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Wednesday, July 28, 2021

नामवर सिंह स्मृति


 काशीनाथ सिंह द्वारा नामवर सिंह जी की स्मृति में ...


भैया को याद करते हुए-----


'डायरी का एक भूला बिसरा पन्ना'

अरविंद कॉलोनी,G-14 क्वार्टर, ड्राइंग रूम, भैया और मैं। बीच में छोटा सा टेबल, उस पर शीशे के दो गिलास। शाम का वक्त। शाम गिलासों में धीरे धीरे ढलती हुई गहराती जारही है---- तारीख थी 9 -9-1994 ।

बातें कहाँ से शुरू हुई थीं और जाने कब कैसे यूपी कॉलेज पहुंच गईं। भैया थोड़ी देर चुप रहे फिर कहना आरम्भ किया- मैं सन 42 में बनारस आया। उदय प्रताप में 7 में नाम लिख गया। 6th Hostel में कमरा no.1 मिला।

तब सागर सिंह (नगर के नामी वकील, अब दिवंगत ) 11th कक्षा में थे, वे कवि थे और गोष्ठियां करते थे, उसमें मैं भी शामिल हो गया। उन्हीं दिनों पहली बार, कॉलेज के पास सरसौली (तब एक कस्बा ) में एक कवि सम्मेलन हुआ जिसमें नगर के सभी महत्वपूर्ण कवियों के साथ ही बाहर से आए कवि भी थे. निराला को पहली बार वहीं देखा।

मैंने भी कविता पढ़ी, सम्मेलन में निराला ने जानकी वल्लभ शास्त्री को 200₹ पुरस्कार में दिए और शंभू नाथ सिंह, ठाकुर प्रसाद सिंह आदि नगर के कवियों के रहते हुए, मुझे 100₹ का द्वितीय पुरस्कार दिया। ये वे दिन थे, जब बनारस में अमृत राय, शिव दान सिंह चौहान, शमशेर, मुक्तिबोध और त्रिलोचन रहते थे। अमृत राय, कम्युनिस्ट पार्टी का अख़बार, हम लोगों में बाँटते थे और महीने के हिसाब से अपनी साइकिल से आ कर, पैसे ले जाते थे। वे स्टडी-सर्कल भी चलाते थे।

उन दिनों, नगर में दो साहित्यिक संस्थाएं थीं। एक ठाकुर प्रसाद सिंह की "नवयुवक साहित्यिक संघ" और दूसरी, सोशलिस्टों की "सांस्कृतिक संघ"। हम लोग, सांस्कृतिक संघ से जुड़े हुए थे जिसका चुनाव हुआ था, जिसमें त्रिलोचन अध्यक्ष चुने गए और नामवर सचिव, उपाध्यक्ष थे मार्कण्डेय सिंह और BHU के डॉक्टर श्री कृष्ण लाल। मैं 1947 में, महेंद्रवी लॉज, BHU में आ गया और 1950 में गोविन्द लॉज में (जो लंका पर स्थित था)। सचिव रहते हुए, बनारस में पहला विराट साहित्यिक आयोजन मैंने 'टाउन हाल' में किया था। इसी में, जय नारायण इंटर कॉलेज (अध्ययन काल) के बाद, पहली बार, बनारस में, सुमित्रा नंदन पंत आए थे।


- काशीनाथ

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