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Tuesday, August 24, 2021

काव्यशास्त्र भाग - 7

           

                          (काव्यशास्त्र) 


हिंदी साहित्य लोचन

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● "हिंदी साहित्य लोचन" पर आज आप हिंदी साहित्येतिहास परम्परा के एक भाग जिसे "काव्यशास्त्र" के नाम से जाना जाता है। इसमें काव्यशास्त्र का सामान्य परिचय प्राप्त करेंगे। आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी परीक्षोपयोगी सिद्ध होगी, साथ ही आपके हिंदी साहित्य के ज्ञान में कुछ वृद्धि कराने हेतु भी योगदान देगी। 

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 "हिंदी साहित्य लोचन" पर काव्यशास्त्र व महत्वपूर्ण काव्यशास्त्रीय कथनों पर जानकारी ग्रहण कर सकते हैं। 

 

 

                          (पाश्चात्य काव्यशास्त्र)

● (एक भूमिका):-  पाश्चात्य साहित्य में समीक्षाशास्त्र के विकास के संकेत 5वी सदी से दिखने लगते हैं जब हेडियड, सोलन, पिण्डार आदि की रचनाओं में काव्य हेतु और प्रयोजन के चिन्ह दिखने लगे थे। एक सुबद्ध शास्त्र के संकेत "प्लेटो" के "इयोन" से दिखने लगते हैं। प्लेटो की मूल दृष्टि 'प्रत्ययवादी' के साथ अनुभव लोकोत्तर थी। चूंकि कविता बाह्य संसार से ही सामग्री प्राप्त करती है तो "वह अनुकरण का भी अनुकरण करती है"...।


प्लेटो के अनुसार कविता में वैज्ञानिकता और तर्क का अभाव होता है, वह हास्य और छिछोरे भावनाओं को उकसाती है। वही कविता ग्राह्य है जो बेहतर, आदर्श समाज की संरचना कर सकती है। जिसमें कवि गम्भीर भाव से मात्र श्रेष्ठ गुणों का अनुकरण करें। उसे देवताओँ और प्रख्यात मानवों के चरित्र को अपना विषय बनाना चाहिए। कविता को प्लेटो तभी सम्भव मानते हैं जब उस पर दैवी कृपा हो। 

प्लेटो के शिष्य "अरस्तु" ने प्लेटो की दृष्टि अनुभववादी थी परन्तु वह भी आगे चलकर अभिजात्यवादी हो गयी। प्लेटों ने जहाँ कविता को यथार्थ से दूर और उसे विकृत करने वाला बताया है वहीं अरस्तू की नजर में कविता यथार्थ से भी बढ़कर है। अरस्तू कविता को इतिहास से श्रेष्ठ मानते हुए उसे संभावना व्यक्त करने में भी मजबूत मानते हैं।

अरस्तू भी कविता को अनुकरण मानते हैं परंतु उसके साथ ही उसमें कवि की अपनी मैलिकता भी समाहित होती है। वह आंतरिक क्रियाओं को भी दर्शाती है।  कविता को अरस्तु प्रकृति से भी बढ़कर मानते हैं।

अरस्तु को प्लेटो से अलग जो विचारधारा करती है वो अरस्तु की अभिजात्यवादी विचारधारा है।

• अरस्तु के बाद रोमन कवि "होरेस" की कविताओं में साहित्य के तत्व मिलते है। ये मूलतः वस्तुपरक और शुद्धतावादी थे। होरेस औचित्य को कविता की मूल कसौटी मानते हैं। इनकी कविता की भाषा में 'उदात्त के तत्व' के साथ पुरानी शब्दावली के साथ नवीन शब्दावली के निर्माण की भी सिफारिश दिखती है। इन्होंने अरस्तु के मत की व्याख्या करते हुए 'कविता के लिए श्रेष्ठ काव्यों के अनुसरण और प्राचीन काव्य-सिद्धान्तों के अनुसरण पर भी बल दिया।'

ईसा की 1शताब्दी में "लोंजाइनस" आये जिनकी रचना "पेरीपसुस" थी। उनके अनुसार उदात्त तत्व भव्यता या विराटता में नही होता बल्कि लघुता में दिखाई देता है। इनकी मान्यताओं में वस्तुपरक शास्त्रीयता तथा आत्मपरक रोमानी दृष्टि का तालमेल दीखता है।

