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Tuesday, April 27, 2021

रीतिकाल भाग - 4

 


●  रीतिकाल की प्रथम व अंतिम रचना:-

प्रथम रचना "रस विलास"- चिन्तामणि 

अंतिम रचना " रसरंग" ग्वाल कवि


● रीतिकाल के अन्य कवि:-


1. चिंतामणि :- शुक्लानुसार हिंदी रीतिग्रन्थकारो की शुरुआत चिंतामणि से होती है और इन्हीं को रीतिकाल का "प्रथम कवि" माना है।  इनके आश्रयदाता "मकरंदशाह" थे जोकि शिवाजी के पितामह थे। ये तिकवांपुर के रहने वाले थे। इन्होंने अपने कुछ गर्न्थो में अपना नाम "मणिमाला" रखा है।

2. मतिराम :-  शुक्लानुसार "मतिराम" की सबसे बड़ी विशेषता है कि "उसकी सरलता अत्यंत स्वाभाविक है, न तो उसमें भावों की कृत्रिमता है और न ही भाषा की"..। 

• रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार " मतिराम का काव्य मितकथन और प्रगल्भ का सन्धि -बिंदु है"...।

• बच्चन सिंह के अनुसार इस युग में 2 मतिराम थे। एक "रसराज" वाले और दूसरे "अलंकार पंचाशिका" वाले। इनका "ललित ललाम" अलंकार ग्रँथ है जिसमें 60 छंदों में राजप्रशस्ति का वर्णन है।

3. महाराज जसवंत सिंह :- शुक्लानुसार "जसवंत सिंह" ने अपने "भाषा भूषण" की रचना जयदेव के "चन्द्रलोक" के आधार पर की है परन्तु अलंकार को अनिवार्य नहीं माना है। 

• शुक्लानुसार "भाषाभूषण" की रचना आचार्य रूप में हुई है न कि कवि रूप में।

4. कुलपति मिश्र :-  शुक्लानुसार "कुलपति मिश्र" का "रस रहस्य" मम्मट के "काव्य प्रकाश का छायानुवाद" है। परन्तु इसमें भाषा और वाक्य के दुरूहता की कमी है। 

5.रसलीन :- इनका पूरा नाम सैयद गुलाम नवी था। इनकी मुख्य रचना "अंगदर्पण" में काव्य के अंगों का वर्णन है।

• शुक्लानुसार अंगदर्पण :- "इस छोटे से ग्रँथ को पढ़कर रस का विषय जानने के लिए और ग्रँथ पढ़ने की आवश्यकता नहीं"..।

6.  भिखारीदास :- इन्होंने अपना "काव्यनिर्णय" में सोमवंश के पृथ्वीसिंह के भाई "हिंदुपति सिंह" को अपना आश्रयदाता बनाया है। यह अलंकार ग्रँथ है।

• शुक्लानुसार "यह काव्यांग निरूपण के सर्वप्रधान कवि थे। जिन्होंने छंद, अलंकार, रस, रीति, गुण, दोष आदि सब पर विचार किया है, परन्तु इनके लक्षण कुछ गड़बड़ है और कहीं कहीं अपर्याप्त भी"...।

शुक्लानुसार आचार्यत्व के सम्बंध में यह भी देव के समान ही हैं परन्तु इन्हें सच्चा आचार्य नहीं माना जा सकता।

• "रस सारांश" इन्होंने देव के जातिविलास के समकक्ष लिखी है, जिसमें नाइन, धोबी, कुम्हारिन आदि का वर्णन है। 

• रीतिकाल में नितांत जड़वादी काव्य-परम्परा चलने पर उस युग के काव्य-सौंदर्य में खलल पड़ती है जिसे ध्यान में रखते हुए बच्चन सिंह कहते हैं :- यदि भिखारीदास की परंपरा चली होती तो हिंदी का अपना काव्यशास्त्र बन गया होता"...।

7.  सुखदेव मिश्र :- इनके "अध्यात्म प्रकाश" में ब्रह्मज्ञान की बाते कहीं हैं। राजा "राजसिंह" ने इन्हें कविराज की उपाधि दी थी।

8.  सुरति मिश्र:- इन्होंने बिहारी सतसई, रसिकप्रिया और कविप्रिया की टीका लिखी है।

9. प्रतापसाहि :- इनकी "व्यंग्यार्थ कौमुदी" व्यंजना के उदाहरण के संग्रह है। इनके आश्रयदाता चरखारी के "विक्रमसाहि" थे। 

• शुक्ल जी ने इन्हें आचार्य मानते हुए कहा है " यदि हम आचार्यत्व की दृष्टि से देखे तो यह मतिराम, श्रीपति और दास से कुछ 20 ही बैठते हैं"..।

शुक्लानुसार "पद्माकर की अनुप्रासयोजना रुचिकर सीमा से बाहर जा सकती है परन्तु इनकी नहीं"..।

"सीख सिखाई न मानती है, बस ही बस सखिन के आवे" पँक्ति को शुक्ल ने ध्वनि और व्यंग्यार्थ के रूप में देखा है जिसका विरोध करते हुए बच्चन सिंह इसे नायक-नायिका भेद बताते हैं।

10.  ब्रजवासी दास:- यह वल्लभ सम्प्रदाय के अनुयायी थे। इन्होंने तुलसी के मानस के अनुकरण में दोहों-चौपाइयों में "ब्रज विलास" की रचना की है। जिसकी कथा सूरसागर के ग्रँथ से ली गयी है जिसमें सूर के कई पद सीधे-सीधे उठा लिए गए हैं।

