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Friday, July 2, 2021

उपन्यास भाग -5

 

                                (उपन्यास)


हिंदी साहित्य लोचन

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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "आधुनिक काल" के नाम से जाना जाता है। आज हम हिंदी गद्य विधा में उपन्यास, उपन्यासकारों व तथ्यों' पर विशेष रूप से ध्यान देंगे । आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी। 

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 "हिंदी साहित्य लोचन" पर आप हिंदी के उपन्यास, उनके रचनाकारों व तथ्यों के बारे में व उनकी रचनाओं की विशिष्टताओं पर जानकारी ग्रहण कर सकते हैं। 

 

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उपरोक्त लिंक्स पर जाकर हिंदीसाहित्य के प्रसिद्ध उपन्यासों के चित्रों को देख सकते हैं।


1. काशीनाथ सिंह :- 

हिंदी साहित्य के अंतर्गत काशीनाथ सिंह अपने कथा साहित्य के योगदान के लिए जाने जाते हैं। इनके कथा-साहित्य में अंचल विशेष की प्रवृति के साथ-साथ अन्य प्रवृतियों का भी समावेश है। जो भिन्न-भिन्न रूप में पाठकों के समक्ष आता है। इनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं :-

" अपना मोर्चा" 1972 में वर्तमान शिक्षा पद्धति के खोखलेपन को उजागर किया है।

"काशी का अस्सी" 2002 में यह लेखक की औपन्यासिक कृतियों में सबसे ज्यादा लोकप्रियता को प्राप्त हुआ है। काशीनाथ सिंह जी की ख्याति का आधार यही कृति है जिसमें काशी के 'अस्सी मोहल्ले' की जीवंतता को दिखाया है। वहाँ की दैनिक जीवन की चर्चा को गहराई से और उसका रेशा-रेशा बुनकर दिखाया है।

" रेहन पर रग्घू" 2008 में उपन्यास की टिपण्णी में काशीनाथ कहते हैं कि:- अगर "काशी का अस्सी"    मेरा नगर था तो "रेहन पर रग्घू" मेरा घर है ....। इस उपन्यास को 'साहित्य अकादमी' मिला है।                               

" महुआ चरित" 2012 में मध्यवर्गीय पढ़ाकू लड़की की कहानी है। महुआ उन सभी स्त्रियों का प्रतीक है जो कहीं न कहीं सामाजिक दोहरेपन से जुड़ती है और उठ खड़ी होती है। स्त्री विमर्श के प्रति खुला आग्रह न दिखाई देने के बावजूद भी यह स्त्री अस्मिता को बनाये रखने वाला उपन्यास है।

" उपसंहार" 2014 में यह एक अन्य प्रकार की विशेषता रखने वाला उपन्यास है। जिसका कथानक महाभारत ग्रन्थ से उठाया गया है। इसमें महाभारत के नायक, खलनायक, विदुषक और महाभारत के कर्ता- धर्ता भगवान श्रीकृष्ण जी के अंतिम दिनों को दिखाया है। जिसमें उन्हें अंत में किस तरह से दुख उठाना पड़ता है। कहने का अर्थ यह है कि इस भौतिकवादी और सुविधा संपन्न दुनिया मे , आधुनिकता के समय में भी लोग समझ सके कि बड़े से बड़े नायक का हश्र कैसा हो सकता है।

लेखक एक स्थान पर कहते हैं कि " महाभारत में केवल कृष्ण ही ऐसे हैं जो किसी भी वस्तु-व्यक्ति से अछूते नही हैं,वह नायक, विदुषक, योगी सब कुछ हैं।"।

श्रीकृष्ण के ऐसे चरित्र को उठाकर काशीनाथ सिंह ने वह काम किया है जो आज तक कोई भी साहित्यकार और इतिहासकार नहीं कर पाया ।


2. संजीव :-

 यह भी अपने कथा-साहित्य के लिए हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण हैं। इनका कुछ समय हैदराबाद विश्विद्यालय में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में भी कटा है। इनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं :-

"धार" 1990 में  "बंगाल" के कोयला अंचल में रहने वाले कोयला मजदूरों की नारकीय जीवन को दिखाया है। साथ ही आदिवासी  समस्या को भी उठाया है। परन्तु उनकी मुक्ति का रास्ता ढूंढने में लेखक नाकामयाब रहा।

" पाँव तले की दूब" 1995 में छोटा नागपुर के पठारी इलाके का डोंगरी अंचल है। जहाँ की वास्तविकता को लेखक ने बखूबी उतारा है।

