(भारतेंदु युग)
● हिंदी साहित्य में आधुनिक काल को आचार्य शुक्ल ने "गद्यकाल" का नाम दिया है।
● "रेनेसॉ" जिसका अर्थ नवजागरण या पुनर्जागरण होता है। इसका सबसे पहले इस्तेमाल फ्रांसीसी इतिहासकार "मिशीसेट" ने 19वी सदी में किया था। इसी आधार पर भारतीय आलोचकों द्वारा भक्तिकाल को "नवजागरण" और आधुनिककाल "पुनर्जागरण" का नाम दिया गया है।
● रामविलास शर्मा हिंदी नवजागरण को 2 भागों में बाँटते हैं:-
1. लोक जागरण (भक्ति आंदोलन)
2. नवजागरण (हिंदी नवजागरण या आधुनिक काल)
रामविलास शर्मा "लोकजागरण" की परिभाषा देते हुए कहते हैं "लोकजागरण प्रथम जातीय निर्माण को व्यक्त करने वाला सांस्कृतिक आंदोलन है, जिसका मुख्य स्वर सामन्त विरोधी तथा मानवतावादी है। भक्ति आंदोलन का काव्य ही "लोक जागरण" का काव्य है"...।
"नवजागरण या हिंदी नवजागरण" की परिभाषा देते हुए रामविलास शर्मा कहते हैं " यह राष्ट्रीय स्वाधीनता के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक आंदोलन है, जिसका मुख्य स्वर साम्रज्यवाद विरोधी तथा सामंतवाद के विरुद्ध है"..।
• रामविलास शर्मा की नवजागरण पर दी गयी परिभाषा से प्रभावित होकर "मैनेजर पांडेय" कहते हैं कि " रामविलास शर्मा हिंदी नवजागरण और उसके साहित्य की विशेषताओं का सशक्त, स्वतंत्र और प्रमाणिक विवेचन करने वाले पहले व्यक्ति हैं"..।
• रामस्वरूप चतुर्वेदी का मत है कि " पुनर्जागरण दो जातीय संस्कृतियों की टकराहट से उतपन्न रचनात्मक ऊर्जा है"..।
रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार पुनर्जागरण का भारतीय साहित्य में पहला प्रतिफलन माइकेल मधुसूदन दत्त के बंगला काव्य " मेघनाद वध" 1861 को माना गया है।
इसी के आगे चतुर्वेदी जी कहते हैं कि " आधुनिक काल में आकर मनुष्य सारे चिंतन का केंद्र बनता है, और ईश्वर की धारणा व्यक्तिगत आस्था के रूप में स्वीकृत होती है"..।
(भारतेंदु युग)
● इस युग का नामकरण आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक "भारतेंदु" के नाम पर किया गया है जिन्हें हिंदी नवजागरण का "अग्रदूत" माना जाता है। इसी आधार पर डॉ नगेन्द्र इस युग को "पुनर्जागरण काल" कहते हैं ।
रामविलास शर्मा ने आधुनिककाल को "नवजागरण" कहा है।
● भारतेंदु जी सही अर्थों में हिंदी के जनक कहे जा सकते हैं। क्योंकि उनकी भाषा सदासुखलाल, लल्लूलाल, सदल मिश्र, सितारे हिंदी आदि की एकपक्षीय नजरिये से भिन्न थी। उनकी भाषा जनता की सामान्य बोली के रूप में थी इसीलिए वह ज्यादा प्रभावी हुई।
भारतेंदु के विद्या गुरु भले ही "शिवप्रसाद" 'सितारे हिन्द' थे परंतु भाषानीति को लेकर आगे गुरु-शिष्यों में मतभेद हो जाता है।
भारतेंदु में राज भक्ति और राष्ट्र भक्ति दोनों अपने स्थान और खड़ी है।
• भारतेंदु "कविता वर्धनी सभा" के नाम से समस्यापूर्ति आयोजन करते थे। इसी सभा का प्रभाव कानपुर के रसिक समाज और आजमगढ़ के कवि समाज मे भी पड़ा।
भारतेंदु ने "नारद भक्ति सूत्र" और "शांडिल्य भक्ति सूत्र " का अनुवाद क्रमश "तदीए सर्वस्व" और "भक्ति सूत्र वैजंती" के नाम से किया है।
● "विजेन्द्र स्नातक" के अनुसार भारतेंदु के भक्ति लेखनशैली में वल्लभाचार्य का प्रभाव है।
"विजयनी विजय" नामक रचना मिस्र में भारतीय सेना की विजय प्राप्ति पर लिखी गयी थी।
