(उपन्यास)
हिंदी साहित्य लोचन
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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "आधुनिक काल" के नाम से जाना जाता है। आज हम हिंदी गद्य विधा में उपन्यास, उपन्यासकारों व तथ्यों' पर विशेष रूप से ध्यान देंगे । आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी।
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"हिंदी साहित्य लोचन" पर आप हिंदी के उपन्यास, उनके रचनाकारों व तथ्यों के बारे में व उनकी रचनाओं की विशिष्टताओं पर जानकारी ग्रहण कर सकते हैं।
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उपरोक्त लिंक्स पर जाकर हिंदीसाहित्य के प्रसिद्ध उपन्यासों के चित्रों को देख सकते हैं।
1. कमलेश्वर :-
हिंदी साहित्य की आधुनिक काल की कथा साहित्य में कमलेश्वर का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। इनकी प्रसिद्ध कहानी 'दिल्ली में एक मौत' है जिसमें मध्यवर्ग की लुप्त होती सम्वेदना और उसपर चढ़े झूठे भावनात्मक आवरण का पर्दा उठाने की कोशिश की है। इस कहानी को एक पँक्ति में 'मगरमच्छ के आँसू' से भी जोड़कर देख सकते हैं परंतु हमें ध्यान देना होगा कि मगरमच्छ के आंसू जब आते हैं तो वह भूखा होता है लेकिन इस कथा में आंसू निकलने का अर्थ झूठी सम्वेदना व्यक्त करने से जोड़ा गया है।
इनके प्रसिद्ध उपन्यासों में सबसे ज्यादा चर्चित "कितने पाकिस्तान" रहा है जिसमें विभाजन के दंश को दिखाया गया है। यहाँ पाकिस्तान किसी एक समय को लेकर नहीं है। वह प्रत्येक समय का प्रतिनिधित्व कर रहा है जब-जब लोगों ने अपने को धर्म आधारित बाँटा है।
"एक सड़क सतावन गलियां" 1957 में आधुनिक परिवेश में कस्बे की जिंदगी दिखाई है।
" समुन्द्र में खोया आदमी" 1967 में आर्थिक दबाव के कारण परिवार के बीच कथानायक "श्यामलाल" अकेला-सा पड़ जाता है और लगता है जैसे वह समुन्द्र में खो गया हो।
" काली आँधी" 1974 में राजनीति के क्षेत्र में पहुंचने वाली आधुनिक नारी की परिस्थिति।
" तीसरा आदमी" 1976 में पति-पत्नी के बीच आर्थिक दबाव को लेकर तीसरे आदमी के आने की समस्या को लेकर लिखा है।
"सुबह दोपहर शाम" 1982 में आजादी पूर्व भारतीय गाँव के कस्बाई संघर्ष की कथा दिखाई है।
" कितने पाकिस्तान" 2000 में उपन्याकार ने यह दिखाया है कि लम्बे समय से इंसान ही घृणा और द्वेष के कारण लोंगो को बांटता आया और न जाने कितने पाकिस्तान बन चुके हैं और अभी बनने बाकी हैं। इसी की परिणाती है कि विभाजन के कारण यह एक और पाकिस्तान बन गया ।
उपन्यास के अंत में अदीब कहता है" अदीब-ए-आला वक्त न हिन्दू है न मुसलमान.. इतिहास गवाह है कि रजवाड़ो और सल्तनतों के लोग हिन्दू या मुसलमान तो थे पर इनके स्वार्थ के कारण में वह भी बन गए"..।
2. मनोहर श्याम जोशी :-
" कुरु-कुरु स्वाहा" 1980 में बम्बई के पतनशील समाज का चित्रण जहाँ कॉलगर्ल और फिल्मजगत के माध्यम से इंदिरायुग के खोखले पन को दिखाया है।
" कसप" 1982 में गंगोली हाट के निम्नमध्यवर्गीय के जीवन की कथा। उपन्यास के केंद्र में कुमाऊनी मध्यवर्ग है।
"क्याप" 2006 में लेखक ने उत्तर आधुनिक शैली में कुर्मांचल के कस्तूरी कोट की कहानी कही है
