(छायावाद)
"हिंदी साहित्य लोचन" के मंच पर आज आप हिंदी साहित्य की इतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "आधुनिक काल" के नाम से जाना जाता है, जिसकी एक शाखा "छायावाद" के नाम से भी जाना जाता है। आज हम इसी के बारे में यहाँ कुछ विस्तार से चर्चा करने जा रहे हैं। खासतौर छायावाद पर कहे गए कथन । आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी होगी साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान प्रदान करेगी।
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● नामकरण :-
पोस्ट की शुरुआत छायावाद के नामकरण को लेकर की जा रही है। छायावाद नाम को लेकर अनेक विद्वानों में एकमतता नहीं है। "हिंदी साहित्य लोचन" hindisahityalochan के मंच पर आप समझ सकेंगे कि छायावाद नाम के पीछे विद्वानों के मत भिन्न-भिन्न क्यों हैं।
1. "बच्चन सिंह" ने छायावाद को "स्वछंदतावाद" नाम देते हुए उसके पीछे के कारणों को स्पष्ट किया है। उनके अनुसार "आधुनिक काल का साहित्य लिखते समय छायावाद नाम बाधक सिद्ध हुआ क्योंकि उससे केवल पद्य की रचनाओं को ही स्वीकारा गया है, पर इसी काल में गद्य को छायावादी गद्य का नाम नहीं दिया गया। इतिहास की अपनी विवशता होती है कि प्रवृति के आधार उसे काल का नामकरण करना होता है। लिहाज़ा इस युग का एक ही नाम हो सकता है " स्वछंदतावाद"..।
इससे 2 समस्याएँ हल हो जाएंगी।
• इस युग के गद्य-पद्य के लिए एक ही नाम हो जाएगा।
• अन्य भारतीय साहित्यों और भारतीयेतर साहित्यों के स्वछंदतावादी से जुड़ जाता है।
2. आचार्य शुक्ल ने आधुनिक काल के किसी भी समय विशेष को किसी नाम-विशेष में न वर्गीकृत करते हुए उसके उत्थान रूप में देखा है। फलतः आचार्य शुक्ल ने छायावाद के स्थान पर "तृतीय उत्थान" नाम दिया है।
● छायावाद का अर्थ :-
1. चतुर्वेदी के अनुसार "महाकवि जयशंकर प्रसाद" ने छाया शब्द का अर्थ " मोती के भीतर छाया की जैसी तरलता" से निकाला है। इसका अर्थ - चमक, आब, कांति आदि से जोड़कर देखा जा सकता है। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि "छाया भारतीय दृष्टि से अनुभूति और अभिव्यक्ति की भंगिमा पर अधिक निर्भर करती है"..।
2. शुक्लानुसार सामान्य अर्थ में छायावाद का अर्थ हुआ" प्रस्तुत के स्थान पर उसकी व्यंजना करने वाली छाया के रुप में अप्रस्तुत का कथन। इस शैली के भीतर किसी वस्तु या वर्ण्य का वर्णन किया जा सकता है।
• शुक्लानुसार एक अन्य रूप से भी छायावाद शब्द का अर्थ दो अर्थों में किया जाना चाहिए :-
1. रहस्यवाद, जहाँ कवि उस अनन्त व अज्ञात प्रियतम को आलम्बन बनाकत कविताएँ लिखता है।
2. प्रयोग के काव्यशैली/ पद्धतिविशेष के व्यापक अर्थ में है। 1885 में फ्रांस में रहस्यवाद कवियों का एक दल खड़ा हुआ जो प्रतीकवाद कहलाया। व अपनी रचनाओं में अप्रस्तुत प्रतीकों का इस्तेमाल किया करते थे।
उनके अनुसार न केवल छायावादी कविताओं में यह लक्षण देखे गए बल्कि अन्य प्रकार की रचनाओं में भी यह लक्षण देखे गए।
● हिंदी में सर्वप्रथम " प.मुकुटधर पांडेय" ने जबलपुर से प्रकाशित पत्रिका में सँ 1920 में "हिंदी में छायावाद " शीर्षक से चार किस्तों में एक लेख प्रकाशित करवाया। परन्तु इससे पहले छायावाद नाम आ चुका था। और अपने इस लेख में छायावाद की 5 विशेषता भी बताई हैं : वैयक्तिकता, स्वातंत्र्य, रहस्यवादिता, शैलीगत विशेषता आदि।
• हिंदी साहित्य लोचन आपको बताता है कि , शुक्लानुसार "मुकुटधर पांडेय" को छायावाद का 'प्रथम प्रयोक्ता' माना जाता है। यह "लोचनप्रसाद पांडेय" के अनुज थे।
● छायावाद के प्रवर्तक :-
