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Sunday, July 4, 2021

उपन्यास भाग -6

            

                            (उपन्यास)


हिंदी साहित्य लोचन

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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "आधुनिक काल" के नाम से जाना जाता है। आज हम हिंदी गद्य विधा में उपन्यास, उपन्यासकारों व तथ्यों' पर विशेष रूप से ध्यान देंगे । आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी। 

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 "हिंदी साहित्य लोचन" पर आप हिंदी के उपन्यास, उनके रचनाकारों व तथ्यों के बारे में व उनकी रचनाओं की विशिष्टताओं पर जानकारी ग्रहण कर सकते हैं। 

 

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उपरोक्त लिंक्स पर जाकर हिंदीसाहित्य के प्रसिद्ध उपन्यासों के चित्रों को देख सकते हैं।


1. विवेकीराय:-

"सोनमाटी" 1984 में गाजीपुर और बलिया के बीच 'करैल' क्षेत्र दिखाया गया है जहाँ लोंगो का मुख्य काम पैसा कमाना है।इसमें लेखक का आशावादी स्वर दिखा है।

"समर शेष है" 1988 में लेखक का आजादी मिलने के बाद भी उसकी अपूर्णतः पर आधारित है। जहाँ आज भी कई ऐसीे समस्याएं हैं, परिस्थितियाँ है जिस पर कार्य नहीं किया है। देश को आजादी तो मिल गयी परंतु विकास की आजादी अभी बाकी है। लेखक भूमिका में कहते हैं" रामराज्य अंततः देष को नहीं मिला अब तो उसकी चर्चा भी नहीं होती है xxx गाँव में सड़क का नारा खोखला पड़ा है"..। 

लेखक ने जयंती (जनता), सुराज और रामराज को प्रतीक में इस्तेमाल किया है। सुराज को जनता तक न पहुँचाने में ही यहाँ सड़क का इस्तेमाल किया है।

" नमामि ग्रामम" 1997 में गाँव खुद अपनी कथा कहता है। गाँव की दूरदशा का वर्णन है जिसमें उसे ऐसे भूखे मगरमच्छों के हाथ मे दे दिया है जो विकास का सारा पैसा हजम कर जाते हैं। विकास के अभाव को दर्शाता है यह उपन्यास खोखली व्यवस्था को दर्शाता है।

                                                      

2. शैलेश मटियानी :-

"बोरीवली से बोरीबंदर तक" 1959 में बम्बई की भागदौड़ में व्यस्त यांत्रिक जीवन को दिखाया है।

"कबूतरखाना" 1959 बम्बई के भूलेश्वर मुहल्ले की गगनचुंबी इमारतों के कबूतर खाने जैसे फ्लैटों में रहने वाले मध्यवर्गीय लोगों के घुटते जीवन को दिखाया है।

"किस्सा नर्मदाबेन गंगूबाई" 1960 में बम्बई की सेठानियों के यौन चित्रण का उल्लेख है।


3. श्याम परमार :-

"मोरझाल" 1963 मालवा के आदिवासी भीलों का चित्रण है


4.शानी :-

"कालाजल" 1965 में बस्तर के 2 मुस्लिम परिवारों की 3 पीढ़ियों की कहानी दिखाते हैं। परिवार की सम्पन्नता और विपन्नता दिखाई है।

                                                            

5.भगवानदास मोरवाल :-

" काला पहाड़" हरियाणा के मेवात राज्य के गांव "नगीना" को केंद्र में रख कर बताया कि उत्तरप्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के सीमांत पर काले पहाड़ की छाया में बसा है जहाँ सभी मेवाती हैं कोई हिन्दू-मुस्लिम नही"। मेवातियों की शुरुआत 1527 के युद्ध से शुरू होकर विभाजन के बाद तक यहाँ हिन्दू और मुस्लिम दोनों साथ रहते थे पर वर्तमान काल में राजनीतिक दलों के कारण इनके बीच दीवार खड़ी कर दी गयी है।

"बाबुल तेरे देश में" 2004 मुस्लिम परिवार के पितृसत्तात्मक समाज में पिसती स्त्रियों की कथा है।

"रेत" 2008 में हरियाणा और राजस्थान सीमांत के पास बसने वाली कंजर जाति के इतिहास, रीति रिवाज, उनके जीवन को दिखाया है। कंजर जाति का मुख्य धंधा अवैध शराब बेचना और वैश्यावृत्ति करना है। कंजर का अर्थ काननचर या जंगल मे घूमने वाला।यह जाति अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है।

