(उपन्यास)
हिंदी साहित्य लोचन
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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "आधुनिक काल" के नाम से जाना जाता है। आज हम हिंदी गद्य विधा में उपन्यास, उपन्यासकारों व तथ्यों' पर विशेष रूप से ध्यान देंगे । आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी।
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"हिंदी साहित्य लोचन" पर आप हिंदी के उपन्यास, उनके रचनाकारों व तथ्यों के बारे में व उनकी रचनाओं की विशिष्टताओं पर जानकारी ग्रहण कर सकते हैं।
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उपरोक्त लिंक्स पर जाकर हिंदीसाहित्य के प्रसिद्ध उपन्यासों के चित्रों को देख सकते हैं।
1. भीष्म साहनी :-
"भीष्म साहनी" अग्रज बलराज साहनी के भाई थे। बलराज साहनी का नाम सिनेमा जगत से भी जोड़कर देखा जाता है। भीष्म साहनी कक रचनाओं में भारत-पाक विभाजन का दंश तो दिखता ही है साथ ही अतीत के कथानकों के साथ ही नारी जीवन की अनेक समस्याओं व अन्य अत्याचारों के खिलाफ भी लेखनी चलती हुई दिखती है। इनकी रचनाओं का आधार बिंदु समाज को वो बहुसंख्यक वर्ग जिसे हम मध्यवर्ग के नाम से जानते हैं उसका चित्रण भी साहनी जी की रचनाओं में निरंतर देखने को मिलता रहा है। इनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं :-
"झरोखे" 1967" में आर्यसमाजी मध्यवर्गीय परिवार की कथा दिखाई है जिसमें जीवन जीने की जिजीविषा है। लेखक का मत है कि" जिसमें समय के साथ चलने की काबिलियत नहीं वह इतिहास की गति के सामने रोड़ा बनकर चूर-चूर हो जाता है।
" कड़ियाँ" 1970 मध्यवर्गीय दाम्पत्य जीवन की कथा। जिसमें दोनों की समझ विपरीत दिशा में चलती है।
"तमस" 1973 में। हिंदी साहित्य के अंतर्गत यदि आप किसी भी औसत बच्चे से भीष्म साहनी के बारे में बात करेंगें या उनकी रचनाओं के बारे में जानना चाहेंगे तो सर्वप्रथम वह उनके सर्वश्रेष्ठ उपन्यास "तमस" का ही वर्णन करेगा। यह रचनाकार की अक्षय कृति है जिससे उन्हें हिंदी साहित्य में उच्चतम लोकप्रियता व पहुँच मिली है। यह लेखक का सबसे सफल उपन्यास है जोकि मार्च-अप्रैल के भीषण साम्प्रदायिक दंगे के 5 दिन की घटना पर आधारित है। इसका कथानक विभाजन के समय पैदा हुई त्रासदी से है।
" एक संकटपूर्ण स्थिति का वर्णन जिसमे कई वर्ग,धर्म, विचाधारा के लोगो को दिखाया गया है और इसे अधिक कुछ नही है"।(लेखक का मत)
"वसन्ती" 1980 में दिल्ली की झुग्गी - झोपड़ी में पली है एक लड़की की कथा। जैसे झोपड़ी को बार-बार उजाड़ा जाता है इसी तरह वसन्ती का जीवन भी बार बार उजड़ता है।
यह कथा मूलतः "जिजीविषा के बल पर संघर्ष करने वाली लड़की" की कथा है।
" मय्यादास की माड़ी" 1988 में किसी हवेली को केंद्र बनाकर लिखा गया है।
2. अमरकांत :-
हिंदी साहित्य में ऐसे कई रचनाकार हुए हैं जो अपनी कुछेक रचनाओं के दमपर आज तक जीवित है। जैसे प. गुलेरी जी को ' उसने कहा था ' कहानी के लिए सदैव हिंदी साहित्य में।याद रखा जाएगा ठीक उसी तरह से अमरकांत की भी कुछेक रचनाएँ ऐसी हैं जो लंबे समय तक हिंदी साहित्य में उन्हें जीवित रखने में योगदान प्रदान करेंगी। जैसे इनकी कहानी 'दोपहर का भोजन' और ऐसे ही ' और ऐसे ही इनका सर्वप्रसिद्ध उपन्यास