शुक्ल - मैथिलीशरण गुप्त व मुकुटधर पांडेय
नंदुलारे वाजपेयी - सुमित्रानंदन पंत
प्रभाकर माचवे - माखनलाल चतुर्वेदी
इलाचन्द्र जोशी - जयशंकर प्रसाद।
● शुक्लानुसार छायावाद की पृष्ठभूमि:-
"हिंदी साहित्य लोचन" आपसे साझा करना चाहता है कि किस प्रकार से छायावाद की पृष्ठभूमि तैयार हुई थी। हिंदी साहित्य के अंतर्गत छायावाद का आगमन किन कारणों से हुआ था इसके बारे में तथ्यात्मक-वर्णनात्मक चर्चा करके हम आपतक इस जानकारी को प्रसारित करने की कोशिश करेंगे।
"रवींद्रनाथ ठाकुर" की उन कविताओं की धूम उठी जो अधिकतर पाश्चातय ढाँचे को आधार बनाकर चल रही थी, परन्तु इसाई संतो के छायाभास (फैंटामासा) तथा योरोपीय काव्यक्षेत्र में प्रवर्तित आध्यात्मिक प्रतीकवाद (सिम्बोलिज़्म) के अनुकरण पर रची जाने के कारण बंगला में ऐसी कविताएँ छायावादी कहलाई गई।
छायावाद नाम चल पड़ने का परिणाम यह हुआ कि बहुत से कवि रहस्यात्मक, अभिव्यंजना के लाक्षणिक वैचित्रय, वस्तुविन्यास की विश्रृंखलता, चित्रमयी भाषा और मधुमयी कल्पना को ही साध्य मानकर चले। शैली की इन्हीं दूरारूढ़ साधना में ही लीन हो जाने के कारण अर्थभूमि की ओर उनकी दृष्टि न रही। प्रणयवासना का यह उद्गार आध्यात्मिक पर्दे में ही छिपा रहता है। हृदय की सारी कामवासनाएँ, इंद्रियों की सुखविलास की मधुर और रमणीय समग्र के बीच एक बंधी हुई रूढ़ि पर व्यक्त होने लगी। इस प्रकार रहस्यवाद से सम्बन्ध न रखने वाली कविताएँ भी छायावादी कहलाने लगी।अतः छायावाद शब्द का प्रयोग रहस्यवाद तक ही न रहकर काव्यशैली के सम्बंध में भी प्रतीकवाद के अर्थ में होने लगा।
छायावादी की प्रथम कविता की दौड़ तो बंगभाषा की रहस्यमयी व कोमल सजीली कविताओं से हुई। पर उन कविताओं की बहुत कुछ गतिविधि अंग्रेजी वाक्य खंडों के अनुवाद द्वारा संघटित देख, अंग्रेजी कवियोँ से परिचित हिंदी कवि सीधे अंग्रेजी से ही तरह तरह के लाक्षणिक प्रयोग करके ज्यों-त्यों अनुवाद के जगह अपनी रचनाओं में जड़ने लगे।
छायावाद जहाँ तक आध्यात्मिक प्रेम लेकर चला है तबतक तो वह रहस्यवाद के अंतर्गत ही रहा। उसके आगे वह चित्रभाषा व प्रतीकवाद नाम की काव्यशैली के रूप में गृहीत होकर भी वह अधिकतर प्रेमगान ही करता रहा है। हर्ष की बात यह है कि अब कई कवि उस संकीर्ण क्षेत्र से बाहर आकर जगत,जीवन और मार्मिक पक्षों की ओर भी बढ़ रहे हैं।
● "हिंदी साहित्य लोचन" hindisahityalochan के मंच पर आप (छायावाद पर शुक्ल के मत) को देख सकते हैं :-
शुक्लानुसार "जब रवींद्रनाथ ठाकुर की कविताओं की धूम उठी तब कई कवि रहस्यवाद और प्रतीकवाद/चित्रभाषा- वाद को ही एकांत ध्येय बनाकर कविताएँ करने लगे और उसमें लौकिक व अलौकिक प्रेम को ही लक्ष्य करके जब कविताएँ करने लगे तब छायावाद का नाम ग्रहण किया गया।
जब ऐसी कविताओं में रहस्य और अभिव्यंजना की नई धारा को जिंदा किया गया तो उसमें एक नई बात यह भी देखी गयी कि कल्पना का भी अतिशय प्रयोग होने लगा है। इस पर शुक्ल जी का प्रश्नावली शैली में मत है कि" यदि भावनाओ को भी कल्पना के सहारे दिखाया जाएगा तो वह अपनी शक्ति को खो देगी और तब उसकी वस्तुयोजना भी अस्वाभाविक लगेगी"..।
• शुक्लानुसार छायावाद का आगमन द्विवेदी युग की रूखी इतिवृत्तात्मक प्रतिक्रिया में हुआ था।
• शुक्लानुसार छायावाद का पहला या मूल अर्थों में हिंदी क्षेत्रों में प्रयोग करने वाली महादेवी ही हैं, प्रसाद, पन्त व निराला या अन्य कवि तो अपनी शैलियों से ही छायावादी कहलाये हैं।
● छायावाद की परिभाषाएँ :-
