(काव्यशास्त्र)
हिंदी साहित्य लोचन
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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "काव्यशास्त्र" के नाम से जाना जाता है। इसमें काव्यशास्त्र का सामान्य परिचय प्राप्त करेंगे। आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी।
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"हिंदी साहित्य लोचन" पर काव्यशास्त्र व महत्वपूर्ण काव्यशास्त्रीय कथनों पर जानकारी ग्रहण कर सकते हैं।
(भरतमुनि व रस सिद्धान्त)
● रस का अर्थ,परिभाषा व स्वरूप :-
"रस" शब्द को सुनते ही सबसे पहले किसी भी सामान्य व्यक्ति के दिमाग में चित्र बनेगा वह एक तरल पदार्थ होगा। जोकि स्वाद के साथ होगा और ज्यादातर लोग उसे मीठे रूप में देखेंगे। वहीं दूसरी ओर रस शब्द का एक और सामान्य से थोड़ा ऊपर उठकर, कुछ पढ़े-लिखे समाज में इसका अर्थ आनंद से भी जोड़कर देखा जाएगा।
परन्तु जब हम साहित्य विशेष की बात करते हैं तो 'रस' शब्द का अर्थ हम मानव-शरीर में होने वाले या आने वाले, निहित भावों, फिलिंग, इमोशन्स आदि से लेते हैं।
वही रस शब्द शास्त्रीय इतिहास प्राचीन भारतीय शास्त्रों जैसे ऋग्वेद में सोमरस के रूप में मिलता है। उसके बाद ब्राह्मण ग्रँथ में छंद रस और काव्य रस के रूप में हुआ भी।
• रस शब्द "रस" धातु से बना हुआ है जिसका अर्थ है आस्वादन करना। काव्यशात्रीय प्रणाली रूप से काव्यास्वादन करना ही रस का आस्वादन करना है।
• परिभाषा:- जब नट (अभिनेता) रंगमंच पर किसी नाटक की भावपूर्ण, कलात्मक प्रस्तुति करते हैं तो विभाव, अनुभव और व्याभिचारी (संचारी) भावों के संयोग से रस निष्पत्ति होती है"..।
• आचार्य भरतमुनि द्वारा "रस सिद्धान्त" की स्थापना तीसरी शती में करके अपने ग्रँथ "नाट्यशास्त्र" में रस को कविता की आत्मा बताया है। रस सिद्धात की व्यवस्थित व्याख्या करते हुए उसे रस निष्पत्ति के रूप में "विभावनुभावव्यभिचारी संयोगादरसनिष्पत्ति" का सूत्र दिया था।
भरतमुनि के ग्रन्थ "नाट्यशास्त्र" में 36 अधयाय है जिसके 6ठे अध्याय में भरतमुनि बताते हैं 'सहृदय प्रेक्षक स्थायी भावों का ही विविध रसों का आस्वादन करते हैं।'
भरतमुनि के अनुसार 8 स्थायी भाव, 33 संचारी भाव, 8 सात्विक भाव हैं।
● रस के 4 अंग:- स्थायी भाव, विभाव, संचारी भाव और अनुभाव।
निष्कर्ष :-
1.भरतमुनि का रस विषयक चिंतन वस्तुगत व विषयगत है।
2. रस आस्वाद्य है नाकि आस्वाद।
3. रस अनुभूति की प्रक्रिया है नाकि अपने आप में किसी तरह की अनुभूति।
(रस सम्प्रदाय और उनके व्याख्याता)
(आ). भट्टलोलट का उत्तपत्तिवाद/ उपचयवाद/ आरोपवाद/मीमांसा वाद :-
इन्होंने रस की व्याख्या करते हुए अपने मुख्य बिंदुओं को इस प्रकार वर्णित किया है :-
1. किसी कारण विशेष से ही रस की उतपत्ति होती है।
2. इसमें दर्शको द्वारा ही अभिनेताओं को अपने अभिनित रूप में आरोपित करके उसी पात्र (राम आदि) में मान लिया जाता है। जिसे आरोपवाद कहते हैं। अर्थात राम का किरदार निभाने वाले को सही अर्थों में राम समझ लेना और नाटक का आनंद लेना।
3. भट्टलोलट ने रस निष्पत्ति का अर्थ "उतपत्ति" माना है।
4. यह 'मीमांसा दर्शन' से प्रभावित थे।
5. भटलोलट के मत की व्याख्या मम्मट ने की है।
(बा). शंकुक का अनुमितिवाद/अनुकरण/न्याय दर्शन :-
1. इनका मत है कि इसमें दर्शक अभिनेता पर किसी पात्र का आरोप न करके उसे उस पात्र का अनुकर्ता मान लेता है और उसी रूप में भाव को ग्रहण करता है।
2. "चित्र तुरंग ज्ञान" का उपयोग इसी व्याख्या के लिए किया जाता है जिसका अर्थ होता है कि हम जिस रूप में देखते हैं उसी का अनुकरण कर लेते हैं।
3. शंकुक का मत :-
सहयोग का अर्थ -अनुमान, रस निष्पत्ति का अर्थ- अनुमिति।
4. इनका दर्शन 'न्याय दर्शन' से जुड़ा है।
(सा).भटनायक का भुक्तिवाद/साधारणीकरण/सांख्य दर्शन:-
1. इनका दर्शन 'सांख्य दर्शन' पर आधारित है।
2. यह मानते हैं कि न तो रस की उतपत्ति होती है और न ही अनुमिति। उसका साधारणीकरण होता है। अर्थात जब दर्शक अभिनय को देखकर या काव्य पाठन करके उसी रस की अनुभूति उसी रूप में कर लेता है और विशेषपन खत्म होकर सामान्यता की भूमिका में दर्शक और अभिनेता मिल जाये, तब जाकर साधारणीकरण की प्रक्रिया पूरी होती है।
3. साधारणीकरण के होते ही सामाजिक सत्वगुण का उदय और रजो-तमो गुण का नाश हो जाता है।
4. रस की निष्पत्ति का अर्थ "भुक्ति" से है।
● भट्टनायक के अनुसार शब्द के 3 व्यापार हैं:-
1. अभिधा
2. भावक्त्व
3. भोजकत्व
(डा). अभिनवगुप्त का अभिव्यक्तिवाद/शैव दर्शन/वेदांत वादी :-
1. इनके अनुसार न ही रस की उतपत्ति,अनुभूति,और न ही अनुमिति होती है। केवल अभिव्यक्ति होती है, अर्थार्त जैसा सामने अभिनय दिखेगा उसी तरह के रस की अनुभूति होगी। यदि प्रेम सौन्दर्य है तो श्रृंगार रस की उतपत्ति होगी और घृणित दृश्य है तो वीभत्स रस की अभिव्यक्ति होगी।
2. जो अभिनेता के भीतर होगा उसी की अभिव्यक्ति रंगमंच पर बाहर होगी।
3. इनका मत 'शैव मत' पर आधारित है।
4. इनका वेदांतवादी दृष्टिकोण था।
● आधार व सहायक ग्रन्थ :-
1.पाश्चत्य चिंतन धारा - निर्मला जैन, राजकमल प्रकाशन।
2. पाश्चत्य काव्यशास्त्र सिद्धान, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।
3. भारतीय काव्यशास्त्र, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।
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