"इन्ही हथियारों से" 2003 में प्रकाशित हुआ था जोकि विभाजन पर आधारित है। इसका कथानायक उत्तरप्रदेश के एक जिला है जिसे 'बलिया' के नाम से जाना जाता है। यह जनपद ही कथा नायक है।
3. विशम्भरनाथ उपाध्याय :- इनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं :-
"जाग मछन्दर गोरख आया" 1983 में गोरखनाथ को चतुर्दिक धार्मिक रूढ़ियों से संघर्ष करते करते 1 युग पुरुष के रूप में दिखाया है।
"दूसरा भूतनाथ" 1985 में देवकीनंदन खत्री के भूतनाथ उपन्यास के केंद्रीय पात्र को आधार बनाकर लिखा है। इसमें भूतनाथ को जननायक के रूप में दिखाया गया है। जैसे भूत तिलिस्म तोड़ने में माहिर होता है ठीक इसी प्रकार आज के पूँजीपति व्यवस्था के तिलिस्म को तोड़ना जरूरी हो गया है और इस उपन्यास का भूत इसी तिलिस्म को टोना चाहता है।
"विश्वबाहु परशुराम" 1997 में परशुराम को ऐसे रूप में दिखाया है जो अनार्यों से संस्कृति की रक्षा करना चाहते हैं।
4. राही मासूम रज़ा :-
आज हिंदी साहित्य में राही जी कौन ही होगा जो नहीं जानता होगा। यह अपनी हिंदी साहित्य रचनाओं के लिए तो जाने ही जाते हैं उससे भी बड़ी बात यह है कि एक समय जब भारत में रंगीन टी.वी नहीं हुआ करता था या ना के बराबर था , साथ ही दर्शकों के मनोरंजन सम्बन्धी ज्यादा चैनल व कार्यक्रम नहीं आते थे तब पूरे भारत ही नहीं वरन संसार भर में भारत के 2 सबसे महान गर्न्थो की चर्चा खूब रही थी, वह भी दूरदर्शन के माध्यम से । उनमें से एक 1980 के आसपास बी.आर. चोपड़ा द्वारा निर्मित 'महाभारत' के संवाद लिखने वाले हमारे राही जी ही थे। उस कार्यक्रम के सभी संवाद एकदम दमदार और परिस्थिति अनुकूल, पात्रानुकूल, मंचानुकूल थे। जिसके दमपर आज भी उस महाभारत को लोगों का खूब प्यार मिलता रहता है। बड़ी बात यह भी है कि उसी महाभारत को आधार बनाकर बाद में बने कई महाभारत के शो बने हैं।
"आधागांव" 1966 में, यह राही जी की हिंदी साहित्य में अनमोल निधि है जिसके आधार पर हम उन्हें पहचानते हैं। उनकी ख्याति का स्तम्भ यही कृति है जिसमे गंगोली जनपद, गाजीपुर जिले में फैले आधी हिन्दू और मुस्लिम की कहानी है।
इसमें विभाजन होने के बाद पाकिस्तान और हिन्दुस्तान का वर्णन।
"कटरा बी आरजू" 1978 में इलाहाबाद के एक मुहल्ले "कटरे मीर मुलाकी उर्फ कटरा बी आरजू" में आपातकाल के दौरान मजदूरों पर हुई समस्याओं का वर्णन है।
5.जगदीशचंद्र :-
हिंदी साहित्य में इन्होंने कई रचनाओं को आकार दिया। इनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं -
"धरती धन न अपना" 1972 में लेखक का सबसे प्रसिद्ध उपन्यास आया था जो दलित जीवन और आधारित है। इस उपन्यास में दिखाया गया पंजाब सारे हिंदुस्तान के गाँवों का प्रतिनिधित्व करता है।
"आधापुल" 1973 में युद्ध की विभीषिका के यथार्थ चित्रण को लेकर लिखा गया है।
"कभी न छाड़े खेत" 1976 में जाट किसानों की ठसक की कथा है। जिसमें एक जाट परिवार छोटी-छोटी बात को तूल देकर झूठी शान के लिए लड़ जाते हैं।
