कोहिमा, भारत के उत्तर पूर्वी राज्य नागालैंड की राजधानी है।[1]
बिना परमिट कोहिमा - यात्रा प्रसंग 2
डीमापुर में एक टैक्सी स्टैंड है जहाँ से कोहिमा के लिए साझी टैक्सी चलती है। मैं जैन साहब को सोता छोड़कर सुबह-सुबह टैक्सी स्टैंड आया और लाइन में लग गया। हर टैक्सी में चार- चार लोगों को बिठाया जा रहा था। जब मेरा नंबर आया तो तीन नागा लोगों के साथ मैं भी टैक्सी में बैठ गया। टैक्सी ड्राइवर ने कुछ नहीं पूछा और न मैंने उसे कुछ बताया। टैक्सी चल दी। कुछ देर के बाद लगा की पहाड़ शुरू होने वाले हैं। सड़क ऊपर की तरफ जाती हुई दिखाई दे रही थी तभी सामने लगा बैरियर और चेक पोस्ट दिखाई दी। यहाँ भारत सरकार के अर्ध सैनिक बल चेकिंग कर रहे थे। मैंने सोचा अगर वे सबके आईकार्ड देखेंगे तो मैं भी अपना आई कार्ड दिखा दूँगा और अगर उन्होंने मुझसे परमिट के बारे में कुछ पूछा तो यही कहूँगा कि ऑफिस बंद थे इसलिए परमिट नहीं ले सका। लेकिन इस सब की नौबत ही नहीं आई । सीआरपीएफ के जवान ने टैक्सी के अंदर झांक कर देखा । मैं दो नागा लोगों के बीच बैठा था। मुझे भी वह नागा समझा और टैक्सी ड्राइवर को आगे बढ़ जाने का इशारा कर दिया।
कोहिमा आते-आते तीनों सवारियों उतर गयीं मैं बैठा रह गया। ड्राइवर ने मुझसे पूछा कि आप कहाँ जाओगे?
बोलचाल से ड्राइवर हिंदी भाषी लग रहा था।
मैंने उससे कहा कि मैं दिल्ली से घूमने आया हूँ। मेरे पास परमिट नहीं है। क्या आप मुझे कोहिमा में कुछ घुमा सकते हो? यहाँ सेकंड वर्ल्ड वॉर के दौरान कोहिमा में खेत रहे सैनिकों का एक मेमोरियल है। क्या आप जानते हैं? क्या आप मुझे वहाँ ले जा सकते हैं?
ड्राईवर ने कहा, हाँ मैं जानता हूँ।
कोहिमा में हिंदुस्तानी और जापानी सेना के बीच लड़ी गई लड़ाई को दूसरे विश्व युद्ध के बहुत महत्वपूर्ण युद्धों में माना जाता है। कुछ इतिहासकर तो इसकी तुलना लेनिनग्राद में लड़ी गई लड़ाई से भी करते हैं और इसे पूर्व का लेनिनग्राद कहते हैं। यहाँ एक-एक इंच जमीन के लिए बहुत ख़ूनी लड़ाई लड़ी गई थी। दोनों सेनाएं एक दूसरे से इतना निकट थीं कि लगभग मल्लयुद्ध जैसी स्थिति पैदा हो गई थी। यही वजह है कि इस लड़ाई के दो वीरों को ब्रिटेन का सबसे बड़ा सम्मान, विक्टोरिया क्रॉस दिया गया था। लगभग डेढ़ हजार सैनिकों की इस यादगार सेमेट्री को कॉमनवेल्थ संचालित करती है।
एक कहावत है की 'युद्ध और प्रेम में सब जायज़ है' और जहाँ सब जायज़ होता है वहाँ कहानियाँ बनती हैं। कोहिमा के युद्ध से संबंधित अनेक कहानियाँ हैं। एक कहानी उल्लेखनीय -
है जो सत्ता के अंदरूनी संघर्ष और उसके वीभत्स स्वरूप को सामने लाती है।
इस कहानी के दो प्रमुख पात्र हैं । पहले हैं पंद्रहवीं जापानी सेना के कमांडर, लेफ्टिनेंट जनरल "रेन्या मुतागुची" और दूसरे हैं जापानी सेना के 31वें डिवीजन के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल "कोटोकू सातो"। दोनों जापान की विस्तारवादी नीति के समर्थक थे लेकिन फिर भी उनके बीच काफी मतभेद थे। इन मतभेदों के चलते उनकी शत्रुता जगजाहिर थी। उनमें एक दूसरे को नीचा दिखाने की भावना थी।