"नरक मसीहा" 2014 में NGO संस्कृति की पड़ताल में यह पहला ऐसा उपन्यास है।

लेखक ने हरियाणा सीमांत पर उपन्यास लिखे हैं।

 

6. नरेश मेहता :-

इनकी जीवन दृष्टि मानवतावादी है। नारी उत्पीड़न की समस्या तो लगभग उनके सभी उपन्यासों में दिखाई देती है। 

" डूबते मस्तूल" 1954 में रंजना के माध्यम से मध्यवर्गीय स्त्री की समस्या को दिखाया है। उसके जीवन मे कई मर्द आते हैं लकीन कोई भी उसकी आत्मा की सुंदरता को न देखकर उसके शारिरिक सुंदरता को ही देखता है।

"धूमकेतु: एक श्रुति" 1962 मातृहीन बालक के "उदयन" के मानसिक विकास का मनोवैज्ञानिक विवेचन किया है। 

"यह पथ बंधु था" 1962 श्रीधर और सरो की कथा दिखाई है। इसी का दूसरा भाग "नदी यशस्वी है" 1967 है जिसमें उदयन किशोरावस्था में है।

"उत्तरकथा" 2 भाग 1979,82 मालवा के ब्राह्मण परिवार को केंद्र में रखकर 20वी शती के प्रथमार्थ में लिखी है  जिसमें दुर्गा, वसुंधरा और गायत्री के नारी उत्पीड़न की कथा भी दिखाई है। इसमें मुख्य पात्र "शिवशंकर" हैं।

                                                      

7.कृष्णशर्मा भीखू :-

" मौत की सराय" 1970 में फ़्रांस की 18 शती की राज्यक्रांति का चित्रण किया है।

                                             

8.मोहन राकेश :-

"अंधेरे बन्द कमरे" 1961 दिल्ली के अभिजात्यवर्ग नीलिमा और हरवंश के दाम्पत्य जीवन को चित्रित और उसकी विसंगतियों को भी करता है।

"ना आने वाला कल" 1968 में एक पहाड़ी प्रदेश के मिशनरी प्रिंसिपल के रिजाइन करने से स्कूल के वातावरण, गंदी राजनीति आदि का वर्णन है।

" अंतराल" 1972 में स्त्री-पुरुष की जटिलताओं को दिखाया है।

                                                   

9.धर्मवीर भारती:-

"गुनाहों का देवता" 1949 में नीरज और सुधा की भावुकता से भरी कथा है।

"सूरज का सातवाँ घोड़ा" 1952 में कथा के भीतर कथा का पंचतंत्रीय ढंग से नया प्रयोग हुआ है। जिस का उपन्यास के परिवेश से मेल खाती है।


10.कृष्ण बलदेव वैध :-

"नर नारी" 1996 शहरी अभिजात्य परिवारों की कथा है जहाँ मुख्यतः सेक्स समस्या है।

                                               

11.सर्वेश्वर दयाल सक्सेना :-

" सोया हुआ जल" 1954 सिनेरियो शिल्प में लिखा है । एक प्रतीकात्मक उपन्यास है।

" पागल कुत्ते का मसीहा" 1977 में पागल कुत्ते सन्दर्भहीन व रूढिप्रियता जीवन मूल्यों के प्रतीक हैं।


12.राजेंद्र यादव:-

" शह और मात" 1959 में उदय और सुजाता की प्रेम कहानी डायरी शैली में कही है।

" एक इंच मुस्कान" 1963 अमर और रंजना के प्रेम प्रसंग में बीच मे अमला के आ जाने से पैदा होने वाली समस्याओं को दिखाया गया है। 


12.निर्मल वर्मा:-

" वे दिन" 1964 दिव्तीय विश्वयुद्ध के बाद योरोप  की अभिशप्त पीढ़ी का वर्णन।

"रात का रिपोर्टर" 1989 "रात का अंधेरा"में आपातकाल के प्रतीक है। रिषि रिपोर्टर के बहाने पूरे समाज की यातना कथा दिखाई है।

                                                  

● सहायक ग्रन्थ :- 

1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।

2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण। 

3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।

5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018

6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018

7. राजभाषा हिंदी वेबसाइट -' उपन्यास की परिभाषा' मनोज कुमार।

8. हिंदी उपन्यास विकिपीडिया।

9. हिंदी का गद्य साहित्य , रामचंद्र तिवारी, 12वां संस्करण, 2018, काशी


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