"टूंडलाट" 1978 में एक सैनिक सुनील स्कूल की छात्रा रोमिला से प्यार कर लेता है। टैंक युद्ध में सुनील अपंग हो जाता है और रोमिला उसके प्रति प्रेम को बदल देती है। लेखक यह कहना चाहता है कि "युद्ध से सुकुमार सपने नष्ट हो जाते हैं।"
"घासगोदाम" 1985 दिल्ली के विस्तार के लिए जो मजदूरों, झुग्गी झोपड़ी वालो को और किसानों को परेशानी उठा ई पड़ती है उसकी कथा है कि नगरीय चकाचौंध और सुविधा के लिए वह उनकी जमीन तहस नहस कर देते हैं बाद में उन्हें लौटा देते हैं और उन्हें फिर से बसने के लिए बहुत परेशान होना पड़ता है।
"लाट की वापसी" 2000 टुंडालाट की कथा को आगे बढ़ाया है।
6. बदीउज़्मा :-
इनके प्रसिद्व उपन्यास हैं -
" एक चूहे की मौत " 1971 फेंटेसी में लिखा हुआ उपन्यास है। चुहाखाना, चुहेमार-अफसर आदि संवेदनहीन प्राणी के प्रतीक है।
"छाको की वापसी" 1975 में छोटी हैसियत के मुस्लिमों के लिए पाकिस्तान का बनना न बनना एक बराबर है। वह यह मानते हैं कि एक दिन में अपनी संस्कृति, जमीन घरबार को नहीं बदला जा सकता। विभाजन उनके लिए भी उतना ही दुखदाई है जितना हिंदुस्तानियों के।
"सभापर्व" 1994 इनकी मृत्यु के उपरांत प्रकाशित हुआ है। जिसमें अग्रेजो की कुटिल नीति के कारण वर्षों से साथ रहते आ रहे हिन्दू-मुस्लिमों को आपस में लड़वाकर उन्होंने बटवा दिया है, जिसकी परिणति विभाजन में सफल होती है।
इसकी विशेष बात यह हैं कि " आज भले ही हम आजाद हो गए हैं लोगों के चेहरे बदल गए हैं परन्तु भीतरी परतों में पशुता आज भी जीवित है।
7.ह्यदेश :-
इनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं -
" सफेद घोड़ा कला सवार" 1976 में न्यायव्यवस्था पर करारा प्रहार किया है।
" साँड़" 1981उपन्यास में शिक्षा संस्थानों में व्याप्त भ्रष्टाचार को दिखाया गया है।
"पगली घण्टी" 1995 जेल जीवन को आधार बनाकर लिखा है जिसमें जेल खुद बोलती है।
"किस्सा हवेली"2004 में जिस तरह से हवेली पुरानी होकर झड़ना/टूटना शुरू हो जाती है उसी तरह से समय के प्रवाह में वर्ण व्यवस्था भी टूटी है और महिलाओं के उत्थान में विकास आ रहा है।
"शब्द भी हत्या करते हैं" लेखक की मूल कथाभूमि से जुड़ा हुआ है जिसमें हर विचारधारा को तरजीह दी गयी है।
8.जगदम्बा प्रसाद दीक्षित -
इनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं -
"कटा हुआ आसमान" 1971 में बम्बई के सेवारत अध्यापकों की स्थिति दिखाई है।
" मुर्दाघर" 1974 में बम्बई के भटियारनो का जीवन चित्रण। व्यवस्था ने पूरे समाज को मुर्दाघर बना दिया है।उपन्यास में व्यवस्था के प्रति एक क्षोभ है।
● सहायक ग्रन्थ :-
1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।
2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण।
3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।
4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।
5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018
6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018
7. राजभाषा हिंदी वेबसाइट -' उपन्यास की परिभाषा' मनोज कुमार।
8. हिंदी उपन्यास विकिपीडिया।
9. हिंदी का गद्य साहित्य , रामचंद्र तिवारी, 12वां संस्करण, 2018, काशी
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