भारतेंदु के शुरुआती शेरो-शायरी "इंदर सभा" नामक शीर्षक में प्रकाशित हुए थे। यह हिंदी साहित्य में "पैरोडी" का प्रथम रचना है। पैरोडी उसे कहते हैं जो नाटक न होकर उसका आभास कराने वाली रचना हो।
● शुक्ल जी के अनुसार भारतेंदु ने जिस प्रकार गद्य की भाषा का स्वरूप स्थिर करके गद्य साहित्य को देशकाल के अनुसार नए-नए विषयों की ओर लगाया, उसी प्रकार कविता की धारा को भी नए-नए क्षेत्रों की ओर मोड़ा। इस रंग में सबसे ऊँचा स्वर देशभक्ति का था। उसी से लगे हुए विषय लोकहित, समाजसुधार व मातृभाषा का उद्धार था"..।
इसके आगे शुक्ल कहते हैं कि " हमारे जीवन और साहित्य के बीच में जो विच्छेद बढ़ रहा था, उसे उन्होंने दूर किया। हमारे साहित्य को नए-नए विषयों की ओर प्रवृत्त करने वाले हरिश्चंद्र ही थे"..।
शुक्ल के अनुसार " उन्होंने हिंदी साहित्य को एक नए मार्ग पा लेकर खड़ा कर दिया था। साहित्य के नए युग के प्रवर्तक हुए"...।
● रामस्वरूप चतुर्वेदी का मत है कि " भारतेंदु विचारों से जितने आधुनिक थे उतने संस्कारों से नहीं"...।
रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार "भारतेंदु का व्यक्तित्व संक्रांतिकालीन चेतना का रूप है"..। इसी के आगे वह कहते हैं " कविता में उनका संस्कार है तो गद्य में उनका विचार। एक के लिए ब्रजभाषा को वे पकड़े हुए हैं और दूसरे के लिए खड़ीबोली को अपनाते हैं"। यही हिंदी साहित्य में पुनर्जागरण के प्रवर्तक माने जाते हैं।
● प्रेमघन उर्दू में "अब्र" नाम से लिखा करते थे।
"जीर्ण जनपद" में प्रेमघन अपने गाँव की दूर्दशा का यथार्थवादी चित्रण करते हैं। इसका एक अन्य नाम "दुर्दशा दत्तापुर" भी है। यह एक "लघुखण्ड काव्य" है। बच्चन सिंह के अनुसार इन कविता पर गोल्डस्मिथ के "डेर्जेट विलेज" का प्रभाव पड़ा है।
बच्चन सिंह के अनुसार हिंदी में "लघुखण्ड काव्य" लिखने की शुरुआत यही से होती है।
प्रेमघन ने दादा भाई नौरोजी को काला कहे जाने पर क्षोभपूर्ण कविता लिखी थी।
प्रेमघन की काव्य भाषा में पुराने ढंग की झलक दिखाई पड़ती है।र
● भारतेंदु युग में प्रकृति प्रेमी "ठाकुर जगमोहन सिंह" थे। वह प्रकृति के मनोरम दृश्य की कविताएँ लिखा करते थे। इनके काव्य में अनुप्रसिकता की झलक दिखाई पड़ती है
शुक्ल जी के अनुसार "जगमोहन सिंह जी भले ही अपनी कविता को नए विषयों की ओर नहीं ले गए, पर प्राचीन संस्कृत काव्यों के प्राकृतिक वर्णनों का संस्कार मन में लिए हुए, अपनी प्रेमचर्या की मधुरस्मृति से समन्वित विंध्यप्रदेश के रमणीय स्थलों को जिस सच्चे अनुराग की दृष्टि से देखा है, वह ध्यान देने योग्य है"..।
● विजेन्द्र स्नातक के अनुसार अम्बिकादत्त व्यास ने अंग्रेजी कवि बायरन का "शीलन का बंदी" नाम से अनुवाद किया।
अम्बिकादत्त व्यास को उनकी शुरुआती कविता " चिरजीवी रहौ विक्टोरिया रानी" पर समस्यापूर्ति लेखन करके "सुकवि" की उपाधि से सम्मानित होने का गौरव हासिल हुआ।
विजेन्द्र स्नातक के अनुसार भारतेंदु ने इन्हें महज 12 वर्ष की उम्र में ही "सुकवि" की संज्ञा दे दी थी।
● अयोध्याप्रसाद खत्री ने खड़ीबोली आंदोलन के लिए "खड़ीबोली आंदोलन" नामक पुस्तक निकाली थी जिसमें यह बड़े जोर-शोर के साथ कहते कि "आज तक जो कविता हुई थी वह ब्रजभाषा में हुई, हिंदी में नहीं। हिंदी में भी कविता हो सकती है"..।
