(द्विवेदी युग)
"हिंदी साहित्य लोचन" के मंच पर आज आप हिंदी साहित्य की इतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "आधुनिक काल" के नाम से जाना जाता है, जिसकी एक शाखा "द्विवेदी युग" के नाम से भी जानी जाती है। आज हम इसी के बारे में यहाँ कुछ विस्तार से चर्चा करने जा रहे हैं। उसमें भी खासतौर पर द्विवेदीयुगीन एमी महत्वपूर्ण कवियों की रचनाओं व उनके साहित्यिक कर्म के बारे में कुछ तथ्यात्मक व वर्णनात्मक जानकारी साझा करने जा रहे हैं। आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी होगी साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान प्रदान करेगी।
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1. कवि "जगन्नाथ दास" जिनका उपनाम 'रत्नाकर' था, इन्होंने अंग्रेजी कवि "पोप" के समालोचना सम्बन्धी प्रसिद्ध काव्य "एस्से ऑन क्रिटिसिज़्म" का अनुवाद 'समालोचनादर्श' नाम से किया है।
इनकी प्रसिद्ध कृति "गंगावतरण" जोकि 1927 में प्रकाशित हुई थी। उसमें गंगा के धरती पर उतरने और शिव द्वारा उन्हें संभालने के लिए सन्नद्ध होने का वर्णन ओजगुण में किया है। रचना में किये गए ओजगुण का वर्णन ऐसा है कि वह पाठकगण को आनंदित होने को बेकरार कर देता है।
"हिंदी साहित्य लोचन" अपने मंच पर यह स्पष्ट करना चाहता है कि, कवि रत्नाकर जी की अन्य महत्वपूर्ण रचना "उद्धव शतक" जोकि 1929 में आई थी उस पर बिहारी सतसई का अनुकरण नहीं है। स्वयं बच्चन सिंह के अनुसार "उद्धव शतक" में दुलारेलाल भार्गव की रचना "दुलारे दोहावली" की तरह बिहारी सतसई की तरह अनुकृति नहीं है बल्कि उद्धव शतक की टेक्नीक और कसावट सतसई से ली गयी है"..।
कवि रत्नाकर "जकी" नाम से उर्दू में लिखते थे।
2. द्विवेदीयुगीन अन्य महत्वपूर्ण कवि " नाथूराम शर्मा" जिनका उपनाम 'शंकर' था। इन्हें इनके साहित्यिक योगदान से प्रभावित होकर हिंदी साहित्य के बड़े-बुजुर्गों ने अथवा तत्कालीन विद्वानों ने इनको "कविता-कामिनी-कांत", "भारतेंदु प्रज्ञ" , "साहित्य सुधाकर" आदि उपाधियों से नवाज़ा था।
इनकी प्रसिद्ध रचना "गर्भरण्डा रहस्य" नामक एक प्रबन्धकाव्य है। जिसमें विधवाओं की बुरी परिस्थिति और देव मंदिरों पर हुए अनाचारों आदि का वर्णन दिखाने के उद्देश्य से लिखा है।
नाथूराम शर्मा "शंकर" ने समाज में व्याप्त अंधविश्वास, रूढ़ि और पाखंड का विरोध करने जैसी कथावस्तु को अपनी रचनाओं का केंद्र बनाया है। तथा इन सबके प्रति व्यंग्य विनोद का भाव मिलता है।
जिस तरह से भारतेंदु युग में अम्बिकादत्त व्यास समस्यापूर्ति रचनाओं के लिए मशहूर थे ठीक उसी प्रकार से द्विवेदी युग में नाथूराम शंकर भी समस्यापूर्ति रचनाओं के लिए मशहूर थे।
3. "सत्यनारायण कवितरत्न" ने ब्रज में रचनाएँ की है जोकि रीतिकालीन शैली पर न होकर भक्तिकालीन कृष्णभक्तों जैसी प्रतीत होती है।
इन्होंने मैकाले की रचना "होरेशस" का पद्यबद्ध अनुवाद किया है।
4. "दुलारेलाल भार्गव" जोकि बिहारी परंपरा के कवि माने जाते हैं इन्हें इनकी "दुलारे दोहावली" पर टीकमगढ़ राज्य की ओर से 2000 रुपये का "देव पुरुस्कार" मिला था।
आचार्य शुक्ल इनके बारे में कहते हैं कि " बिहारी की प्रतिभा जिस ढाँचे की थी उसी ढाँचे की दुलारेलाल की भी है, इसमें कोई संदेह नहीं"...।
5. " हिंदी साहित्य लोचन" आपको यहाँ बताना चाह रहा है कि हिंदी साहित्य के आधुनिक काल के भीतर यदि किसी कवि ने पशुओं की दारुण स्थिति को समझा तो उनमें "लोचनप्रसाद पांडेय" जी का नाम रखा जा सकता है। इन्होंने न केवल उन मूक -असहाय पशुओं के दर्द को समझा बल्कि उनसे सम्बन्धी एक मार्मिक कृति का भी सृजन कर दिया।
"मृगी दुखमोचन" इसी तरह की रचना है, जिसमें इन्होंने खड़ीबोली के सवैयों में एक मृगी की अत्यंत दारुण परिस्थिति का वर्णन सरस भाषा में किया है। जिससे पशुओं तक पहुँचने वाली इनकी व्यापक और सर्वभूत दयापूर्ण काव्यदृष्टि का पता चलता है।
(द्विवेदीयुगीन वीररस के कवि)
"हिंदी साहित्य लोचन" जैसाकि अपनी पूर्ववर्ती पोस्टों में भी यह साझा कर चुका है कि यह एक तथ्यात्मक-वर्णनात्मक साहित्यिक मंच है। जिसके अंतर्गत कुछ विषयों व बिंदुओं पर लेखक अपने विचार भी समय समय रखता है। इसी क्रम में हम यहाँ वीर रस सम्बन्धी कुछ वर्णन करने जा रहे हैं।
