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Monday, August 9, 2021

काव्यशास्त्र भाग- 4

     

                         (काव्यशास्त्र) 


हिंदी साहित्य लोचन

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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "काव्यशास्त्र" के नाम से जाना जाता है। इसमें काव्यशास्त्र का सामान्य परिचय प्राप्त करेंगे। आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी। 

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 "हिंदी साहित्य लोचन" पर काव्यशास्त्र व महत्वपूर्ण काव्यशास्त्रीय कथनों पर जानकारी ग्रहण कर सकते हैं। 

 


                (भामह व अलंकार सिद्धान्त)


• अलंकार का अर्थ : साहित्यिक दृष्टि से अलंकार शब्द का निर्माण इस तरह से हुआ है - "अलम" शब्द का अर्थ है "भूषण" और उसमें "कृ" धातु उसकी क्रिया को सम्प्रेषित करता है। जिसका अर्थ हुआ भूषित करना या सजाना। अर्थात साहित्यिक दृष्टि से कविता को सजाना। 

उदाहरण के रूप में जैसे एक नायिका या नायक अपने को सुंदर बनाने के लिए तरह-तरह के उपकरण व अन्य सौंदर्य पदार्थ इस्तेमाल करता है ठीक उसी प्रकार से कविता को सौन्दर्यमयी व जादुई बनाने के लिए उसे अलंकारों से सुसज्जित किया जाता है। इससे कविता में एक नई रवानगी पैदा होती है और पाठक वर्ग के अन्तःस्थल को प्रभावित करती है। इसलिए बड़े-बड़े विद्वानों ने काव्य में अलंकार की उपयोगिता को आवश्यक माना है। जिसे कुछ आचार्यों में काव्य की आत्मा तक घोषित कर दिया है। इनमें प्रमुख हैं - "भामह".....।


●  अलंकार की परिभाषा :- 

1. "दण्डी" के अनुसार :- काव्य-सौंदर्य करने वाले सृजनात्मक गुणों का धर्मो को ही अलंकार कहा जाता है।

2. "रुद्रट" के अनुसार अभिव्यक्ति के विशिष्ट प्रकारों को ही अलंकार कहते हैं।


● अलंकार सम्बन्धी विभिन्न विद्वानों के मत :-

• भामह ने अपने ग्रँथ "काव्यालंकार " में "वक्रता" को वह तत्व दिया है जिसके द्वारा अर्थ सौंदर्य और शब्द सौंदर्य अभिन्न होकर काव्यालंकार की सृष्टि करते हैं। इन्होंने ही सबसे पहले अलंकार को रस से अलग करके अलग सम्प्रदाय बनाया और काव्य की आत्मा से उसकी तुलना की । उसे काव्यशास्त्र के अंतर्गत प्रमुख महत्व दिया।

भामह ने अपने अलंकार सिद्धान्त की स्थापना 6ठी शती में करके इसे काव्य की आत्मा माना है और वक्रोक्ति को अलंकार का मूलाधार माना है।

दंडी ने भी अलंकार को ही काव्य का मूल तत्व माना है।

• काव्य की परिभाषा देते हुए भामह ने " शब्दार्थों सहितौ काव्यम" कहा अर्थात शब्द और अर्थ का समन्वय।

• रुद्रट ने अपने ग्रँथ "काव्यालंकार" में अलंकारों का सबसे पहले 'वैज्ञानिक ढंग से विवेचन' किया है।

• मम्मट काव्य सौंदर्य के लिए अलंकार को 'अनिवार्य नहीं' मानते। 

• आचार्य विश्वनाथ ने मम्मट के मत का खंडन करते हुए "उत्तम काव्य में भी दोष गिनाए हैं। उनका मत है कि सर्वथा निर्दोष रहित काव्य दुर्लभ है"..।

भामह से लेकर रुद्रट तक के काल को अलंकार सम्प्रदाय का 'स्वर्णयुग' कहा जाता है।


●भामह ने अपने ग्रन्थ "काव्यालंकार" में 6 परिच्छेद बताए हैं जिसके 2-3 परिच्छेद में अलंकार निरूपण किया है।

● अलंकार काव्य की सुंदरता है तो अलंकार्य उस सुंदरता को दिखाने वाले तत्व या स्रोत।


● अलंकार के भेद :-

1. शब्दालंकार - अनुप्रास, यमक, श्लेष, वक्रोक्ति, पुनुरुक्ति।

2. अर्थालंकार- उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, विभावना आदि


●अलंकारों की संख्या विद्वानों के अनुसार :-

भरतमुनि - 4  उपमा, रूपक, यमक, अनुप्रास 

मम्मट -   67/61

रुय्यक -  78/75

विश्वनाथ -  78

जयदेव -  100

अपयदीक्षित -124/125


● आधार व सहायक ग्रन्थ :-

1.पाश्चत्य चिंतन धारा - निर्मला जैन, राजकमल प्रकाशन।

2. पाश्चत्य काव्यशास्त्र सिद्धान, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।

3. भारतीय काव्यशास्त्र, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।


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