"जंगल जहाँ से शुरू होता है" 2000 में कथाभूमि पश्चिमी चंपारण की है इसे 'मिनी चंबल' भी कहते हैं। डाकू समस्या के माध्यम से व्यवस्था में बनी जंगल राज की परतों को उधेड़ दिया है, जिसे कुछ बाहुबलियों, धन्ना सेठों, उद्योगपतियों आदि ने बना रखा है। इसकी त्रासदी इस बात पर है कि इसे बदलने की कोशिश बेकार जा रही है।

"सूत्रधार" 2003 लोक नाटककार "भिखारी ठाकुर" को आधार बनाकर लिखा गया है। यह दलित विमर्श को नया आयाम देने वाला उपन्यास है।


3. अब्दुल बिस्मिल्लाह :- 

वर्तमान में यह दिल्ली स्थित जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं। साथ ही निरंतर लेखन से भी जुड़े हुए हैं।

" झीनी-झीनी बिनि चदरिया" 1986 में बनारस के बुनकरों के शोषण की कहानी है। इसके साथ व्याप्त अशिक्षा, रूढिप्रियता आदि का भी ज़िक्र है।

"अपवित्र आख्यान" 2008 हिन्दू- मुस्लिम के सद्भाव की कहानी।


4. महापंडित राहुल सांकृत्यायन :-

हिंदी साहित्य में यात्रा त्रयी में यह भी शुमार हैं। इनकी ख्याति का अर्थ इनकी यात्रा प्रसंगों के रूप में शामिल है।

" सिंह सेनापति" 1942 में "लिच्छवि" और "जययोद्धय" 1944 में योद्धये गणतंत्र की कथा कही है, और कालपनिक रूप से मार्क्स के दर्शन करायें हैं।

" विस्मृत यात्री" में एक यात्री 500 मील की यात्रा करता है जो राहुल सांकृत्यायन  का ही प्रतीक है।


5. नरेंद्र कोहली :- 

हिंदी साहित्य के अंतर्गत गद्य-साहित्य में रामकथा व राम जी के चरित्र पर इनकी लेखनी चली है। रामायण और महाभारत को आधार बनाकर इनके कई उपन्यास लिखें हैं।    

बंगलादेश के युद्ध से कोहली को रामकथा की नई व्याख्या मिली है।  इनके उपन्यास हैं - दीक्षा, महासमर, आदि।                                                                                                              

6.शिवप्रसाद सिंह :-

"अलग-अलग वैतरणी"1967 में करैता गाँव में आजादी के बाद जमीदारी प्रथा में उन्मूलन के बाद स्थिति सुधरना है।

" गली आगे मुड़ती है " 1974 में छात्र आंदोलन, विश्वविद्यालय के प्रध्यापको की राजनीति दिखाई है।

"नीला चाँद" 1988 1060ई. की काशी को उसके पूरे सांस्कृतिक सन्दर्भ में मूर्त किया है।

"शैलूष" 1989 में कबीलाई जीवन व्यतीत करने वाले नटों के जीवन संघर्ष को उभारा गया है। लेखक ने इन नटों की उतपत्ति कबीले से न मानकर इन्हें चंद्रगुप्त के वंशज द्वारा शक-कुषाण कबीलों को पराजित किया था तब वह अपनी रक्षा के लिए विंध्याचल की घाटियों में छिप गए थे और यही से इन कबीलाई समाज का विकास हुआ।

"कुहरे में युद्ध" 1992 "दिल्ली दूर है" 1993 एक ही उपन्यास के 2 खंड है जिसमें दिल्ली पर किये गए खिलजी वंश और गुलाम वंश का वर्णन है जो भारत के लिए सबसे यन्त्रणा का समय था।

" वैश्वानर" 1996 में भारतीय संस्कृति के धन और ऋण दोनों ही पक्षो को दिखाया है। लेखक ने यह प्रतिपादित किया है कि आर्यों और अनार्यों दोनों की सहायता से यह संस्कृति बनी और विकसित हुई है।

 

7. फणीश्वरनाथ रेणु :-

 हिंदी साहित्य के पाठक रेणु जी से भली-भांति परिचित होंगे। उनके बार में यहाँ किसी भी प्रकार की औपचारिक जानकारी देना उचित नहीं। केवल इतना भर कहा जा सकता है कि रेणु जी अपने अंचल विशेष की प्रवृत्ति के लिए हिंदी साहित्य में स्मरणीय हैं।