3. गिरिराज किशोर :-
" चिड़ियाघर" 1968 में रोजगार के दफ्तर के काले कारनामों का पर्दाफाश किया है।
"जुगलबंदी" 1973 में अंग्रेजी साम्राज्य के साथ बहती हुई सामन्तशाही और कॉंग्रेस के रूप में नए सत्ताधीशों का पर्दाफाश किया है।
"तीसरी सत्ता" 1982 में पति पत्नी के बीच आने वाला तीसरा व्यक्ति के आने से उत्तपन्न तनाव की कहानी है।
"परिशिष्ट" 1984 IIT जैसे तकनीकी शिक्षा संस्थाओं में हरिजन विरोधी वातावरण का दर्दनाक चित्र प्रस्तुत किया गया है। अभिजात वर्ग के छात्रों द्वारा उत्पीड़ित हरिजन छात्रों को आत्महत्या के लिए विवश होना पड़ता है।
" ढाईघर" 1991 में समाज, मनुष्य और बदलते रिश्तों की सच्चाई दिखाई है।
"यातनाघर" 1997 में नेहरू को अमेरिका राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी द्वारा यादगार के रूप में दिये गए एक उच्चतम तकनीकी शिक्षा संस्थान की अंदरूनी गुटबाजी, उठा पटक, जोड़ तोड़ और कुत्सित राजनीति की कहानी है।
"पहला गिरमिटिया" 1999 में गाँधी जी द्वारा दक्षिण अफ्रीका के भारत से गए हुए मजदूरों के साथ हो रहे शोषण के खिलाफ खड़े होने और उनका उद्धार करने से सम्बंधित है।
4. दूधनाथ सिंह :-
"आखिरी कलाम" 2003 में बाबरी मस्जिद के ध्वंस को आधार बनाकर लिखा गया है।
5. रमेशचंद्र शाह :-
" गोबरगणेश" 1978 में विनायक की परिस्थितियों का विश्लेषण। प्रतिभा सम्पन्न होने के बावजूद गरीब होने से डर-डर भटकता रहता है।
"किस्सा गुलाम" 1986 में शुद्र जाति में उत्तपन्न एक युवक कुंदन की कहानी है जो समाज के सड़े गले मूल्यों पर थूकता है।
6. विनोदकुमार शुक्ल :-
"नौकर की कमीज" 1979 में कुल घटना घर से दफ्तर और दफ्तर से घर आने तक सीमित है जिसमें निम्नमध्यवर्ग की तनावग्रस्त कथा दिखाई है।
" दीवार में एक खिड़की रहती थी" 1997 में मनुष्य के खुले प्रकृति के मुक्तसौन्दर्य से हटकर दीवार के घर मे सिमटते जा रहे हैं।
7. गोविंद मिश्र :-
"लाल पीली जमीन" 1976 में बुंदेलखंडी उपनगर के युवा छात्रों की भटकी हुई जिंदगी की कथा है। यह भटकाव गुंडागर्दी और सेक्स को लेकर दिखाया है।
"पाँच आँगनों वाला घर" 1995 में आधुनिकता के दबाव से भारतीय संयुक्त परिवार के टूटने और संवेदनशील के छीजने का अहसास कराने वाला उपन्यास है।
● सहायक ग्रन्थ :-
1. हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, 2018 संस्करण।
2. हिंदी साहित्य का इतिहास , विजेंद्र स्नातक, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1996 प्रथम संस्करण।
3. हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।
4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, 2018 , 25वां संस्करण।
5. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरियंटल प्रकाशन, संस्करण 2018
6. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 10वां संस्करण 2018
7. राजभाषा हिंदी वेबसाइट -' उपन्यास की परिभाषा' मनोज कुमार।
8. हिंदी उपन्यास विकिपीडिया।
9. हिंदी का गद्य साहित्य , रामचंद्र तिवारी, 12वां संस्करण, 2018, काशी
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