सूर के कहने पर की थी । सूर की गोपियाँ जिस तरह से हिंडोला खेलती हैं, वही करते राम भी दिखाए गई हैं। बस इतना फर्क है कि सीता की सखियों और नगर की नारियों का राम के प्रति उपासना भाव की प्रकट होता है।

"बरवै रामायण" तुलसीदास ने अपने मित्र रहीम के कहने पर रची थी।

"विनयपत्रिका" तुलसी की सबसे उत्तम गीतिकाव्य है।



● तुलसी की भाषा में पड़ने वाले प्रभाव :-

1. वीरगाथाकाल की छपय्य पद्धति।

2. विद्यापति और सूर की गीत पद्धति 

3. गंग आदि भाट की कवित्त-सवैया पद्धति।

4. कबीर की नीति सम्बन्धी पद्धति।

5. ईश्वरदास की चौपाई पद्धति 


"शुक्लानुसार" तुलसी का ब्रज और अवधी पर समान अधिकार था। वह कहते हैं " तुलसी ने हिंदी की सब प्रकार की  काव्य शैली के ऊपर अपना ऊँचा स्थान प्रतिष्ठित किया है"..।

"रामस्वरूप चतुर्वेदी" के अनुसार "तुलसी भाखा में काव्यरचना करके लोक में प्रसिद्ध होते हैं और संस्कृत में करके पंडितो में"...।

अर्थात तुलसी संस्कृत में 'सनातम धर्म की शास्त्रीय परंपरा के प्रति' निष्ठावान हैं, और देसीभाषा में 'लोक के प्रति' निष्ठावान दिखाई देते हैं।


● तुलसी के सम्बंध में कहे गए कथन :

1.  नाभादास - कलिकाल का सबसे बड़ा कवि

2.  गोल्डस्मिथ- मुगलकाल का सबसे महान व्यक्ति

3.  ग्रियर्सन- बुद्धदेव के बाद सबसे बड़ा लोकनायक

4.  रामविलास शर्मा - जातीय कवि

5.  अमृतलाल नागर- मानस का हंस

6.  "बच्चन सिंह" के अनुसार "कबीर का भक्ति आंदोलन अगर विद्रोहमूलक है तो तुलसी का प्रतिरोधात्मक "...। आगे कहते हैं " उनकी मूल विचारधारा वर्णाश्रम धर्म की पोषिका है जो इस देश की सामंती व्यवस्था का मूलाधार है"..।

7.  शुक्लानुसार "तुलसी की भक्ति धर्म और ज्ञान दोनों की रसानुभूति कराती है"..। वह कवि और उपदेशक दोनों रुप में आते हैं।

8.  शुक्लानुसार "गोस्वामी जी की प्रतिभा का प्रखर प्रकाश 150 वर्षो तक ऐसा छाया रहा के रामभक्ति का कोई भी कवि उनके आगे टिक न सका".....।

9.  शुक्लानुसार " भारतीय जनता अगर प्रतिनिधि कवि किसी को कह सकते हैं तो इन्ही महानुभाव को"....।

10.  हजारीप्रसाद के अनुसार "लोकनायक वही हो सकता है जो समन्वय करने का अपार धैर्य लेकर आया हो। उनका सारा काव्य समन्वय की विराट चेश्टा है"....।

11. रामस्वरूपचतुर्वेदी के अनुसार" कबीर ऊपर से अक्खड़ परन्तु अंदर से भोले हैं, परन्तु तुलसी ऊपर से विनयी और अंदर से जटिल और व्यवहार-कुशल है".....।              

12.  रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार "तुलसी की प्रतिभा इसी मेँ है कि उन्होंने भक्त और रचनाकार की भूमिका का सफल निर्वाह किया है......।  


● मानस के चारों वक्ताओं का वर्णन :-

काकभुशुंङी - गरुड़ संवाद (उपासना घाट)

तुलसी - सन्त संवाद (प्रप्तिघाट)

शिव पार्वती संवाद (प्रथम वक्ता) (ज्ञानघाट/राजघाट)

याज्ञवल्क्य भारद्वाज (पंचायती घाट)


● तुलसी को अलंकार योजना की संज्ञा :-

शुक्ल - अनुप्रास का बादशाह

उदयभानू सिंह - उत्प्रेक्षा का बादशाह  

भगवानदीन व बच्चन सिंह - रूपकों का बादशाह


● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018

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