"मैला आँचल" 1954 में बिहार के पूर्णिया जिले के मेरीगंज को कथा बनाकर लिखा है। इसमें पूरा अंचल ही नायक है। यह लेखक की ख्याति का आधार स्तम्भ होने के साथ-साथ उन्हें सदैव स्मरण रखने वाली कृति भी साबित हो चुकी है। हिंदी साहित्य जगत इस अनुपम निधि के लिए लेखक की हमेशा एहसान मंद रहेगी।

"परती परिकथा " 1957 में पूर्णिया जिले के ही परानपुर गाँव की कथा को केंद्र बनाया है। आजादी के बाद के टूटते बनते बिखरते सामंती व्यवस्था और उनमें उभरते नए जनवादी मूल्यों को दिखाया है।

"दीर्घतपा" 1963 में शहरों के सफेदपोशों द्वारा रुपया कमाने के तरीकों का पर्दाफाश किया है।

" जुलूस" 1965 में बंगाल से आये शरणार्थियों की समस्या है।

" कितने चौराहों" 1966 में आजादी के लिए आत्मोत्सर्ग करने वाले युवकों के संघर्ष का चित्रण।

" पलटू बाबू रोड़" 1979 कांग्रेस सरकार में फैलते भ्र्ष्टाचार का चित्रण।


8. रामदरश मिश्र :- हिंदी साहित्य की औपन्यासिक लेखन परम्परा में इनकी भी गिनती अंचल विशेष की रचनाकारों में करी जाती है।

" पानी के प्राचीर" 1961 गोरखपुर के पांडे पुरवा को केंद्र में रखकर गाँव की दारुन अवस्था दिखाई है।

" सूखता हुआ तलाब" 1972 गाँव के सूखते हुए जीवन चित्रण को बयां करता है। 

" दूसरा घर" 1986 मे भिखमंगे का बेटा कमलेश एम.ए करने के बाद भी गुजरात के महानगर में यूँही घूमता रहता है और अपने गांव को याद करता हुआ बेचैन होता है।  

                                                 

9. केशवचन्द्र मिश्र :-

"कोहबर की शर्त" 1965 बलिया जिले के 2 गाँवों "बलिहार और चौबेपुर" को केंद्र में रखकर लिखा है।


10. श्रीलाल शुक्ल :-

हिंदी साहित्य ने इसे कई रचनाकार दिए हैं जिन्हें जबतक हिंदी साहित्य रहेगा तबतक उन्हें भुलाया नहीं जा सकेगा, ऐसी मेरी समझ है। उन्हीं में से एक "श्रीलाल शुक्ल" जी हैं जो अपनी व्यंग्य धर्मिता के लिए जाने जाते हैं। वह अपनी एक ऐसी रचना के लिए प्रसिद्ध है जिसमें अंचल विशेष की नामकानियों, समस्याओं, कुरूपताओं आदि की बग्घियां उधेड़ कर रख दी हैं। उनका प्रसिद्ध उपन्यास "राग दरबारी" है।

"राग दरबारी" 1968 में यह शिवपालगंज गाँव की कथा है जो भारत के किसी गाँव की हो सकती है। भले ही मुख्य समस्या शिवपालगंज कॉलेज की है पर व्यापक रूप में समस्त अमानवीयता, अवसरवाद, छल प्रपंच आदि को दिखाता है। इसे 1969 साहित्य अकादमी से भी पुरूस्कृत किया जा चुका है।

 

" सीमाएं टूटती है" 1973 में परिवार के टूटने बिखरते सम्बन्धो को दिखाया है।

"पहला पड़ाव" 1987 गांवों में आकर शहरों में मकान बनाने वाले मजदूरों की जिंदगी का यथार्थ चित्रण किया है। बड़े-बड़े ठेकेदार और इंजीनियर उनका हर तरह से शोषण करते हैं।

" विश्रामपुर का सन्त" 1998 में राज्यपाल कुँवर सिंह को केंद्र में रखकर लिखा गया है।कांग्रेस की शासन व्यवस्था को दिखाया है।

                                                  

11.हिमांशु जोशी :-

 " कगार की आग"1976 अल्मोड़ा के लघौन गांव की दयनीय स्थिति का चित्रण।सारी सरकारी योजनाओं के बाद भी पहाड़ियों के जीवन मे कोई सुधार नहीं आया है।

                                                    

● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018

7. राजभाषा हिंदी वेबसाइट -' उपन्यास की परिभाषा' मनोज कुमार।

8. हिंदी उपन्यास विकिपीडिया।

9. हिंदी का गद्य साहित्य , रामचंद्र तिवारी, 12वां संस्करण, 2018, काशी


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