यदि आधुनिककाल के अंतर्गत वीररस अथवा ओजगुण का स्वर्णकाल अगर किसी युग को कहा जा सकता है तो वह द्विवेदी युग ही था। इस युग के सबसे अग्रणी वीररस अथवा ओजगुण के कवि महाकवि "मैथिलीशरण गुप्त" जी ही थे। जिनके साहित्यिक कर्म के लिए इन्हें हिंदी का प्रथम राष्ट्रकवि घोषित किया गया। इनसे प्रभावित होकर और तत्कालीन उपनिवेशवादी परिस्थितियों को देखकर अन्य कवि भी स्वतः ही वीररस के ऐसे-ऐसे छंद बुनने लगे जिनसे स्वाधीनता की सोंधी महक आ रहा थी।
इन छंदों का एक ही उद्देश्य था। अतीत के उन महापुरुषों को याद करना जिन्होंने मातृभूमि के लिए अपना बलिदान दे दिया। उनकी गाथाओं को पुनः नए सिरे से रचकर वर्तमान भारत को अंग्रेजों से मुक्ति दिलाना। इसी क्रम में हम यहाँ कुछ द्विवेदीयुगीन वीररस के कवियों का वर्णन करने जा रहे हैं, जिन्होंने अपनी रचनाओं के कथानकों को ओजगुण का केंद्र बनाया। इतिहास के ऐसे पात्रों व घटनाओं का चयन किया जिनकी गाथा सुन जनता में एक नई ऊर्जा का संचार हो सकता था और अंग्रेजी सरकार की दमनकारी नीतियों के खिलाफ वह उठ सकने की हिम्मत जुटा सकते थे। ऐसी गाथाएँ उन्हें एक आत्मबल देती थी।
6. द्विवेदीयुगीन कवि "वियोगी हरि" के "वीर सतसई" में भारत के अनेक वीरों की प्रशस्तियाँ लिखी गयी हैं जिस के लिए इन्हें प्रयाग के हिंदी साहित्य सम्मेलन में 1200 रुपये का पुरस्कार मिला था।
7. लोचनप्रसाद पांडेय ने चितौड़ के भीमसेन के अपूर्व स्वत्व तर्ज की कथा नंददास के रास पंचाध्यायी के ढंग पर की है। इन्हें "काव्य-विनोद" व "साहित्य-वाचस्पति" की उपाधि प्राप्त थी।
8. "गयाप्रसाद शुक्ल" भी द्विवेदीयुगीन वीर रस के अग्रणी कवियों में गणनीय हैं। यह श्रृंगारिक कविताएँ 'स्नेही' नाम से और राष्ट्रीय कविताएं 'त्रिशूल' नाम से लिखते थे।
9. वीररस की कविताओं का बोलबाला ऐसा चला कि उससे ब्रज जैसी मधुर भाषा वाले कवि भी अछूते न रहे। "लाला भगवानदीन" जो पहले ब्रज में लिखा करते थे, बाद में "लक्ष्मी" के सम्पादक होने के पश्चात खड़ीबोली में भी रचनाएँ करने लगे। खड़ीबोली में इन्होंने वीरों के चरित्र को लेकर जोशीली कविताएँ लिखी जैसे - "वीर क्षत्राणी, वीर बालक, वीर पंचरत्न"..।
10. "श्यामनारायण पांडेय" की सर्वश्रेष्ठ कृति "हल्दीघाटी का जौहर" नामक महाकाव्य है जिसमें 17 सर्गो का विभाजन दिया हुआ है। इसमें मुगलकालीन मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप के वीरतापूर्ण और साहस से लबरेज़ रूप को बड़ी ही खूबसूरती के साथ दर्शाया है। इसका कथानक "महाराणा प्रताप" के नेतृत्व वाली सेना और मुगलों की तरफ से आमेर के राजा "मान सिंह " के युद्ध पर आधारित है। इस कृति पर इन्हें देव पुरुस्कार मिला है।
वीर रस को लेकर पांडेजी की कलम यहीं ही नहीं रुकी। इसके आगे भी इन्होंने अपनी इस शैली को जारी रखा। आगे चलकर "त्रेता के दो वीर" नामक एक छोटा सा काव्य लिखा है जिसमें "लक्ष्मण व मेघनाद युद्ध" के कई प्रसंग लेकर दोनों वीरों का महत्व चित्रित किया गया है। यह रचना हरिगीतिका तथा संस्कृत के कई वर्णवृतों में रची गयी है।
● द्विवेदी युग पर कहे गए कथन:-
1. रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार" यह साहित्य में पहला प्रयास था जब रीतिकालीन वृत्तियों का इतना विरोध हुआ और उसे जनाश्रय तक जोड़ा गया"..।
2. रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार भारतेंदु युग में प्रतीक रूप में खड़ीबोली का प्रयोग किया जा रहा था , द्विवेदी युग में क्रमश पूरे कविता की भाषा बन जाती है।
● सहायक ग्रन्थ :-
1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।
2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण।
3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।
4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।
5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018
6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018
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