तीसरी शती तक आते-आते आत्मवाद तथा वस्तुवाद का पुनरुथान क्रमशः "नव्य प्लेटोवाद" तथा "नव्य अभिजात्यवाद" के रूप में होने लगा। इस समय के लगभग" पलाटीनस" ने गहन दर्शन पर आधारित सिद्धान्तों की पुष्टि की गई। इन्होंने भी प्लेटों की तरह संसार को अदृश्य अमूर्त यथार्थ की बाह्य अभिव्यक्ति माना प्लेटो के विपरीत प्लाटिन्स "कविता अनुकरण का अनुकरण नही , बल्कि परम् चैतन्य में स्थित प्रत्ययों तक पहुचती है"..। नव्य प्लेटोवाद और नव्य अभिजात्यवाद दोनों अपने गुणों के आधार पर निकट दिखते हैं जहाँ उनका आपसी सिद्धान्तवादी और शास्त्रवादी, अनुभवइतर, नियमों से बंधकर रहना बराबर ही हैं। नव्य प्लेटोवाद का प्रभाव मध्ययुगीन धार्मिक चिंतन पर भी पड़ा और आधुनिक काल में 18वीं शती के इंग्लैंड में यह कैम्ब्रिज प्लेटोवाद के रूप में उभरा।

आभिजात्यवादी और नव्य अभिजात्यवादी दोनों में कोई ज्यादा अंतर नही है। दोनों ने आत्मनिष्ठता के स्थान पर वस्तुनिष्ठता को प्रश्रय दिया और दोनों ने ही अनुकरण को बाह्य यथार्थ माना, जिसमें कवि के लिए किसी भी तरह की मौलिकता का अभाव रहता है। यह प्लेटो के सिद्धांत से मिलते हुए नजर आते हैं। दोनों ही अनुभव से इतर थे।

नव्य अभिजात्यवाद अरस्तू के अनुकरण और कवि की मैलिकता के मत के विरुद्ध एकदम सिद्धान्तवादी और आदर्शवादी था। यह सिद्धान्त अपेक्षाकृत संकीर्ण था।  इसका प्रभाव पहले साहित्येतर क्षेत्रों में दिखाई पड़ा। साहित्य के स्तर पर इसका प्रभाव पहले फ्रांस में हुआ जहाँ अरस्तु और होरेस के मतों को खूब चर्चा में लिया जा रहा था।

नव्य- अभिजात्यवादी व्यक्तिकता के विरुद्ध सफल तो हुए पर बाद में उन्होंने उन्ही लोगो को केंद्र में रखा जो अभिजात वर्ग से जुडे थे। 

17-18 वीं शती में इंग्लैंड के कुछ कवियों जैसे बेन जॉनसन, सैमुअल जॉनसन, जॉन ड्राईडन, अलेक्जेंडर पोप, जोसेफ एडीसन आदि कवियों ने अभिजात्यवाद का झंडा फहराया और अपने प्राचीन सिद्धान्तों को पुनः समाज मे स्थापित करने पर बल दिया। जॉन ड्राईडन ने तो प्राचीन क्लासिकी ग्रँथों का अनुवाद तक किया और इस परंपरा के प्रबल समर्थक थे। इन्होंने रोमानी भावुकलता के विरुद्ध "कला की कसौटी तर्क को माना ना कि स्वछन्दतावादी कवियों की तरह भाव को"..।

18वी सदी में जिस अभिजात्यवाद की स्थापना फ्रांस में हुई थी वह अभिजात्य वर्ग का ही प्रतिबिम्ब था।

पश्चिमी साहित्य में प्लेटो का असर आगे आने वाले क्लासिक, शास्त्रवादी, अभिजात्यवादी, नव्य-अभिजात्यवादी आदि सभी कवियों पर पड़ा क्योंकि यह सभी मत कहीं-कहीं एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।


● अभिजात्यवाद काव्य वृति के विरुद्ध सबसे पहले "पुनर्जागरण" के दौर में आत्मवादी समीक्षा की शुरुआत हुई जहाँ मानव को विश्व का केंद्र बनाया गया। बंधी-बंधाई नियमावली के विरुद्ध सर्जनात्मकता को बल दिया। पश्चिम के साहित्य में रूढ़ियों को तोड़ने का यह पहला प्रयास था। इस युग का प्रभाव 16वीं शती के "फिलिप सिडनी" पर भी पड़ा जहाँ उन्होंने "कवि को भविष्यद्रष्टा के रूप में देखा"।

नव्य अभिजात्यवादी व शास्त्रवाद विचारधारा के विरुद्ध 17 वी सदी से "स्वछंदतावादियो" का दौर चला। इस युग में साहित्य समीक्षा का अर्थ स्वतंत्र अनुशासन के रूप में बढ़ा। स्वछंदतावाद में विश्वास रखने वाले कवियों में सबसे प्रबल समर्थक "विलियम वर्ड्सवर्थ" है जिन्होंने कविता को "प्रबल मनोवेगों के सहज उच्छलन" की परिभाषा दी ।इसके अलावा "कॉलरिज" भी स्वछंदतावादी कहलाये हैं। इन कवियों ने भावना के साथ कल्पना को भी महत्व दिया है।