भारत पर आक्रमण करने की जापानी योजना का कोड नाम , यू-गो था। इसका उद्देश्य मणिपुर और इम्फाल में ब्रिटिश IV कोर के खिलाफ हमला करके अंग्रेजी सेना को कमजोर करना था। जापानी पंद्रहवीं सेना के कमांडर, लेफ्टिनेंट जनरल रेन्या मुतागुची ने स्वयं भारत पर आक्रमण करने की योजना का प्रारूप तैयार किया था। योजना यह थी की 31वां डिवीज़न बर्मा की "चिंदविन" नदी को पार करके लगभग 60 मील चौड़े जंगल की पगडंडियों से उत्तर-पश्चिम की ओर से कोहिमा पहुंचकर हमला करेगा । अच्छा रास्ता न होने और परिवहन की कमी के कारण, आर्टिलरी रेजिमेंट की आधी तोपें और भारी हथियार पीछे छोड़ दिए जाएँगे। केवल तीन सप्ताह का भोजन और गोला-बारूद साथ जाएगा।
लेफ्टिनेंट जनरल रेन्या मुतागुची कि इस योजना को जापानी सेना के कुछ बहुत बड़े अधिकारी अव्यवहारिक मानते थे। लेकिन आखिरकार जापान के युद्ध मंत्रालय ने इस प्रस्ताव को स्वीकृति दे दी थी।
31वें डिवीजन के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल कोटोकू सातो, जिन्हें कोहिमा पर हमला करना था, इस योजना से असहमत थे क्योंकि योजना बनाते समय उन्हें विश्वास में नहीं लिया गया था। इसका कारण साफ था। वे और लेफ्टिनेंट जनरल रेन्या मुतागुची एक दूसरे के विरोधी थे। लेकिन आदेश का पालन करना उनके लिए आवश्यकताथा। उन्होंने अपने डिवीजन के अधिकारियों और जवानों को बता दिया था कि इस अव्यवहारिक अभियान में भूखे मरने तक की नौबत आ सकती है।
कहा जाता है सेना अपने पेट पर चलती है। मतलब सेना का अगर पेट खाली है तो सेना की गति खत्म हो जाती है। वैसे तो हम सभी पेट पर चलते हैं पर युद्ध करने वाली सेना के लिए भोजन का वही महत्त्व है जो हथियारों और गोल बारूद का है। 31वें डिवीजन के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल कोटोकू सातो की सेना प्रारंभिक उपलब्धियों के बाद भूख के सामने पस्त होने के कगार पर पहुँच गई। उन्होंने जनरल मुतागुची और मुख्यालय से मदद मांगी लेकिन उन्हें मदद देने के बजाय कई भ्रमित करने वाले और विरोधाभासी आदेश दिए गए।
भूख और बीमारियों के कारण सातों के सिपाहियों की स्थिति इतनी खराब हो गई कि वे आत्महत्याएँ करने लगे। निराशा बढ़ने लगी। यह सब देख कर सातों ने जनरल मुतागुची के आदेश के बावजूद कि अपने स्थान पर बने रहो, अपना स्थान छोड़ दिया। एक डिवीजनल कमांडर के लिए अपने वरिष्ठ के आदेश या अनुमति के बिना पीछे हटना जापानी सेना में शायद कभी न हुआ था।
सातो को कमान से हटा दिया गया। सातों के उच्च अधिकारी और शत्रु पंद्रहवीं सेना के कमांडर, लेफ्टिनेंट जनरल रेन्या मुतागुची ने सातों को अपनी गलती स्वीकार कर स्वयं को मृत्युदंड देने के लिए हराकिरी करने का निमंत्रण दिया। यह जापान में सम्मानजनक तरीके से अपनी ग़लती / भूल स्वीकार करने और अपने आपको स्वयं मृत्यु का दंड देने की प्रतिष्ठित पद्धति रही है। सातों ने ऐसा करने से इंकार कर दिया और कहा कि वे पंद्रहवें सेना मुख्यालय के बारे में अपनी शिकायतों को सार्वजनिक करने के लिए एक कोर्ट मार्शल की मांग करते है। सातों के पास पक्के सबूत थे कि उनके साथ अन्याय किया गया है, भेद भाव ही नहीं बरता गया बल्कि दुश्मनों जैसा व्यवहार किया गया है।