इनकी नजर में खड़ीबोली ही हिंदी थी। अपनी पुस्तक में इन्होंने पद्य की 5 शैलियों के का जिक्र किया है। यह खड़ीबोली में कविता करने के लिए लोगों से अनुरोध किया करते रहते थे।
इसी के अतिरिक्त भारतेंदु के ही समकालीन लेखक, कवि "चन्द्रशेखर मिश्र" जोकि संस्कृत के साथ हिंदी के भी अच्छे ज्ञाता थे। वह अयोधयाप्रसाद जी के बारे में कहते हैं कि " मैं समझता हूँ कि हिंदी साहित्य के आधुनिक काल में संस्कृत वृतों में खड़ीबोली के कुछ पद्य पहले-पहल मिश्र जी ने ही कहे"...।
चंद्रशेखर मिश्र से खत्री जी ने बहुत सी हिंदी भी सीखी थी। इसी तरह से, जहाँ कहीं भी खड़ीबोली के बारे में जो भी जानकारी मिलती उसे अपने गुटका में शामिल कर लेते और जहाँ भी मौका मिलता खड़ीबोली की उन्नति और उसका बखान करने लगते। इसके साथ एक दूसरे व्यक्ति भी खड़ीबोली के प्रचार प्रसार में दिनरात लगे थे। वह थे "प. गौरीदत्त"..।
● भारतेंदु युग पर कहे गए कथन :-
1. रामविलास शर्मा के अनुसार " भारतेंदु युग का साहित्य गदर से प्रभावित है। इसका पहला प्रमाण किसानों को लक्ष्य करके लिखा जाना जितना हिंदी में हुआ उतना किसी अन्य भारतीय भाषा में नहीं"...।
वह भारतेंदु युग की जनवादिता के बारे में कहते हैं कि " भारतेंदु युग के साहित्य का जनवादी अर्थ यह है कि, वह भारतीय समाज के पुराने ढाँचे से संतुष्ट न रहकर उसमें सुधार हैं"..।
2. हजारीप्रसाद जी के अनुसार " भारतेंदु युग से पूर्व का साहित्य कबीर की कुटिया से निकलकर राजा-रईसों के दरबार मे घुस गया था। उन्होंने एक तरफ तो काव्य को फिर से भक्ति की पवित्र मंदाकिनी में स्नान कराया और दूसरी तरफ दरबारीपन से निकाल कर लोक जीवन के आमने-सामने खड़ा कर दिया"..।
3. विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार" इस युग में काव्य की भाषा गद्ययोन्मुख हो गयी थी, यद्दपि वह ब्रज ही बनी रही। गद्य पहली बार साहित्य का प्रधान माध्यम बन रहा था। साथ ही कविता की भाषा भी गद्य की ओर झुक रही थी।
4. रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार" भारतेंदु युग के एक और माध्यम को द्विवेदी युग के कुछ लेखकों ने पकड़े रखा, वह था समस्या-पूर्ति का माध्यम। भारतेंदु मंडल के लेखकों ने अधिकतर ब्रजभाषा में समस्या-पूर्ति लिखे हैं और इनका गढ़ काशी था। यह समस्या पूर्ति कवि-सम्मेलनों में सार्वजनिक रूप से पढ़े जाते थे।
5. भारतेंदु मंडल के लेखकों ने जहाँ एक तरफ ब्रिटिश राज की प्रसंशा की है तो उनकी बुरी आदतों व व्यवस्था की बुराई भी की है। इसलिए यह राजभक्ति और देशभक्ति का युग था। साथ ही इसमें रीतिवाद के साथ स्वछंदता भी एकसाथ ही था।
6. खड़ीबोली में कविता करने की समस्या व शुरुआत इसी युग से हुई।
● सहायक ग्रन्थ :-
1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।
2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण।
3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।
4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।
5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018
6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018
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