1. शुक्ल - छायावाद शब्द का प्रयोग 2 अर्थ में किया जा सकता है। एक तो 'रहस्यवाद' के अर्थ में जहाँ इसका सम्बंध काव्यवस्तु से है, अर्थात जहाँ कवि उस अनन्त और अज्ञात प्रियतम को आलम्बन बनाकर अत्यंत चित्रमयी भाषा में प्रेम की अनेक प्रकार से व्यंजना करता है...। और दूसरा 'प्रयोग काव्य-शैली' या पद्धति विशेष के व्यापक अर्थ में है।
2. "बच्चन सिंह" के अनुसार शुक्ल जी ने छायावाद की असली परिभाषा यह दी है " आंतरिक प्रभाव-साम्य के आधार पर लाक्षणिक और व्यंजनात्मक पद्धति का प्रगल्भ और प्रचुर विकास छायावाद काव्य शैली की असली विशेषता है"..।
3. विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार छायावाद का अर्थ " रवींद्रनाथ ठाकुर की कविताओं के प्रभाव से आया हुआ मानकर इसका सम्बन्ध ईसाई संतो के फेंटसमाटा (छायाभास) व चित्रभाषा शैली से है।
4. जयशंकर प्रसाद - जब वेदना के आधार पर स्वानुभूतिमयी अभिव्यक्ति होने लगे तब हिंदी में उसे छायावाद का नाम दे दिया जाता है।
बच्चन सिंह के अनुसार प्रसाद ने अपने 2 लेखों "रहस्यवाद और यथार्थवाद" व "छायावाद" लिखे हैं। जिसमें से प्रथम में शुक्ल जी के रहस्यवाद में अभारतीयता देखना उन्हें अखरता है, वह इसका विरोध करते हैं। दूसरे लेख में वह छायावाद की निर्मुक्तिमुल्क परिभाषा देते हैं।
प्रसाद 'रहस्यवाद की सौंदर्य' को ही छायावाद मानते हैं। उनके अनुसार "यथार्थवाद दुखवादी है और छायावाद आनंदवादी। यथार्थवाद द्वैतावादी है और छायावाद अद्वैतवादी"..। आगे वह लिखते हैं " ध्वयनयात्मक, लाक्षणिक, सौंदर्यमय प्रतीक विधान ही छायावाद की विशेषता है।
5. महादेवी वर्मा - छायावाद तत्वतः प्रकृति के बीच जीवन का उद्गीथ है...। उसका मूल दर्शन सर्वात्मवाद का है।
6. नंदुलारे वाजपेयी - "मानव अथवा प्रकृति के सूक्ष्म, किंतु व्यक्त सौंदर्य से आध्यात्मिक छाया का भान मेरे विचार से छायावाद की सर्वमान्य व्याख्या हो सकती है"..।
बच्चन सिंह इसे शुक्ल जी से मिलती हुई परिभाषा ही मानते हैं।
7. नगेंद्र - छायावाद स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह है।
8. रामविलास शर्मा - छायावाद स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह नहीं है।
9. नामवर सिंह - छायावाद उस राष्ट्रीय जागरण की अभिव्यक्ति है, जो एक ओर पुरानी रूढ़ियों से मुक्ति चाहता था और दूसरी ओर विदेशी पराधीनता से।
10. रामस्वरूप चतुर्वेदी - छायावाद मूलतः शक्ति काव्य है, पुनर्जागरण चेतना का व्यापक और सूक्ष्म रूप है और अपनी अर्थ प्रक्रिया में मानव व्यक्तित्व को गहरे स्तरों पर समृद्ध करता है।
11. सुमित्रानंदन पन्त - छायावाद काव्य न रहकर अलंकृत संगीत बन गया...। (विजेन्द्र स्नातक के अनुसार)
12. रामकुमार वर्मा - प्रकृति का क्षेत्र ही इन कवियों की कविता का क्षेत्र है। ऐसी स्थिति में इन कविता को यदि प्रकृतिवाद कहा जाए तो गलत नहीं"..।
13. बच्चन सिंह - "छायावाद शब्द अपने आप में ही उलझा हुआ है। इसके स्थान और स्वछंदतावाद शब्द रख दिया जाए तो समस्या का हल हो जाएगा साथ ही बंगाल में किसी भी तरह की कविताओं को छायावादी कविता नहीं कहा गया। यह वाद किसी बाहरी परिवेश से प्रभावित नहीं बल्कि "अपनी ही जमीन का पौधा है"।
● सहायक ग्रन्थ :-
1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।
2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण।
3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।
4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।
5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018
6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018
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