इसमें कृष्ण के जन्म से लेकर मथुरागमन तक का वर्णन है।

11.  सूदन :- इन्होंने सूरत, भरतपुर के राजा "सुजान सिंह"         (सूरजमल) पर पराक्रम चरित को दिखाते हुए "सुजानचरित" लिखा था। इस ग्रँथ में 1745 से लेकर 1753 ई. तक का वर्णन है। यह कथा काल्पनिक न होकर ऐतिहासिक है।

12. बेनी बंदीजन :- इनका "टिकतराय प्रकाश" महाराज टिकतराय के आश्रय में रहकर लिखा गया था।

इन्होंने भंडौवो का इस्तेमाल करके इस नाम से एक संग्रह निकाला था। इस तरह की रचना हास्य/व्यंग्य के लिए लिखी जाती है। फ़ारसी में इस तरह की रचना "हजो" और अंग्रेजी में "सटायर" कही जाती है।

13. लाल कवि :- इन्होंने महाराज छत्रसाल की आज्ञा से उनकी जीवनी "छत्रप्रकाश" नाम से लिखी थी। यह "नागरीप्रचारिणी सभा" से प्रकाशित हुआ है।

14. दूलह :- इनका "कविकुल कंठाभरण" अलंकार ग्रँथ।

एक कवि ने इनपर प्रसन्न होकर यहाँ तक कह दिया था कि " और बराती सकल कवि, दूलह दूलहराय"..।

15. आलम :-  इनके आश्रयदाता का नाम औरंगजेब के पुत्र "मुजमशाह " था। आलम नाम से 2 कवि हुए हैं। एक "माधवानल कामकन्दला" वाले तो दूसरे "आलमकेलि" वाले परन्तु आगे चलकर भक्तिकालीन और रीतिकालीन आलम में अंतर स्पष्ट हो गया था। 

ये "शेख" नाम की रँगरेजिन पर फ़िदा थे जिनके कारण ये आगे चलकर मुसलमान हो गए थे और इनसे निकाह भी कर लिया था। बाद में उनके चक्कर में फंस कर मुसलमान हुए और विवाह किया। इनके पुत्र का नाम "जहान" था।

• बच्चन सिंह ने आलम का पूरा नाम "आलमशेख" बताया है और रँगरेजिन का अन्य नाम बताया है।

आलम ने एक बार रँगरेजिन को एक पगड़ी रँगने को दी जिसकी खूट में एक काग़ज रह गया जिसमें लिखा था कि  :-

"कनक छरी सी कामिनी काहे को कटी छीन"

वापस में रँगरेजिन का ये जवाब आया कि :-

"कटि को कंचन काटि बिधि कुचन मध्य धरि दीन।

16.  बोधा :- ये "सुभान" नामक वैश्य पर मरते थे। सुभान के 6 महीने वियोग से ये पूरी तरह से टूट चुके थे और उसी की प्रतिक्रिया में "विरहवारिश" नामक ग्रन्थ की रचना की। 

जब ये 6 महीने बाद लौटकर आये तो अपने "आश्रयदाता पन्ना सिंह" को इस ग्रँथ के पद सुनाकर उनके खुश होने से इन्हें अपनी प्रेमिका मिल गयी थी।

17.  ठाकुर :- ये बुंदेलखंड वाले जाति के कायस्थ थे। इनकी कभी कभी पद्माकर से नोक झोंक हो जाया करती थी।

एक बार पद्माकर बोले :"ठाकुर कविता तो अच्छी करते हो पर पद कुछ हल्के पड़ते हैं। जिस पर ठाकुर कहने लगे कि " तभी तो हमारी कविता उड़ी उड़ी सी लगती है "...।

रीतिकालीन कवियों में यह कमी थी कि वह सच्चे कवि न होकर केवल बने बनाये उदाहरण को लेकर कुछ-कुछ बक दिया करते थे और उनकी कविताएँ ढेले फेंकने सी प्रतीत होती थी। इसी भाव को लक्षित करते हुए ठाकुर कहते हैं :-

"डेल बनाए आय मेलत सभा के बीच

लोगन कवित्त कीबो खेल करि जानो है'..।


• एक बार हिम्मतबहादुर से नोक झोंक होने पर इन्होंने अपनी तलवार निकाल ली थी और कहा था कि :-


"सेवक सिपाही हम उन राजपूतन के

दान युद्ध जुरिबे में, नेकु जे न मुरके"...।


जिसपर हिम्मत बहादुर ने कहा कि हम आपको जाँच रहे थे कि आप सचमुच के वीर हैं या बस ऐसे ही।

                               

• शुक्लानुसार "ठाकुर ठसक" लाला भगवान दीन ने लिखी थी, और बच्चन सिंह के अनुसार लाला जी ने इसका सम्पादन किया था।

• बच्चन सिंह के अनुसार "ठाकुर की भाषा तो बोलचाल के निकट आ गयी थी"..।

18.  जिस प्रकार लक्षण ग्रँथ लिखने वाले अंतिम कवि पद्माकर है उसी प्रकार समूची श्रृंगार परम्परा के अंतिम कवि "द्विजदेव" थे।  

19. बच्चन सिंह के अनुसार "ग्वाल" अंतिम शास्त्र कवि हैं।

● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018

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