शास्त्र के विरुद्ध जो विचारधारा स्वछंदतावाद की थी वही आगे चलकर "कलावाद" की रही। 1818 में विक्टर क्रुजे ने "कला कला के लिए" का सिद्धांत दिया। इस सिद्धांत के अनुसार कला का उद्देश्य पूर्णता की तलाश होना चाहिए और कला को केवल अपने नियमो को मानना चाहिए। इसकी एकमात्र कसौटी सौंदर्य पर टिकी है जो बाह्य जगत से निरपेक्ष है। इस सिद्धान्त को अपने नियम मानने चाहिए।

"वाल्टर पेटर" तो कला के लिए नियमों को उनकी स्वतंत्रता व स्वतः स्फूर्त के लिए बाधक मानते हैं।

कला को स्वतः पूर्ण और बाह्य जगत से अलग मानने की वृत्ति "क्रोचे" अपने सिद्धान्त "अभिव्यंजनावाद" में लेके आये। कलावादियों ने बाह्य अभिव्यक्ति को नकारा नहीं था किंतु क्रोचे ने शब्द, स्वर, आकार आदि के आधार पर बाहरी अभिव्यक्ति के स्थान पर कला के लिए सहजानुभूति का समर्थन किया।

जिस अभिजात्यवादी विचारधारा को स्वछंदतावाद ने खत्म कर दिया था "मैथ्यू आर्नल्ड" उसे दोबारा से लेके आते हैं। वह अपनी संस्कृति और कविता को, अराजक समाज के लिए उपादान मानते हैं। उन्हें उन आदर्शवादी नियमों की आवश्यकता हुई जो जीवन और साहित्य दोनों को मूल्यों से अनुशासित कर सके। उन्होंने कहा था कि  "कविता जीवन की आलोचना है".....।

• "प्रतीकवाद" जिसका स्पष्ट आरम्भ 1886 में 'विलिये द लील' के नाटकों से माना जाता है परन्तु इसका सूत्रपात "बादलेयर" के समय पहले ही हो चुका था। इस सिद्धान्त का जन्म प्रकृत और जड़ यथार्थवाद के विरुद्ध हुआ था। जिसका श्रय बादलेयर को जाता है। इस सिद्धान्त की मान्यता घटनाओं, व्यक्तियो तथा बाह्य जगत के पदार्थो की अपेक्षा मानवीय संवेदना, मनोभाव तथा अनुभव पर आधारित थी। इस सिद्धांत ने साहित्य के शिल्प और पारम्परिक साहित्य-रूपों का त्याग करके जड़-तुक का विरोध किया पर इसके साथ प्रगीतात्मक का समर्थन किया।

प्रतीकवाद का उन लोगो द्वारा विरोध हुआ जो आभिजात्य-और जड़वादी होने के साथ-साथ कविता के मुक्त होने के पक्ष में नही थे। इसलिए इस सिद्धांत को विरोधियो द्वारा  "पत्ननोन्मुख काव्य आंदोलन" कहा गया।

• इंग्लैंड और अमेरिका में "बिम्बबाद" की शुरुआत  t.s hume और azra pound  जैसे कवि लेके आये। यह मत मुख्यतः अति-स्वछंदतावाद और प्रतीकवाद के अतिरेक के विरुद्ध आया था। इनका उद्देश्य आम बोलचाल की भाषा और सटीक प्रतीकों के इस्तेमाल पर था।

• "नई समीक्षा" जैसी विचारधारा को "इलियट और रिचर्डस" लेके आये। ये बात अलग है कि 1941 में "जॉन क्रो रेन्सम" के इसी शीर्षक से ये नाम आलोचना के लिए रूढ़ हुआ। वैसे प्रवृति के अनुसार "नयी समीक्षा" के जनक इलियट ही माने जाते हैं। यह मत भी रोमांटिसिज्म के विरुद्ध आया था।

कुछ इस तरह से हम पाश्चत्य काव्यशास्त्र के इतिहास पर एक सीधी-सपाट नजर फेर सकते हैं।


● आधार व सहायक ग्रन्थ :-

1.पाश्चत्य चिंतन धारा - निर्मला जैन, राजकमल प्रकाशन।

2. पाश्चत्य काव्यशास्त्र सिद्धान, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।

3. भारतीय काव्यशास्त्र, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।


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