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Wednesday, June 2, 2021

आधुनिक काल भाग -7


            (छायावाद के अन्य कवि व तथ्य)


"हिंदी साहित्य लोचन" , hindisahityalochan, sahityahindilochan.blogspot.com


● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्य की इतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "आधुनिक काल" के नाम से जाना जाता है, जिसकी एक शाखा "छायावाद" भी है। आज हम  'छायावाद के अन्य कवियों व तथ्यों' पर विशेष रूप से ध्यान देंगे । आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान प्रदान करेगी। 

● कृपया करके ब्लॉग को फॉलो और जरूरी कमेंट करना न भूलें।

 "हिंदी साहित्य लोचन" पर आप छायावादी अन्य कवियों व तथ्यों के बारे में व उनकी रचनाओं की विशिष्टताओं पर जानकारी ग्रहण कर सकते हैं।


● छायावाद के सम्बंध में शुक्ल जी कहते हैं कि " यह वाद क्या प्रकट हुआ कि एक बने बनाये रास्ते का दरवाजा खुल पड़ा और हिंदी के कई कवि उधर एकबारगी झुक पड़े"...। 

● बच्चन सिंह के अनुसार द्विवेदी युग के कवि व लेखक मॉडरेट और स्वछंदतावाद (छायावाद) के लेखक राष्ट्रवादी हैं।


                    (अन्य धाराओं के कवि)


1. माखनलाल चतुर्वेदी:-

माखनलाल चतुर्वेदी को हिंदी साहित्य में "एक भारतीय आत्मा" कहा जाता है। यह ओजगुण के कवि हैं।

'हिंदी साहित्य लोचन' hindisahityalochan के मंच पर आप जान सकेंगे कि राष्ट्रवादी कवि माखनलाल चतुर्वेदी जी की प्रतिनिधि व चहुमुखी लोकप्रिय, प्रसिद्ध कविता "कैदी और कोकिला" है, जो ब्रिटिश साम्राज्य पर व्यंग्य प्रधान कविता है।


2. हरिवंशराय बच्चन:-

 छायावादोत्तर कवियों में मधुशाला, मधुबाला जैसी हिंदी की प्रसिद्ध कविताओं के कवि  "हरिवंशराय बच्चन" जी की भी गणना होती है। इन्हें 'हालावाद' का प्रवर्तक कहा जाता है।

• "हिंदी साहित्य लोचन" आपको जानकारी प्रदान करता है कि बच्चन जी के द्वारा प्रयोग किया गया शब्द "हालावाद" व्यवस्था-विरोध का प्रतीक है जिस बात की पुष्टि विश्वनाथ त्रिपाठी करते हैं।

• 'बच्चन सिंह' के अनुसार "मधुशाला" का प्रकाशन भले ही 1935 हो परन्तु वह 1933 में ही लिखी जा चुकी थी जिसे उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय के एक कवि सम्मेलन में सुनाया था।

बच्चन जी के अन्य महत्वपूर्ण काव्य-संग्रह 'निशा निमंत्रण', 'एकांत संगीत' और 'आकुल अंतर' हैं जिनमें पत्नी की मृत्यु के बाद कवि के शोक संदेश के गीतों की प्रस्तुति हुई है।

एकांत संगीत में अकेलापन, प्रश्नाकुल मन और आत्मनिष्ठा से सम्बद्ध गीत है। वह अपने एकांत और व्याकुलता के सामने घुटने नहीं टेकता बल्कि उनसे उबरने के संकल्प लेता है।

• बच्चन सिंह के अनुसार "मुक्तिबोध" निशा-निमंत्रण के लिए कहते हैं कि " वह अत्य आधुनिक है क्योंकि उसमें जितनी उत्तमता से यथार्थ के प्रति भावनात्मक रिश्ते का दिग्दर्शन कराया गया है वह हिंदी साहित्य जगत में दुर्लभ है"...।

• बच्चन सिंह के अनुसार "माखनलाल चतुर्वेदी की बलिदानी प्रवृति, बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' की शहीदाना मस्ती, भगवती चरण वर्मा की दीवानगी और बच्चन के अग्निपथ में एक प्रकार की सहधर्मिता है, याराना है। यह नव्य स्वछंदतावाद है"...।

                                         

3. रामधारी सिंह 'दिनकर' ;-

'हिंदी साहित्य लोचन' hindisahityalochan, sahityahindilochan.blogspot. Com पर आप जान सकेंगे कि '

