(काव्यशास्त्र)
हिंदी साहित्य लोचन
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(प्लेटो व अनुकरण)
● रचनाएँ:- इयोन, लाज़, रिपब्लिक (गणतंत्र)
इनका समय एथेंस के पतन काल मे हुआ था। इनका यह नाम इनके गुरु द्वारा रखे "पलातोंन" के अरबी-फारसी रूप अफ़लातून के रूप में प्रचलित हुआ जिसे कई जगह प्लेटो कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि ये 28 वर्ष की उम्र में ही देश-देशांतर पर चल निकले थे और 12 साल की यात्रा के बाद 40 कि उम्र में एथेंस आये थे। उन्होंने एक अकादमी की शुरुआत की जिसे योरोप का पहला विश्विद्यालय कहा गया। इनका "लाज़" शब्द ही इनका अंतिम सम्वाद है।
इनके 28 रचनाओ में से 27 संवाद है और 1 पत्र-संग्रह है।
प्लेटो के संवाद मुख्यता द्वंद रूप में हैं। मतलब किसे स्वीकार किया जाए और किसे नही, उस सन्दर्भ में यह खूब मत्थापची करते दिखे हैं। काव्य और कला के विषय मे इनकी चिंता आदर्श समाज की उपयोगिता से है।
"काव्य, सत्य और अनुकरण" के सम्बंध में प्लेटो का मत एकदम स्पष्ट है। काव्य के संदर्भ में इनका सम्बन्ध सत्यता से है पर जब हम प्लेटो को गहन रूप से अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि उनका सम्बन्ध सिर्फ सत्य से नहीं बल्कि आदर्श समाज की स्थापना के लिए उस झूठ या कल्पना को भी स्वीकार कर लेता है जिसमें एक भावी समाज की झलक दिख रही हो।
प्लेटो की बहस 'अनुकरण' नही उसके विषय से है। वह कहते हैं :- "विवेकहीन,अपरिपक्व मन पर दुष्प्रभाव डालने वाले साहित्य का पूर्ण निषेध होना चाहिए चाहे वह सत्य ही क्यों न हो....। अनुकरण का विषय ऐसा हो जिसमें आदर्श समाज की कल्पना हो सके। जहाँ प्लेटो कविता को समाज के लिए घातक साबित करते हुए उसका बहिष्कार करते हैं तो वहीं वह उस कवि और कविता को भी स्वीकार कर लेते हैं जो शुभ का अनुकर्ता हो। "निर्मला जैन" अनुसार " प्लेटो ने काव्य का निषेध अनुकरण मात्र से नहीं बल्कि उसके अनैतिक होने से किया है
प्लेटो ने 'काव्य सृजन की प्रक्रिया' के विषय में अपनी पुस्तक "इयोन" में कहा है " वह मानते हैं कि कवि में सृजन की शक्ति दैवीय होती है। अपनी बात को पुष्ट करने के लिए वह तर्क देते हैं कि " यदि कवि वैज्ञानिक पद्धति के आधार पर कविता करने में सफल होता तो वह किसी भी विषय पर कविताएँ लिख सकता है लेकिन व्यवहारिक रूप में यह सम्भव नहीं केवल कुछ ही विषयो में वह महारथ हासिल कर सकता है"..। इसी के आगे जोड़ते हुए प्लेटो कहते हैं कि " समस्त सुंदरतम कविता का अविष्कार दैवीय शक्ति से ही होता है"..।
निर्मला जैन कहती है " अलौकिक शक्ति द्वारा अधिकृत कवि स्रष्टा नहीं, उसका प्रवक्ता होता है"..। साथ ही प्लेटो द्वारा कवि पर दैवीय शक्ति की प्रेरणा को स्पष्ट करती हुई कहती हैं कि " प्लेटो ने कविता को वैज्ञानिक ज्ञान से अलगाने के लिए प्रेरणा शक्ति का उपयोग किया है, न कि कवि की अवमानना करने के लिए"..।
● कविता पर प्लेटों के मत :-
प्लेटो के अनुसार कविता हमारे व्यक्तित्व में बाधा का कार्य करती है, वह हमें भावोतेजक, असंयमित बनाती है।जो मनुष्य की साधु प्रकृति के विरुद्ध न हो
दुख:पूर्ण कविता से समाज में दुख का संचार होता है और मनुष्य दुखी होता है। प्लेटो के अनुसार वहीं समाज आदर्शवादी है जहाँ के लोग सुखी हों। इस दुखमूलक धारणा कामदी, नाटक, काव्य आदि में होती है।
"कविता मानव की शासक होती है और मानव शासित"....। अर्थात गुलामी , जिसे वह मृत्यु से भी बढ़कर मानता है। प्लेटो की काव्य सम्बन्धी मान्यताएँ रोमांटिक भावनाओ के विरुद्ध है क्योंकि इससे घृणित भावनाए उतपन्न होती है।
प्लेटो ने अपनी पुस्तक "गणतंत्र " republic में स्वीकार किया है कि "मेरी काव्य सम्बन्धी धारणा सत्य और नैतिकता पर थी पर गणतंत्र तक आते आते मैं असत्यभाषी भी हुआ और अनैतिकता के घेरे में भी फंसा"....। निष्कर्षतः प्लेटो ने कविता का विरोध करते हुए भी कविता के पृष्ठपोषकों को अपने समर्थन के लिए पूरा अवसर दिया है। व कला के संदर्भ में इनका विचार उपयोगितावादी था।
प्लेटो के बारे में क्रोचे का मत है " विचारों के इतिहास में कला के महान निषेध का इतना बड़ा विचारक एक भी नहीं हुआ"..।
• प्लेटों ने काव्य के 3 भेद किये
1. अनुकरणात्मक -प्रहसन व दुखांत
2. वर्णनात्मक- डिथिरैम्ब (प्रगीत)
3. मिश्र -महाकव्य
● आधार व सहायक ग्रन्थ :-
1.पाश्चत्य चिंतन धारा - निर्मला जैन, राजकमल प्रकाशन।
2. पाश्चत्य काव्यशास्त्र सिद्धान, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।
3. भारतीय काव्यशास्त्र, हरियाणा प्रकाशन, पंचकूला।
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