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Monday, May 31, 2021

बिना परमिट कोहिमा

'बिना परमिट कोहिमा' :- यात्रा 1

असग़र वजाहत


डीमापुर (नागालैंड) में एक हिंदी सेवी संस्था ने हम लोगों के ठहरने का बंदोबस्त जिस कमरे में किया था उसकी दीवारों को देखकर लगता था कि काफी लंबे समय से बहुतेरे लोगों ने सभी सम्भावित तरीक़ों से इस कमरे का इतना इस्तेमाल कर लिया है कि अब किसी भी तरह से इसका इस्तेमाल नहीं हो सकता। मनुष्यों द्वारा किए जाने वाले किसी भी क्रियाकलाप से संबंधित कोई न कोई दाग़, धब्बा या चिन्ह दीवार पर देखा जा सकता था। ये दीवारें किसी मानव विज्ञानी (Anthropologist) के लिए शोध का विषय भी हो सकती थीं। मतलब यह कि दीवारों पर इतनी 'संभावना' बिखरी पड़ी थी कि हिंदी का कोई प्रयोगधर्मी उपन्यासकार अगर चाहता तो चार पांच सौ पेज का उपन्यास लिख सकता था।

मुझे और जैन साहब को कमरा पसंद नहीं आया। हम लोग एक अच्छे से होटल में आ गए और डीमापुर की घुमाई शुरू कर दी । जैन साहब ने सबसे पहले एक शाकाहारी मारवाड़ी भोजनालय का पता लगा लिया जहाँ ठेके पर खाना खिलाया जाता था। यह भोजनालय जैन साहब को आदर्श लगा था और मुझे काम  चलाऊ।

उत्तर भारत के अपने संपर्क से जब हम लोगों ने यह कहा कि हम डीमापुर के सप्ताहिक बाजार जाना चाहते हैं तो वे लगभग कांपने लगे। उन्होंने कहा कि वे 5 साल से डीमापुर में है लेकिन आज तक डीमापुर के साप्ताहिक बाजार नहीं गए हैं। वहाँ जाना बहुत खतरनाक हो सकता है। जब हम लोगों ने वहाँ जाने का पर बहुत जोर डाला तो उत्तर भारत के अधिकारी ने अपने दफ्तर के नागा गॉर्ड को बुलाकर उससे कहा कि वह हमें ले जाकर बाजार घुमा दे।

डीमापुर के सप्ताहिक बाजार में हर तरह के मांस की बड़ी बड़ी दुकानें थीं। यहाँ बकरों की तरह कुत्ते बिक रहे थे। उनका मांस भी बिक रहा था। कुछ लोग कुत्ते का मांस खाने को बुरा समझते हैं । मेरे विचार से किसी के लिए किसी जानवर का मांस खाना न खाना व्यक्तिगत पसंद या नापसंद की बात हो सकती है। लेकिन अगर कोई किसी जानवर का मांस खाता है तो उसे गिरी हुए नजर से देखना या उसकी आलोचना करना या उसे बुरा समझना ठीक नहीं है। संसार में लोग ऊंट, घोड़े, गधे, सांप, छछूंदर, मेढ़क तक का मांस खाते हैं। नागालैंड में अगर कुत्ते का मांस खाया जाता है तो उसमें क्या बुराई है? यह उनके इतिहास और उनकी जीवन शैली का हिस्सा है । 

बाज़ार में छोटे-छोटे पीले रंग के कुछ कीड़े भी बिक रहे थे। खेती-बाड़ी और घर गिरस्ती में काम आने वाले तमाम सामान बेचे और खरीदे जा रहे थे। मैं कैमरे से तस्वीरें ले रहा था। मुझे यह लग रहा था कि मैं किसी भी दुकानदार की तस्वीर लेने की कोशिश करता हूँ तो वह अपना मुँह मोड़ लेता है। मतलब फोटो खिंचवाना पसंद नहीं करता या यह पसंद नहीं करता कि उत्तर भारत का आदमी उनका चित्र ले। जो कुछ भी हो हम लोगों ने अपने प्रति एक अजीब तरह की असहमति और अस्वीकार का भाव देखा।

यूरोप की तरह भारत के नॉर्थ ईस्ट के राज्यों में भी शराब भोजन का एक हिस्सा है। इसका कारण भौगोलिक हो सकता है। यहाँ बहुत ठंड पड़ती है । लेकिन अजीब बात यह है की भारत के इन राज्यों को ड्राई बनाया गया  है। मतलब यह कि वहाँ शराब  बेचना और खरीदना जुर्म है। ऐसा क्यों किया गया है जबकि दिल्ली और मुंबई में शराब आसानी से बेची और खरीदी जा सकती है।

शाम को जैन साहब ने कहा की यार रम खत्म हो गई है चलो कहीं से खरीदी जाए।

मैंने कहा , भैया यह ड्राई स्टेट है यहाँ कहाँ मिलेगी।

 लेकिन जैन साहब के आग्रह पर हम दोनों बाहर निकले और बाजार में पूछना शुरू किया। लोगों ने बताया इधर चले जाओ, हम चले गए। फिर बताया उधर चले जाओ, हम चले गए। फिर बताया एक गली में चले जाओ, हम चले गए । फिर बताया एक सीढ़ियाँ हैं उतर कर नीचे तहखाने में चले जाओ, हम चले गए। वहाँ देखा एक आदमी सेना या अर्धसैनिक जैसे जवानों की वर्दी पहने रम बेच रहा है। सामने लोगों की भीड़ है। और वह हर उठे हुए हाथ को एक-एक बोतल पकड़ा रहा है। पूछने पर पता चला पचास की बोतल है। जैन साहब ने कहा यार इतनी सस्ती है कि दो ले लेते हैं। हम लोग दो बोतल ले लेकर बाहर आ गए।

हमारा इरादा डीमापुर से कोहिमा जाने का था लेकिन कोहिमा जाने के लिए इनर लाइन परमिट चाहिए होता है। यह परमिट डीमापुर के पुलिस  कार्यालय से मिलता है । यह इत्तेफाक की बात थी कि हम लोग क्रिसमस के आसपास डीमापुर में थे और क्रिसमस की छुट्टियों में सरकारी ऑफिस कई दिनों के लिए बंद थे।

हमारा प्रोग्राम डीमापुर में ज्यादा रुकने का इरादा न था । अब हमारे सामने चॉइस यह थी कि या तो हम बिना परमिट के ही कोहिमा जाएं या न जाएं। जैन साहब किसी भी तरह बिना परमिट के कोहिमा जाने के लिए तैयार नहीं थे। जबकि मैंने उन्हें बहुत समझाया था । मैंने उनसे कहा था कि देखो अगर हमें रास्ते में भारत की सेना या अर्ध सैनिक बल के लोग पकड़ते हैं तो हम यह सिद्ध कर सकते हैं कि हम भारतीय  हैं।  लेकिन अगर हमें नागा विद्रोही पकड़ते हैं तो वे हमसे किसी तरह का कोई कागज नहीं मांगेंगे । उन्हें जो करना है कर देंगे। जैन साहब हमेशा की तरह मेरे तर्क से प्रभावित नहीं हुए और उन्होंने कहा कि वे किसी भी सूरत बिना परमिट के कोहिमा नहीं जाएंगे और उनकी जिद में मैंने यह ठान लिया कि चाहे जो हो जाए मैं बिना परमिट के कोहिमा जाऊंगा।

(जारी.......)


'असगर वज़ाहत' की दीवार से....।

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