हिंदी साहित्य के अंतर्गत इकलौते महाकवि दिनकर ही हैं जिन्हें आग और राग के समन्वय का कवि कहा जाता है। अन्य किसी कवि को इस उपाधि से सम्मानित नहीं किया गया है। 

• विश्वनाथ त्रिपाठी इन्हें छायावादी कवि मानते हैं।

दिनकर में साम्राज्य वाद और सामंतवाद की अमानवीयता के विरुद्ध घोर असंतोष और क्षोभ है। 


दिनकर जी की प्रसिद्ध  साहित्यिक रचनाएँ :-

1. 'बारडोली का सन्देश'  बारडोली सत्याग्रह के दौरान उनकी कविता प्रकाशित हुई थी जिसमें बारडोली विजय की गाथा वीररस में कही है। यह रचना मध्यप्रदेश के रीवा की 'छात्र-सहोदर' नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई थी।

बारडोली सत्याग्रहबारदोली सत्याग्रह भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दौरान जून 1928 में गुजरात में हुआ यह एक प्रमुख किसान आंदोलन था जिसका नेतृत्व पटेेल ने किया था। उस समय प्रांतीय सरकार ने किसानों के लगान 22 % तक की वृद्धि कर दी थी। पटेल ने इस लगान वृद्धि का जमकर विरोध किया। सरकार ने इस सत्याग्रह आंदोलन को कुचलने के लिए कठोर कदम उठाए, पर अंतत: विवश होकर उसे किसानों की मांगों को मानना पड़ा। एक न्यायिक अधिकारी बूमफील्ड और एक राजस्व अधिकारी मैक्सवेल ने संपूर्ण मामलों की जांच कर 22 प्रतिशत लगान वृद्धि को गलत ठहराते हुए इसे घटाकर 6.03 प्रतिशत कर दिया।

बारडोली सत्याग्रह में सरदार पटेल और महात्मा गांधी
चित्र:SardarPatel-BardoliPeasents.jpg
बारडोली के किसानों के साथ सरदार पटेल

इस सत्याग्रह आंदोलन के सफल होने के बाद वहां की महिलाओं ने वल्लभभाई पटेल को ‘सरदार’ की उपाधि प्रदान की। किसान संघर्ष एवं राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम के अंर्तसबंधों की व्याख्या बारदोली किसान संघर्ष के संदर्भ में करते हुए गांधीजी ने कहा कि इस तरह का हर संघर्ष, हर कोशिश हमें स्वराज के करीब पहुँचा रही है और हम सबको स्वराज की मंजिल तक पहुंचाने में ये संघर्ष सीधे स्वराज के लिए संघर्ष से कहीं ज्यादा सहायक सिद्ध हो सकते हैं।


2. "हुंकार" 1939 में कवि जन - जागरण का वैतालिक बन जाता है। 

3. "द्वंदगीत" 1940 में जीवन-जगत के रहस्यों को उभारा गया है और रसवंती में श्रृंगारिक छंद है।

4. "कुरुक्षेत्र" 1946 में युधिष्ठिर-भीष्म के संवाद पर आधारित है। इस रचना में युद्ध से सम्बंधित तर्क भी दिए गए हैं। और समस्या के हल के लिए समाजवाद के दर्शन को लिया है। इस कृति में प्रगतिवाद काव्य-आंदोलन की लहर दिखती है परन्तु उसमें घुसा हुआ गाँधीवादी दर्शन भी है।

इस रचना के सन्दर्भ बच्चन सिंह के शब्दों में "दिनकर इनका सामंजस्य बिठाने में नाकामयाब रहे"। 

• इस कृति का कथन है कि "न्यायोचित अधिकार माँगने से नहीं मिलता उसे छीनना पड़ता है"..।

5. "सामधेनी" 1947 ऋग्वेद की उस ऋचा का नाम है जो यज्ञाग्नि प्रज्वलित करते समय पढ़ी जाती है। दिनकर की सामधेनी में स्वाधीनता के यज्ञ में बलि होने वाली जवानियों का आह्वान है।

6. "उर्वशी" 1961 नर-नारी के सनातन यौन-सम्बधों को मनोविज्ञान की दृष्टि से देखने वाला श्रृंगारी काव्य है। यह महाकवि दिनकर की ख्याति की एक और अन्य रचना है। जिसके लिए इन्हें 1972 में ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था।