अगर सातों का सार्वजनिक कोर्ट मार्शल होता तो निश्चित रूप से पंद्रहवीं जापानी सेना के कमांडर, लेफ्टिनेंट जनरल रेन्या मुतागुची बुरी तरह फंस जाते। अपने आप को बचाने के लिए
जनरल रेन्या मुतागुची ने दूसरे बड़े जनरलों के साथ मिलकर एक तुरप की चाल चली जिसमें सातों बुरी तरह फंस गए। सेना के डॉक्टरों ने सातों का परीक्षण किया और यह रिपोर्ट दी कि सातों ने अपना मानसिक संतुलन खो दिया है और वे किसी कोर्ट मार्शल में पेश होने लायक नहीं है। द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने के बाद भी जापान में सातों के साथ न्याय नहीं हो पाया। वे अंत तक कहते रहे कि उन्होंने अपनी और सिपाहियों की जान बचाने के लिए एक षड्यंत्र से निकलने की कोशिश की थी।
हरी घास के मैदान में दूर तक फैले सफेद रंग के चिन्हों पर सैनिकों के नाम और उनके नंबर लिखे हुए थे। बहुत व्यवस्थित ढंग से बनाया गया यह स्मारक सेना के अनुशासन की कहानी भी कह रहा था। कोहिमा वार सेमेट्री युद्ध के मैदान गैरीसन हिल में स्थित है। यहाँ द्वितीय विश्व युद्ध के 1,420 सैनिक और एक ग़ैर सैनिक दफन हैं। सेमेट्री में सबसे ऊंचे स्थान पर 917 हिंदू और सिख सैनिकों की याद में कोहिमा श्मशान स्मारक है। सेमेट्री के प्रवेश द्वार पर एक शिलालेख है - "जब तुम घर जाओ तो उन्हें हमारे बारे में बताना और कहना, तुम्हारे कल के लिए, हमने अपना आज दे दिया।"
अचानक ख्याल आया इस लड़ाई में तो आजाद हिंद सेना के जवान भी शहीद हुए थे उनका कोई स्मारक यहाँ क्यों नहीं है?
कोहिमा संग्रहालय एक बहुत रोचक जगह लगी। यहाँ नागालैंड की तमाम जनजातियों के घरों के नमूने बिल्कुल वास्तविक रूप में बनाए गए हैं। यह काफी दिलचस्प लगता है कि एक ही प्रदेश में घरों के डिजाइन एक दूसरे से कितने अलग हो सकते हैं। पता नहीं इस अलगाव का कारण क्या है। मैं काफी देर तक संग्रहालय में घूमता रहा। यहाँ मेरे अलावा और कोई नहीं था कुछ मकान और उनका उनकी सजावट बहुत आदिम किस्म की थी।
संग्रहालय देखकर मैं कोहिमा की मुख्य बाजार में मैं आ गया। परमिट न होने की वजह से मैं किसी होटल या रेस्टोरेंट में जाना भी टाल रहा था। मुझे लगता था कोई भी मुझसे परमिट तलब कर सकता है। बस बाजार का एक चक्कर लगा लिया है। अपना मनपसंद काम, यानी लोगों को देखना, शुरू किया। दुकानों के बोर्ड पढ़ें। अंग्रेजी भाषा और ईसाई संस्कृति का प्रभाव भी नजर आया। शाम होते होते मैं वापस डीमापुर आ गया।
होटल के कमरे में जैन साहब मौजूद थे। मुझे देखकर बहुत खुश हुए कहने लगे, तो तुम आ गए। उनका मतलब था कि बच कर आ गए ।
मैंने उनसे कहा - मैं बताऊं आज तुमने क्या किया होगा।
कहने लगे - बताओ ।
मैंने कहा - तुम मारवाड़ी शाकाहारी भोजनालय गए होगे और तुमने जमकर खाया होगा। जैन साहब कहने लगे - यार, ये तुम्हें कैसे पता लगा कि मैं मारवाड़ी भोजनालय गया था।
'असग़र वजाहत' की दीवार से
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