• आप 'हिंदी साहित्य लोचन ' hindisahityalochan' sahityahindilochan.blogspot. com के मंच पर बच्चन सिंह द्वारा कहे गए कथन को देख सकते हैं। वह इस कृति के तीसरे सर्ग को "रति-चित्रों का अल्बम" कहते हैं।

• बच्चन सिंह के अनुसार "दिनकर की कामध्यायम की समस्या कालिदास व रवि बाबू से भिन्न है। पुरुरवा काम पीड़ा से व्याकुल होकर उर्वशी के प्रेम में निमगनोंगमन हो उठता है। इस निर्बान्ध-विलास में वह इंद्रिय प्रेम तथा अतीन्द्रिय प्रेम के साथ-साथ परम् तत्व के बारे में भी सोचता है। काम समाधि या रति सुख के स्मृति चित्रों के समानांतर परम् तत्व चिंतन नहीं चल सकता। 

इस स्थिति को "मुक्तिबोध" ने कृत्रिम मनोविज्ञान कहा है। कामध्यात्म का सूत्र उन्हें बौद्ध सिद्ध के महासुखवाद से मिला है। महासुखवाद में नारी को अनुष्ठान के रूप में ग्रहण किया जाता था। किंतु उर्वशी में नारी देह के प्रति पूरी आसक्ति है।

बच्चन सिंह ने अपने हिंदी साहित्येतिहास में लहै है कि, रति व्यापार निजी होता है परन्तु दिनकर उसे ऐसे सामाजिक बना दिया है जिस पर मुक्तिबोध कटाक्ष करते हुए कहते हैं कि " मानो पुरुरवा और उर्वशी के रति कक्ष में भोपूं लगे हों जो शहर और बाजार में रति कक्ष के आडम्बरपूर्ण कमात्मक संलाप का प्रसारण कर रहे हो"...।

7. वे अहिंसा को सर्वत्र गलत नहीं मानते जिसकी पुष्टि "परशुराम की प्रतीक्षा" 1963 में की गई है। दिनकर जी की इस महान कृति का आधारस्तम्भ भारत-चीन युद्ध 1962 के दौरान भारत की पराजय से समस्त देश की निराशा व भारतीय कॉंग्रेस की विदेश नीति की विफलता का दस्तावेज है। तत्कालीन राज्यसभा सदस्य रामधारी सिंह ' दिनकर' भी कॉंग्रेस के सदस्य थे। जब उन्होंने नेहरू जी की इस नीति का भरी सदन-सभा में निंदा करते हुए कहा था 

" न रोक युधिष्ठिर को जाने दे उसे स्वर्ग धीर,

 पर लौटा दे गाण्डीव-गदा, अर्जुन-भीम वीर...।


• बच्चन सिंह के अनुसार दिनकर में माखनलाल चतुर्वेदी, नवीन और भगवती बाबू का समन्वय है। ये तीनों उनके प्रिय कवि थे विशेष तौर पर माखनलाल चतुर्वेदी जी।

                                                        

4. नरेंद्र शर्मा :-

नरेंद्र शर्मा को प्रेम और मस्ती का कवि माना जाता है जो उत्तर छायावाद के समय लिख रहे थे। बाद में यह समाजवादी व प्रगतिशील विचारधारा से भी जुड़े थे। इन्होंने पन्त की "रूपाभ" पत्रिका का भी सम्पादन किया था।

इन्होंने अपने युग के निराशा की व्याख्या करते हुए "प्रवासी के गीत" 1939 के वक्तव्य में लिखा है :- " ब्रिटिश सत्ता के कारण हमारे समाज में वर्गीकरण कुछ ऐसे ढंग से हुआ है कि हमारे कवियों तथा अन्य साहित्यकारों को किसी भी वर्ग में स्थान न मिल सका इसलिए उनका निराशावादी हो जाना स्वाभाविक थ"..।


● हिंदी में "मांसलवाद" के प्रवर्तक रामेश्वर शुक्ल अंचल हैं। और "कैप्सूलवाद" के ओंकारनाथ शर्मा ।

● रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार नंदुलारे वाजपेयी ने छायावाद के बाद नए आंदोलन की शुरुआत रामेश्वर शुक्ल 'अंचल' से मानी है और डॉ नगेंद ने गिरिजाकुमार माथुर से...।


● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018


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